रेणु जी के जीवन की महागाथा का अप्रतिम दस्तावेज़ (पाठकीय टिप्पणी) इन्द्रजीत सिंह का आभार।


फणीश्वरनाथ रेणु जी की जन्म शताब्दी के अवसर पर उनके अनन्य भक्त ,रेणु साहित्य के गहन अध्येता और लेखक प्रोफेसर भारत यायावर द्वारा रचित रजा फाउंडेशन के सहयोग से सेतु प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक "रेणु एक जीवनी" वास्तव में आंचलिक साहित्य के लिए विख्यात रेणु जी के जीवन की महा गाथा का अप्रतिम दस्तावेज़ हैl

कवि अज्ञेय के उपन्यास "शेखर एक जीवनी" की तर्ज पर भारत यायावर ने रेणु जी की जीवन कथा का नाम"रेणु एक जीवनी"रखाl यायावर जी ने पुस्तक की प्रस्तावना में ईमानदारी से इस बात को लिखा है-"मैं जब भी दिग्भ्रमित होता हूँ अज्ञेय के पास जाता हूँl अज्ञेय ने ही रास्ता बताया-"शेखर एक जीवनी को देखिएl मैंने गौर से देखा और"रेणु एक जीवनी"नाम ही रखा l 548 पृष्ठों में लिखी गई रेणु की महागाथा का यह प्रथम खंड है जिसमें रेणु के जीवन से जुड़ी 1955 तक की समस्त घटनाओं को दिलचस्प ढंग से वर्णन किया गया है l रेणु जी के बचपन किशोरावस्था युवावस्था के अनेक दिलचस्प प्रसंगों को यायावर जी ने बहुत प्रामाणिक ढंग से लिपिबद्ध किया है रेणु जी के विश्व विख्यात उपन्यास "मैला आंचल"के प्रकाशन की बड़ी मार्मिक लेकिन दिलचस्प कहानी यायावर जी ने बयां की है l

रेणु जी की तरह यायावर जी भी बेहतरीन किस्सा गो है l अनेक जगह विषयांतर होते हुए भी पठनीयता की लय नहीं टूटने देते भारत यायावरl शैलेन्द्र की फिल्म फिल्म"तीसरी कसम "को भी पूरा होने में पांच साल से अधिक का समय लगा l रेणु जी के "मैला आंचल" उपन्यास को पूरा करने और प्रकाशित करने में चार साल से अधिक समय लग गया l रेणु जी ने मैला आंचल का पहला ड्राफ्ट 1950 में लिखाl डायरी में लिखे वृतांत को 1952 में पुनः लिखा l 1953 में तीसरी पाठ तैयार किया l अपने साहित्यिक मित्र हिमांशु श्रीवास्तव को पहली बार उपन्यास के कुछ अंश पढ़कर सुनाए l कोई प्रकाशक इस उपन्यास को छापने के लिए राजी नहीं हो रहा थाl आंचलिक भाषा के कारण भी कई प्रकाशक छापने से किनारा कर रहे थे l बाद में यहीं आंचलिकता का जादू ही इस पुस्तक की लोकप्रियता का सबसे बड़ा आधार बना l मैला आंचल को टाईप फॉर्म में तैयार करने के लिए चौथा ड्राफ्ट रेणु जी ने तैयार कियाl प्रकाशन के सिलसिले में भागल पुर की यात्रा की वहां से भी निराश लौटे आखिरकार यह तय हुआ कि उपन्यास को स्वयं ही छपवाएl समता प्रकाशन के मालिक रजी साहब ने बिना मुनाफा लिए 1600 रुपए में एक हजार प्रतियां छापने की बात कीl


फणीश्वरनाथ रेणु

रेणु जी के पास सौ रुपए भी नहीं थे और सोलह सौ रुपए का जुगाड बहुत मुश्किल काम था लेकिन रेणु जी के दोस्तों रिश्तेदारों ने 1200 रुपए इकट्ठा कर दिए जिसमें लतिका जी का हिस्सा भी शामिल था l बाकी रकम प्रकाशक को पुस्तकें बेचकर देने का करार नामा हुआ l बहुत ज़द्दो ज़हद के बाद मैला आंचल अगस्त 1954 में प्रकाशित हुआl रेणु जी के ज़िन्दगी का बहुत ही खुशनुमा महीना l लेखक मित्रों नागार्जुन रामवृक्ष बेनीपुरी नलिन विलोचन शर्मा शिवपूजन सहाय आदि को पुस्तक उपहार में दी गईl नागार्जुन जी ने पुस्तक की समीक्षा लिखने का वायदा किया लेकिन पूरा नहीं कियाl पहली समीक्षा धर्मवीर भारती जी ने कीl उन्होंने रेणु को मिथिला भूमि का दूसरा विद्यापति बतायाl मन्मथ नाथ गुप्त ने मैला आंचल को "गोदान" के बाद का सबसे अच्छा उपन्यास घोषित किया l नामवर सिंह की बेहतरीन समीक्षा ने रेणु जी और मैला आंचल को आंचलिक चर्चा से उठाकर राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बना दियाl

नलिन विलोचन शर्मा जी की मैला आंचल की समीक्षा रेडियो पर प्रसारित होने के कारण पुस्तक की लोकप्रियता में इजाफा हुआl "मैला आंचल" की यशो गाथा से प्रभावित होकर उसकी प्रतियों की बिक्री और उसके पुनः प्रकाशन की जिम्मेदारी राजकमल प्रकाशन ने संभाली l रेणु जी एक स्टार लेखक के रूप में प्रतिष्ठित हो गए l


भारत यायावर 

भारत यायावर ने रेणु जी के जीवन से जुड़े अनेक किस्सों और संघर्ष को अनेक अध्यायों में चित्रित किया हैl रेणु की पिटाई, पहला जेल गमन, पहला पुरस्कार, बी पी कोइराला की कथा, नेपाल का मुक्ति संग्राम, गांधी की जगह लोहिया, जाति ही पूछो रेणु की और धरती का लेखक आदि अध्यायों को बहुत ही रोचक और प्रामाणिक ढंग से लिखा हैl 1956 से 1977 तक की जीवन यात्रा को भारत यायावर दूसरे खंड में प्रस्तुत करेंगेl "रेणु एक जीवनी"रेणु जी के प्रेमियों के लिए भारत यायावर की ओर से अनुपम उपहार हैl भारत यायावर की अथक मेहनत को सैकड़ों सलाम l सेतु प्रकाशन और रजा फाउंडेशन को इस नायाब और कामयाब पुस्तक के लिए साधुवाद l



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समीक्षक : इन्द्रजीत सिंह

पुस्तक : रेणु एक जीवनी

प्रकाशक : सेतु प्रकाशन प्रा. लि.

मूल्य ; 550 

जगत् और जागृति के लेखक : हजारीप्रसाद द्विवेदी (जनसंदेश टाइम्स में छपी पुस्तक 'हजारीप्रसाद द्विवेदी एक जागतिक आचार्य' की समीक्षा) आलोचक कमलेश वर्मा और जनसंदेश टाइम्स के संपादक सुभाष राय का आभार।

 

 2005 में बी एच यू, वाराणसी के हिन्दी विभाग में लगभग एक दर्जन अध्यापकों की नियुक्ति हुई थी नियुक्त करने में नामवर सिंह की मुख्य भूमिका थी हिन्दी विभाग उम्मीदों से चमक उठा था लम्बे समय से चली आ रही उदासी छँटी थी और नवनियुक्तों की क्षमता पर भरोसा जताया जा रहा था लगने लगा था कि अब यह विभाग फिर से नए-नए मुकाम हासिल करेगा इस घटना के सत्रह बरस गुज़र चुके हैं और कहा जा सकता है कि इस बीच विभाग की उपलब्धियाँ बढ़ी हैं

इन्हीं अध्यापकों में ग़ाज़ीपुर की नौकरी से आए थे – श्रीप्रकाश शुक्ल वे कवि के रूप में पहले से ख्यात हो चुके थे ‘परिचय’ पत्रिका के संपादक के रूप में आगे चलकर उन्हें यश-अपयश की मिश्रित राशि प्राप्त होती रही इसी पत्रिका का एक विशेषांक आया था आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की जन्म-शताब्दी पर 2007 में बहुत उत्साह से इसकी तैयारी हुई और उससे ज्यादा उत्साह से इसका विमोचन हुआ 2007 में मौजूद कई महत्त्वपूर्ण लेखकों के लेख इस विशेषांक में सम्मिलित हुए थे हिन्दी लेखन में टोले-मुहल्ले की संस्कृति के प्रभाव या किसी अन्य संकीर्ण कारण से यह संभव नहीं हो पाता कि आप किसी विषय पर अपने समय के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण लेखकों के लेख प्राप्त कर कोई विशेषांक निकाल सकें इस अंक में एक लेख चौथीराम यादवजी का भी होना चाहिए था उनकी एक किताब हजारीप्रसाद द्विवेदी पर पहले से मौजूद है और वे उसी हिन्दी विभाग का हिस्सा रहे हैं

2021 में ‘परिचय’ पत्रिका का वही विशेषांक ‘पुनर्नवा’ होकर सेतु प्रकाशन से छप कर आया है इसमें श्रीप्रकाश शुक्ल की लिखी हुई एक नयी और लंबी भूमिका है – ‘हजारीप्रसाद द्विवेदी : एक जागतिक आचार्य’ जिस तरह आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘कुटज’ की अपराजेयता में अपने व्यक्तित्व को देखने और प्रेरित होने की कोशिश की थी उसी तरह श्रीप्रकाश जी ने आचार्य के लेखकीय व्यक्तित्व में अपने ‘जागतिक’ व्यक्तित्व को देखने की कोशिश की है यह भूमिका अभी तो आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को आधार बनाकर लिखी गयी है मगर आगे चलकर यह भूमिका श्रीप्रकाश शुक्ल के लेखकीय व्यक्तित्व की आकांक्षा को समझने में मददगार होगी वे लिखते हैं , “उनकी ‘संपूर्ण जागृति’ में यह ‘जगत्’ है और उनके ‘संपूर्ण जगत्’ में यह जागृति है” संसार के प्रति सचेत होकर जीना और लिखना! श्रीप्रकाश जी ‘जागतिक’ शब्द में ‘जगत्’ और ‘जागृति’ – दोनों को समाहित करके अर्थ निकालते हैं यह उनके द्वारा निकाला गया अपना अर्थ है, पर है व्याकरण-विरूद्ध! ‘जागतिक’ का सम्बन्ध ‘जगत्’ से तो है मगर ‘जागृति’ से नहीं मगर यह बनारस है, यहाँ सब ‘गुरु’ हैं और श्रीप्रकाश जी तो विधिवत् ‘गुरु’ हैं व्याकरण को चुनौती देना ‘आचार्यों’ की शोभा बढ़ाता है और भाषा इससे गति प्राप्त करती है! ‘जागृति’ के लिए श्रीप्रकाश जी तर्क देते हैं – ‘जगता ब्रह्म की तर्ज़ पर’ यहाँ भी ‘की’ के बदले ‘के’ होना चाहिए था मगर बनारस में ‘लालच’, ‘गुस्सा’, तर्ज़’ जैसे पुलिंग शब्दों को स्त्रीलिंग में इस्तेमाल करते हैं और वे करते हैं तो करते हैं आप क्या बिगाड़ लीजिएगा?

श्रीप्रकाश शुक्ल 

 

‘हजारीप्रसाद द्विवेदी : एक जागतिक आचार्य’ पुस्तक में कुल 28 लेख हैं इस पुस्तक के पहले 1967 में द्विवेदी जी के साठ बरस पूरे करने पर शिवप्रसाद सिंह के संपादन में पुस्तक आयी थी – ‘शान्तिनिकेतन से शिवालिक’ कहा जा सकता है कि द्विवेदीजी को समझने में जैसे ‘शान्तिनिकेतन से शिवालिक’ पुस्तक का अब तक महत्त्व रहा है उसी तरह से ‘हजारीप्रसाद द्विवेदी : एक जागतिक आचार्य’ पुस्तक आनेवाले समय में महत्त्वपूर्ण हो जाएगी

इस पुस्तक के लेखकों के दायरे का विस्तार ठीक-ठाक है अत्यंत बुजुर्ग से लेकर बिल्कुल नए लेखकों के लेख इस पुस्तक में संकलित हुए हैं रमेश कुंतल मेघ, बच्चन सिंह और अरुणेश नीरन के लेख तो इन दोनों पुस्तकों में हैं मतलब यह कि चालीस वर्षों के अंतराल पर इन तीनों लेखकों ने द्विवेदी जी पर फिर से विचार किया है आज 2021 तक तो इस पुस्तक के कई लेखक दिवंगत हो चुके हैं 2007 में जब यह विशेषांक आया था तब वैभव सिंह, मनोज सिंह, रामाज्ञा शशिधर, विनोद तिवारी आलोचक के रूप में नए थे रविशंकर उपाध्याय तो विद्यार्थी थे कहने का अर्थ यह है कि नित्यानंद तिवारी, शिवकुमार मिश्र, खगेन्द्र ठाकुर, विश्वनाथ त्रिपाठी जैसे वरिष्ठों से लेकर विद्यार्थी तक के लेख इस विशेषांक में शामिल करके संपादक ने द्विवेदी जी का मूल्यांकन कई पीढ़ियों से करवाने का प्रयास किया है

द्विवेदी जी पर विचार के प्रायः निम्नलिखित बिंदु रहे हैं – उपन्यास, निबंध, इतिहास और आलोचना इन बिन्दुओं पर खूब लिखा-बोला गया है यह पुस्तक कुछ नए विषयों को भी उठाती है इस पुस्तक में बसन्त त्रिपाठी का लेख है – ‘दलित विमर्श के संदर्भ में द्विवेदी जी के कबीर’ डॉ धर्मवीर को जवाब देने और द्विवेदी जी के पक्ष को रखने की कोशिश इस लेख में हुई है वीरेन्द्र मोहन ने द्विवेदी जी के कवि-रूप पर विचार किया है बाल साहित्य के सन्दर्भ में रविशंकर उपाध्याय ने विचार किया है रामाज्ञा शशिधर का लेख ‘फूलों की दुनिया में द्विवेदी जी’ अपने ढंग का है द्विवेदी जी के लेखन में फूलों का उपयोग प्रत्यक्ष विवरण के साथ रूपक में जिस तरह से हुआ है उसे इस लेख में सुन्दर तरीके से व्यक्त किया गया है  

द्विवेदी जी के उपन्यास, निबंध, इतिहास और आलोचना के पक्ष पर लिखे गए आलेख इस तरह से संयोजित किए गए हैं कि संपूर्ण मूल्यांकन की संभावना बन सके इसके संस्मरणात्मक आलेख इस पुस्तक को जीवंतता प्रदान करते हैं विश्वनाथ त्रिपाठी, रमेश कुंतल मेघ, बच्चन सिंह के संस्मरण द्विवेदी जी के जीवन-संघर्ष को इस तरह व्यक्त कर रहे हैं कि उनकी सहायता से द्विवेदी जी के साहित्य को समझने में सुविधा हो! यह उल्लेखनीय है कि इस पुस्तक में ऐसे लेखक भी हैं जिन्होंने द्विवेदी जी को करीब से देखा-समझा था और ऐसे लेखक भी हैं जिन्होंने द्विवेदी जी को देखा तक नहीं था

श्रीप्रकाश शुक्ल की लिखी भूमिका में कुछ सूत्र ऐसे हैं जिनकी सहायता से द्विवेदी जी को समझने में मदद मिल सकती है –

·       जगत, मनुष्य व रीढ़ की अवधारणा  

·       इस ‘मानव चित्त’ ने द्विवेदी जी के भीतर इतिहास का विवेक दिया व परंपरा का बोध

·       ‘मंत्रविद्’ होने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है ‘आत्मविद्’ होना

·       संस्कृति, परंपरा का पार्श्व है यह अनिवार्यतः सामासिक है

·       ‘कॉमनसेन्स’ किसी कलाकार की समाधि अवस्था है

·       द्विवेदी जी एक ‘बौद्ध पुरुष’ हैं और शुक्ल जी ‘वैदिक पुरुष’

बात हिन्दी विभाग से शुरू हुई थी अब समापन भी उसी से श्रीप्रकाश जी 2020 में 15 बरस गुजार देने के बाद उस हिन्दी विभाग के बारे में कुछ शब्दों का इस्तेमाल करते हैं ये शब्द श्रीप्रकाश जी से भी जुड़े हैं और द्विवेदी जी से भी –

·       कोंचना हिन्दी विभाग का स्वभाव है और कुरेदना इसकी उपलब्धि

·       औरेबियत और औघड़पन इसकी नींव में समाहित है

·       लालित्य और छालित्य के साथ सनातन और अधुनातन का यहाँ अद्भुत् समन्वय रहा है

·       स्वीकार्यता से यह कोसों दूर रहता है और भर दिन मत्सरी वृत्ति में लिपटे रहना इसकी नियति है 

हिन्दी विभाग के बारे में कहे गए ये शब्द द्विवेदी जी के कटु अनुभवों से जुड़े हुए हैं इन्हीं के बीच से रचने वाले रच लेते हैं और न रच पाने वालों के पास अपनी असमर्थता को छिपाने के तो असंख्य बहाने हैं ही! और रचने वालों की ऐसी की तैसी करने में ‘मत्सरी वृत्ति’ की सहायता तो मिल ही जाएगी! श्रीप्रकाश जी ने एक नया शब्द यहाँ भी जोड़ा है – ‘छालित्य’ यूँ तो यह ‘छल’ से जुड़ा अर्थ दे रहा है, मगर है नया उस विभाग की विशेषता को बताने के लिए श्रीप्रकाश शुक्ल इस शब्द को गढ़ते हैं ‘लालित्य’ के साथ इस शब्द को पढ़ना चाहिए यह विभाग आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से लेकर आज तक के अपने रचयिताओं के साथ लालित्य-पूर्वक छल करता रहा है उसके छल का ललित-रूप आपको बहुत दिनों तक भ्रमित किए रहेगा कि आप छले जा रहे हैं या सराहे जा रहे हैं! 

हजारीप्रसाद द्विवेदी : एक जागतिक आचार्य

श्रीप्रकाश शुक्ल

सेतु प्रकाशन, दिल्ली 2021

मूल्य – रु 410/ कुल पृष्ठ - 429

 

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आलोचक : कमलेश वर्मा

A-20, सन्धिनी, त्रिदेव कॉलोनी, चाँदपुर, वाराणसी - 22 11 06

 मो. - 09415256226

ईमेल : kamleshvermajnu@gmailcom

 



समाजवाद का कंटकाकीर्ण मार्ग (समता मार्ग वेब पोर्टल पर छपी पुस्तक 'समाजवाद की सम्भावना' की समीक्षा) समता मार्ग पोर्टल और आलोचक संजय गौतम का आभार।




समाजवाद की संभावना’ प्रख्‍यात समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्‍हा के ऐसे लेखों का संग्रह है, जिनमें आधुनिक सभ्‍यता के वैचारिक प्रस्‍थान बिंदुओं की चर्चा है, मौजूदा संकट की चर्चा है और भविष्‍य के समतामूलक समाज के आधार बिंदुओं को रेखांकित किया गया है। इन लेखों को चार खंडों में समायोजित किया गया है। पहला खंड है- ‘आधुनिक चेतना का नेपथ्य’। इसमें तीन लेख हैं- ‘हमारा समय और डार्विन’, ‘संघर्ष सहयोग और नया नियतिवाद’ और ‘पूंजीवाद का संकट’। दूसरा खंड है- ‘गहराता पर्यावरण संकट’। इसके अंतर्गत पांच लेख हैं- ‘ऊर्जा संकट और समाधान’, ‘ऊर्जा संकट, समाधान या बहाना’, ‘भविष्‍य की सवारी बैलगाड़ी’, ‘पर्यावरण संकट की अंधी गली’, ‘जल संकट के छिपे कारक’। तीसरा खंड है- ‘विकास और विस्‍थापन’। इसके अंतर्गत चार लेख हैं- ‘विस्‍थापन का विकास’ ‘नयी व्‍यवस्‍था में किसान’, ‘किसान आंदोलन की चुनौती, ‘मेरा नाम तेरा नाम नंदीग्राम’। चौथा खंड है– ‘विकल्‍प की तलाश’। इसके अंतर्गत चार लेख हैं- ‘भविष्‍य का साम्यवाद कैसा होगा’, ‘आज की दुनिया में समाजवाद’, ‘भावी समाजवाद, अनुभवों के आलोक में’, ‘हिंद स्‍वराज का भारत’।


सच्च्दिानंद सिन्‍हा अपने लेखों में प्रचलित राजनीति की विचारहीनता, दिशाहीनता और मौजूदा संकट के प्रति नासमझी को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्‍य में रेखांकित करते हैं। किताब के पहले खंड में वह हमें डार्विन, हर्वर्ट स्‍पेंसर, माल्थस इत्‍यादि विचारकों के पास ले चलते हैं, जिनसे पूंजीवादी औद्योगिक सभ्‍यता को ताकत मिली। साथ ही वह मार्क्‍स के विचारों की याद दिलाते हैं, जिनसे प्रेरणा लेकर सोवियत रूस और चीन जैसे देशों में साम्‍यवादी शासन, समाज की स्‍थापना हुई। लेकिन माओवादी क्रांति के बावजूद ये दोनों धाराएं अंततः एक हो गयीं और पूंजीवादी आर्थिक संरचना में तब्‍दील हो गयीं। बड़ी औद्योगिक संरचना की यही नियति थी। पूंजीवाद के विस्‍तार ने मनुष्‍य की जरूरतों के हिसाब से उद्योगों का विस्‍तार नहीं किया, बल्कि उत्‍पादन को बढ़ाते हुए मनुष्‍य में अत्‍यधिक उपभोग की लालसा व आवश्‍यकता पैदा की। इसी शिकंजे में आज का मनुष्‍य जकड़ा हुआ है।लगभग सौ पृष्‍ठों में समाये कुल सोलह लेखों के माध्‍यम से समाजवाद के अतीत और भविष्‍य का एक मुकम्‍मल खाका बनता है। आज के समय में समाजवाद की संभावना पर बात करना कुछ लोगों के लिए समाप्‍त हो चुकी संभावना पर व्‍यर्थ का विलाप करना है या फिर कभी घटित न हो सकने वाली संभावना पर व्‍यर्थ का सपना देखना है। ऐसा इसलिए है कि पूंजी तंत्र द्वारा ‘समाजवाद’ को अपने तरीके से निपटा दिया गया है। सत्ता की राजनीति करनेवाले समाजवादी दल या साम्‍यवादी दल भी समाजवाद की वापसी की बात आत्‍मविश्‍वास और दिल की गहराई से नहीं करते हैं। वे केवल कुछ प्रतीकों के सहारे सत्ता की राजनीति में अपनी हिस्‍सेदारी चाहते हैं। दलों के नाम में जो ‘समाजवाद’ शब्‍द चिपका रह गया है, वह भी प्रतीक के रूप में ही।

पूंजीवाद की इस दैत्‍याकार औद्योगिक तथा यांत्रिक संरचना ने आज सभ्‍यता के सामने तीन बड़े संकट खड़े किये हैं- विकास के नाम पर विस्‍थापन, प्रकृति का विनाश और बड़े पैमाने पर बेरोजगारी। विकास का स्‍वाद समाज का प्रभुवर्ग ले रहा है, लेकिन उसकी लालसा विभिन्‍न माध्‍यमों से नीचे तक पहुंचती है और उसे यह एहसास बना रहता है कि ‘कभी न कभी वह भी विकास के शिखर तक पहुँचेगा। वह विकास की सीढ़ी पर पहुंचने की जगह विस्‍थापित हो जाता है और निरंतर सभ्‍यता के हाशिये पर धक्के खाता रहता है। बेरोजगारी का दंश भी वही सहता है और प्रकृति की मार भी सबसे ज्यादा उसी पर पड़ती है।

आधुनिक पूंजीवादी संरचना और प्रभुवर्ग भी इन समस्‍याओं की चिंता करता हुआ दिखता है, लेकिन बुनियादी समझ और दिशा ठीक न होने की वजह से वह विस्‍थापन को पुनर्वास से, प्रकृति के विनाश को नयी तकनीकों से तथा बेरोजगारी को भत्ता से क्षतिपूर्ति करने का प्रयास करता है, जिसका कोई खास असर समाज पर नहीं पड़ता है और स्थिति दिन पर दिन और संकट की ओर बढ़ जाती है। किताब में इन समस्‍याओं पर एक बुनियादी समझ बनाने और दिशा तय करने का प्रयास है।

किसानों के संकट पर विचार करते हुए लेखक औद्योगिक सभ्‍यता की शुरुआत में बनाये गये ‘एन्‍क्लोजर’ की ओर हमारा ध्‍यान खींचता है, जिसने बड़ी फार्मिंग के लिए जमीन मालिक को मजदूर बना दिया था। उदारीकरण ने एक बार फिर से पूरी दुनिया में बड़ी फार्मिंग के लिए व्‍यवस्‍था का निर्माण करना शुरू किया। आज उसका असर तेज दिख रहा है। भारत के किसान आंदोलन और मौजूदा संकट की बुनियाद में भी यही सोच और नीति है, लेकिन किसानों के साथ खड़े हुए राजनीतिक दलों में भी कोई बुनियादी समझ नहीं है।

सच्चिदानंद सिन्‍हा ने सत्ता की राजनीति से अलग समाजवाद के स्‍वप्‍न और उसकी जरूरत को रेखांकित किया है। उनका मानना है कि संसदीय राजनीति से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन संसदीय राजनीति में थोड़ी बहुत हिस्‍सेदारी के बल पर बुनियादी परिवर्तन की दिशा में कार्य नहीं किया जा सकता। इसके लिए संकट के बुनियादी पहलुओं से आम जन को अवगत कराना होगा और उसे एक दिशा के लिए तैयार करना होगा, यह कार्य कठिन है, लेकिन असंभव नहीं है। उन्‍होंने 1965 में प्रकाशित अपनी पुस्‍तक ‘समाजवाद के बढ़ते चरण’ से एक कथन यहाँ उद्धृत किया है, ‘उनकी (समाजवादियों की) स्थिति उन पर्वतारोहियों जैसी थी जो दूर से हिमाच्‍छादित सुनहरे शिखरों से आकृष्‍ट होकर शिखरों पर पहुंचने के लिए कदम बढ़ा देते हैं, लेकिन जैसे-जैसे वे पर्वत के पास पहुंचते हैं पथ दुरूह होता जाता है। जैसे-जैसे वे पर्वत के ऊपर चढ़ते हैं वैसे-वैसे शिखर आँखों से ओझल होता जाता है और सामने बच जाता है कंटकाकीर्ण मार्ग। अनेक रास्ते की कठिनाइयों में लक्ष्‍य भूल कर भटक जाते हैं। लेकिन जो साहस और विश्‍वास के साथ अपने उद्देश्‍य पर डटे रहते हैं अंत में शिखर पर पहुंच ही जाते हैं।’ (पृ.81)

सवाल उठता है आज शिखर पर पहुंचने का विश्‍वास कितने लोगों में बचा हुआ है और उसका रास्ता क्‍या है। लेखक ने इसके लिए गांधी की ओर देखा है, जिनके वैचारिक चिंतन का एक स्रोत यूरोप में भी रहा है। जिन्‍होंने छोटे उद्योगों के साथ ही ग्राम की परस्‍पर निर्भरता पर जोर दिया, जिन्‍होंने प्राकृतिक साहचर्य पर जोर दिया, जिन्‍होंने बड़ी औद्योगिक संरचना को इसलिए नकार दिया कि बड़ी पूंजी और लालसा ही इसकी जरूरत भी है और ताकत भी। यह मनुष्‍य को बराबरी न देने के लिए ही चल रही है और इसके जरिये बराबरी और सुरक्षित पर्यावरण का सपना नहीं देखा जा सकता है। उन्‍होंने ‘हिंद स्‍वराज’ में बाकायदा इसका चित्र खींचा, यह जानते हुए भी कि तत्‍का‍लीन मनुष्‍य समाज इसके लिए तैयार नहीं है। लेकिन आज के संकट में बार-बार इसकी याद आती है। सिन्‍हा जी ने इसीलिए ‘हिंद स्‍वराज’ पर एक अध्‍याय से ही पुस्‍तक को समाप्‍त किया है।

सच्चिदानंद सिन्हा ने आज की सभ्‍यता के संकट की गंभीरता को बताते हुए वैकल्पिक अर्थनीति की अनिवार्यता पर जोर दिया है। उन्‍होंने स्‍पष्‍ट किया है कि मौजूदा प्रयास सभ्‍यता के संकट कोखासतौर से पर्यावरण और बेरोजगारी के संकट को सुलझा नहीं सकते। यह संकट दिन पर दिन गंभीर होता जाएगा। इसके लिए कम उपभोग एवं ग्रामोद्योग पर जोर देना ही होगा। इसके लिए दृढ़संकल्पित होकर अहिंसक तरीके सेरचनात्‍मक तरीके से कार्य करना होगा। समाजवाद की संभावना यदि है तो इसी रूप में साकार होगी।

सच्चिदा जी ने जिस तरफ संकेत किया है नि:संदेह आज की स्थिति में उस दिशा में चलना एक कठिन कार्य है। न पूंजी के विस्‍तार की लालसा कम है, न जनता की अभिलाषा कम है। फिर भी समाज का एक बड़ा हिस्‍सा इस संकट की बुनियाद को समझता है, उसे ही अपना रास्ता तय करना है। समता के शिखर पर पहुंचने का कंटकाकीर्ण रास्ता। यह किताब इसी दिशा में चलने के लिए प्रेरित करती है, और हमारे दिमागी धुंधलेपन को साफ करती है।

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संजय गौतम 


आलोचक : संजय गौतम 

किताब : समाजवाद की संभावना

लेखक : सच्चिदानंद सिन्‍हा

मूल्‍य : 225

 प्रकाशक : वाग्‍देवी प्रकाशन (अब सेतु प्रकाशन समूह का अंग), 

 सी-21, सेक्टर 65, नोएडा-201301, 

 फोन संपर्क : 8130745954

अशोक वाजपेयी की कविताएँ, विपुला च पृथ्‍वी.......(साभार ओम निश्चल की फेसबुक वॉल से)

  संसार में कितनी तरह की कविताएं लिखी जाती हैं। देश काल परिस् थिति को छूती और कभी कभार उसके पार जाती हुई। कभी दुख कभी सुख कभी आह्लाद कभी विष...