कुमार मंगलम युवा कवि-आलोचक हैं। वरिष्ठ कवि ज्ञानेन्द्रपति के दो संग्रहों- गंगा-तट और गंगा-बीती को आधार बनाकर उन्होंने कवि, बनारस और गंगा के रचनात्मक संबंध को बेहद संजीदा और शोधपरक दृष्टि एवं सधी हुई भाषा में परखा है।
गंगा-तट और अब
गंगा-बीती दोनों ही संग्रह शहर को संबोधित है। अथवा यूँ कहें दोनों संग्रहों में
‘बनारस’ नाम का शहर स्वमेव संबोधन पा गया है, जो पुराणाधुनिक[1]
है। हिंदी कविता के लिए शहर क्यों आवश्यक है? इसलिए कि शहर हमारे जन-जीवन और
मनःमस्तिष्क पर हावी है, और बड़ी तेजी से बदलाव की चुनौतियों को उछाल रहा है। और जब
बनारस की बात है तो 2014 से यह शहर भारतीय राजनीति के केंद्रक के रूप में मौजूद
है। ऐसे इस शहर के बदलावों को दर्ज करना ना सिर्फ ज्ञान की विधाओं का और सरकारी
फाइलों का काम है, बल्कि एक कवि द्वारा इसके सांस्कृतिक बोध एवं बदलावों को दर्ज
करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। हिंदी में गाँव के प्रति एक अतिरिक्त और कुछ हद तक
रूमानी आग्रह रहा है, और शहर को हेय दृष्टि से या नकारात्मक रूपक के रूप में ही
देखा जाता रहा है। बड़े शहरों की तन्हाई और छोटे शहरों की गुंडागर्दी दोनों के बीच
बनारस अपने आप में एक कस्बाई मिज़ाज को पालने वाला शहर है। बनारस में बड़े शहर की
तन्हाई बहुत कम या परोक्ष रूप में मौजूद है और गुंडागर्दी के स्वरूप यहाँ बदलते
रहे हैं लेकिन इसके बीच यह जितना शहर है, उतना ही गाँव या क़स्बा भी है।
भारतीय सभ्यता का एक
लघुत्तम रूप बनारस में देखा जा सकता है। भारतीयता की अवधारणा एक संश्लिष्ट अवधारणा
है, इसके बनने में विविध प्रकार के मत-मतान्तरों का योग रहा है। बनारस का धर्म,
शिक्षा, व्यापार, राजनीति, आदि से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। इस वजह से इसका इतिहास
बहुआयामी है। कई बार इतिहास इतना वस्तुनिष्ठ नहीं होता कि वह यथार्थ के संघनित
तहों को रेखांकित कर सके। जब इतिहास के पन्ने से कुछ छुट रहा होता है अथवा जो
इतिहास में सम्मिलित नहीं हो पाता है उसे साहित्य अपने पन्नों में जगह देता है।
‘गंगा-बीती’ भी कुछ इसी तरह की किताब है। इसमें इतिहास, पुराण, स्थापत्य,स्मृति, त्रासदी,
उन्मुक्त परिहास है। इसमें बेचैन संघर्ष है और सुकून की अड्डेबाज़ियाँ भी है। अतीत
मोह है तो नई चुनौतियों से उलझता-जूझता विमर्श भी है। गंगा-बीती में पर्यावरणीय चिंताओं
के साथ-साथ गालियों का जनपद बनारस एक साथ अभिव्यक्त हुआ है। बनारस एक साथ प्राचीन
और आधुनिक दोनों है। इसी वजह से इसमें एक द्वंद्व है।बनारस के रचाव की जब भी बात
होगी तो उस परम्परा की बात होगी जो अतीत का प्रगतिशील या अग्रगामी हिस्सा है। इसी
वजह से गंगा-बीती में विगत से वर्तमान के अंकुरण की सतत प्रक्रिया से उपजा
द्वंद्वात्मक निषेध जैसी ध्वनि प्रमुख है। चर्चित कथाकार जयशंकर ‘गंगातट’ पर लिखते
हुए इस ओर संकेत करते हैं, “ज्ञानेन्द्रपति के प्रेक्षण की एक उल्लेखनीय विशेषता
यह है कि वे किसी दृश्य को फोटोग्राफिक प्रेक्षण की तरह निर्विकार या प्रकृतवादी
तरीके से नहीं, बल्कि उसकी समूची आन्तरिक द्वंद्वात्मकता में पकड़ते हैं। इस
प्रयत्न में दृश्य के परस्पर पूरक या विरुद्धार्थी आशयों को अगल-बगल रख कर उनके
बीच उत्पन्न विसंगति को उभार देते हैं। यह विसंगति अपने आप एक काव्यात्मक आशय बन
जाती है। इस तरह वे विलोम प्रत्ययों के युग्म कविता का कथ्य निर्मित करते है।”[2]
इस प्रकार गंगा-बीती, गंगातट की विस्तार और पूरक है लेकिन इन दोनों संग्रहों को
अलग से पढ़ा भी जा सकता है और इनकी प्रविधि को अलग से रेखांकित भी किया जा सकता है।
गंगा-तट की कवितायेँ एक कवि की देखती आँखों की दिखावनी है लेकिन गंगा-बीती में यह
देखावनी केन्द्रीय रूप में कवि के जुबानी नहीं है, बल्कि कवि का माध्यम भर है, यह गंगू
तेली की जबानी है। गंगा-बीती की कविताओं में लगभग एक अन्तस् सूत्र के माध्यम रूप
में कवि नहीं गंगू तेली मौजूद है। इस संग्रह की कवितायेँ गंगू तेली के माध्यम से
ही बनारस के चरित्र का उपाख्यान रचती हैं। यहाँ बनारस अपने सम्पूर्ण केन्द्रीयता
में एक राजा अथवा सत्ता के प्रतिपक्ष लेखक के जबान में नहीं बेहद आम मनुष्य के
जबान में अभिव्यक्त हुआ है। क्योंकि गंगू तेली अगर होगा तो कोई राजा भी होगा, यहाँ
यह बतलाने की आवश्यकता नहीं है कि वर्तमान में काशी का राजा कौन है।इस संग्रह का
सत्य भगौलिक अनुभूत सत्य का बयान है। जिसे कवि ने गंगू के साथ सहयात्रा करके ही
जान पाया है। हेरोडोटस ने कहा है कि, “भूगोल को एतिहासिक और इतिहास को भौगोलिक
परिप्रेक्ष्य में ही पढ़ा जाना चाहिए।” संग्रह की पहली ही कविता है, नौका-विहार,
उसका एक दृश्य देखिये
“कि नदी मर रही है और वे बजरे पर बुढ़वामंगल मना
रहे हैं
शहर के कुलीन-शालीन, शहर के सहृदय”[3]
उत्सवजीवी कवि हो सकते हैं, शहर के शालीन-कुलीन-सहृदय हो सकते हैं
लेकिन गंगू तेली को उत्सव के चमक-दमक में सिसकती गंगा ही दिखती है, बुढ़वामंगल का
उत्सव नहीं।
ज्ञानेन्द्रपति अपने इस संग्रह में अपनी स्थिति को भी साफ़ कर देते
हैं। वे अपनी एक कविता बीच कहीं में अपनी उपस्थिति को रेखांकित करते हैं-
“मल्लाह और घाटिया पुरोहित
मचलियाँ और घोंघे
गंगा
किन्हीं को जीविका देती है
किन्हीं को जीवन
इन्हीं के बीच कहीं
है एक कवि
शब्दांकता बैठा गंगतीर।”[4]
गंगा-बीती संग्रह को पढ़ते हुए कविताओं के एकरूपता के अनुरूप कई आयाम
देखने को मिलता है। पहला आयाम है उन कविताओं का जो सीधे गंगा को अथवा गंगा-घाट को
लेकर संबोधित है। इन कविताओं में गंगा और गंगा-घाट की चमक-दमक के पीछे के सच को
रेखांकित करती है। ‘मानव-चित्त के अकूत कलुष से करिखायी’ में और ‘उसका सूर्य होगा
उत्तरायण’ में गंगा की स्थिति बिल्कुल साफ है। इन कविताओं में आप शर-शैय्या,
भेक-भैय्या, सूरजसोखी इत्यादि कविताओं को रख सकते हैं।
“मोक्षदायिनी गंगा अब मोक्षकामिनी
नाले में बदली निर्वाक् बही जाती है बहावहीन
मानव-चित्त के अकूत कलुष से करिखायी
आह! कितनी मकर संक्रन्तियाँ बीतेंगी कि उसका
सूर्य होगा उत्तरायण, शर-शैय्या से”[5]
दूसरा आयाम नगर-चित्र का है, जो बनारस से सम्बंधित है। इन कविताओं में
बनारस शहर की छवियाँ हैं। जैसे बड़ा दिन-लम्बी रात, अड़ी, आजाद पार्क इत्यादि। एक
कविता है ‘एक ह्रस्व हुई दीर्घिका’ इस कविता में प्राचीन बनारस के इतिहास को पढ़ा
जा सकता है। बनारस किसी दीर्घिका(तालाब) की ही भांति सिमटता चला जा रहा है। किसे
ख्याल है जो आज का मैदागिन है कभी वहां मन्दाकिनी नाम की तालाब हुआ करती थी, अब
उसके चिन्ह भी देखने को नहीं मिलता है। प्रिंसेप की तस्वीरों को देखें तो शायद पता
चले।
“एक ह्रस्व हुई दीर्घिका है-
मन्दाकिनी का मैदागिन-अवशेष-
कम्पनीबाग़-नगर मध्य के म्युन्सिपल पार्क-का
केंद्रबिंदु
वह जो काई-कवलित नन्हा-सा तालाब
कि मानो बड़ा-सा एक चहबच्चा
कि जो है विख्यात मैदागिन चौराहे का नाम-मूल-
काल-कुतरी
एक ह्रस्व हुई दीर्घिका है।”[6]
इसमें तीसरे आयाम की कवितायेँ, गंगा और बनारस सम्बंधित राजनैतिक
कवितायेँ हैं। इन कविताओं में कवि कई बार भविष्यद्रष्टा के तौर पर तो कभी राजनैतिक
विद्रूप को सटीक पहचानने वाले कवि के रूप में तो कभी आगाह करने वाले एक जागरूक
सामाजिक के भूमिका में मौजूद हैं। इन कविताओं में एक फावड़ा, एक-वस्त्रा, मालवाहक
जलपोत उतरे हैं, अथवा प्रधानमंत्री को संबोधित कवितायेँ इस श्रेणी में रख सकते
हैं।
“सो, यह नयी योजना है परिवहन-मंत्रालय की
अभी क्या! अभी तो क्रूज भी चलेंगे
जल-विहार करते घूमेंगे लक्ष्मी के लाड़ले
कोलकत्ता से इलाहबाद तक, इसी पानी के रस्ते
बितायेंगे क्वालिटी टाइम”[7]
यह कविता बनारस में क्रूज चलने से पहले लिखी गयी थी, इसके बाद ही
प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र को अत्यधिक विकसित दिखाने के लिए बनारस में क्रूज
चला, जिसका यहाँ के मल्लाहों द्वारा व्यापक विरोध हुआ था। इन्हीं कविताओं को पढ़ते
हुए कवि से अधिक एक सजग और प्रतिबद्ध सामाजिक ज्ञानेंद्रपति से मुलाक़ात होती है।
ज्ञानेन्द्रपति मूलतः राजनैतिक चेतना के कवि हैं। उनकी कविताओं में एक सजग
राजनैतिक प्रतिपक्ष सदैव ही देखने को मिलता है। गंगा-तट के उन कविताओं में यह
चेतना देखने को मिलती हैं, जहाँ वे दृश्य वर्णन से निकल कर कविताओं के माध्यम से
राजनैतिक प्रतिपक्ष रचते हैं। यहाँ इन कविताओं का सौन्दर्य दुगना हुआ है। ‘मालवाहक
पोत उतरे हैं’ कविता के उद्धरण से इसे समझा जा सकता है।
“यह तो है ही कि संसद की मार्फत
लोकतंत्र पर बड़ी पूँजी का कब्जा है अब
लोकतंत्र बना है लाभ-लोभ-तंत्र कुछ का
सांसदों में अधिसंख्य करोडपति या कि अरबपति हैं
सीधे-सीधे
पूँजीधर अब नेपथ्य में नहीं, मंच पर हैं
नीति-रीति के निर्धारक
निर्णायक भारतीय समय के वर्तमान-भविष्य के
ऐसे में गुजर कहाँ गरीब की
आम आदमी की अहमियत की क्या
इस समय”[8]
एक कविता के उद्धरण से और इसे स्पष्ट देखा जा सकता है। पक्का महाल की
जिस स्थिति को लेकर हम आज चिंतित हो रहे हैं, उसके ढहने से पहले की ज्ञानेन्द्रपति
ने निर्माण कि विध्वंश? कविता में देख लिया था।
“कई दफा
निर्माण के सामने से गुजरना
दरअसल एक विध्वंश के बीच से गुजरना होता है
यह समझ में आता है
गंगा के किनारे-किनारे
गंगाबरार को निगल, गंगशिकस्त में
सिमटी गंगा के पेटे को चांपते
अधबन मकानों के सिलसिले को देख
विध्वंश अब अक्सर निर्माण की शक्ल में उपस्थित
होने लगा है
प्रगति एक शब्द है जिसके मानी प्रभुवर्ग और
प्रजाजन के लिए अलग-अलग हैं।”[9]
चौथे आयाम की कवितायेँ मणिकर्णिका घाट से सम्बंधित कवितायेँ हैं। इन
कविताओं को अलग से रेखांकित करने की आवश्यकता गंगा-घाटों की दृश्यों से अलग इसलिए
भी है कि एक ओर मृत्यु का मातमी माहौल और उसमें भी जन-जीवन की तलाश, बनारस में ही
संभव है। और वहां के सूक्ष्म चित्रों, दृश्यों और जीवन के काव्यात्मक तत्वों को
पकड़ने की बाकमाल खूबी ज्ञानेन्द्रपति ने अपनी कविताओं के माध्यम से किया है। मरघट
पर चाय, शीत में शहर, मणिकर्णिका पर चार बजे की कविताओं में इसे देखा जा सकता है।पांचवां
आयाम शब्द चित्रों का है, मैं इसे मनुष्य चित्र कहूँगा। ज्ञानेन्द्रपति ने बहुत
दिनों के बाद इन कविताओं में समकालीनता के मिज़ाज से अलग हट कर व्यक्ति चित्र या
मनुष्य-चित्र कविता में रचे हैं। इस तरह की कवितायेँ मूलतः प्रगतिशील कवियों के
यहाँ देखा जाता था। जैसे कि केदार जी ने नागार्जुन के बाँदा आने पर कवितायेँ लिखीं
थीं। यूँ तो केदारनाथ सिंह और मदन कश्यप ने भी त्रिलोचन को लेकर कवितायेँ रची हैं,
लेकिन ज्ञानेन्द्रपति के त्रिलोचन अन्यों के त्रिलोचन से भिन्न हैं। इस श्रेणी की
कविताओं में ‘शिला नहीं, शैलेन्द्र’,‘मल्लू मल्लाह’, ‘महात्मा पोई’, ‘कवि कौशिक के
प्रति’, ‘चन्द्रबली की के साथ चाय’, ‘चन्द्रबली जी नहीं रहे’,‘लल्लन सिंह’,‘दीप्तिप्रकाश
मोहंती’, ‘सब से साफ़ : त्रिलोचन’, ‘प्रतिभा-सम्मान’इत्यादि कविताओं को रख सकते
हैं। प्रतिभा सम्मान कविता आचार्य रामचंद्र शुक्ल पर केन्द्रित है। यह कविता मुझे
व्यतिगत रूप में इस लिए पसंद है कि इस कविता के मार्फत हम हिंदी समाज के कृतघ्नता
को बहुत करीब से देख सकते हैं। वह समाज कैसा होगा जिसके भाषा के एक बड़े अध्येता को
उस समाज ने विस्मृत कर दिया हो।इसमें अगर एक और प्रकार की श्रेणी बनानी हो तो इस
संग्रह में संग्रहित लम्बी कविताओं की भी एक श्रेणी बनायीं जा सकती है। ‘पारपुल की
रहगुजर’, ‘न नौ में ना सौ में’, ‘हिंसा के विरुद्ध’, ‘रेत के द्वीप पसर आयें हैं’,
इत्यादि कविताओं को रखा जा सकता है। ज्ञानेन्द्रपति की इन कविताओं से गुजरते हुए
भाषिक स्तर पर जन भाषा और शिष्ट भाषा का भाषिक दोराहा पाठकों को मिलता है।
ज्ञानेन्द्रपति भाषा के संघनन के कवि हैं। उनकी कविताओं में भाषिक संरचना में निराला के काव्य-भाषा का विस्तार देखने को
मिलता है। कई बार यह भाषिक विन्यास हमें चौंकाता है, तो कई बार यह प्रयोग के तौर
पर लगता है, जो चमत्कार पैदा करता है। यह चमत्कार कविता में गत्यावरोध उत्पन्न
करता है, लेकिन इसका भी एक अलग आस्वाद है। समकालीनता के नजरिये से देखें तो यह
गत्यावारोध एक अतिरिक्त सावधानी और एक अतिरिक्त मेहनत की मांग करता है।
ज्ञानेंद्रपति की कवितायेँ आपसे इतनी समर्पण की मांग तो करती ही है। गंगा-तट और
गंगा-बीती को इस लिए भी लम्बे समय तक याद रखा जायेगा कि ये कवितायें दृश्य की
प्रमाणिकता और स्थानिक विवरण का महाख्यान रचती हैं। ज्ञानेन्द्रपति की कविताओं में
मौजूद शब्दों के विशेषण पक्ष को ध्यान में रखे बगैर उनकी कविताओं का पाठ नहीं हो
सकता । ये विशेषण कविताओं में एक भिन्न पाठ के रूप में आते हैं। अगर ‘गंग-बरार’ की
बात है तो आपको ‘गंग-शिकस्त’ भी जानना होगा, बेहद आम से लगने वाले यह शब्द-प्रयोग
विलक्षणता की सहज साधना है। जिसे ज्ञानेंद्रपति अपनी कविताओं के माध्यम से संभव
करते हैं और यहीं उनकी विशिष्टता भी है, जो उन्हें उनके समकालीनों से अलग करती है।दो
बातें इस पुस्तक के प्रोडक्शन पर, पुस्तक का आवरण दीप्तिप्रकाश मोहंती द्वारा
बनाया गया बनारस के घाटों का एक स्केच है, जो धूसरित रंग में होने के कारण इस
संग्रह की कविताओं से मेल खातीं हैं। दूसरी बात यह कि इस किताब का प्रोड्क्शन बहुत
बेहतर हुआ है, वो चाहे छपाई को लेकर देखें या इसकी प्रस्तुति को, इसका सामान्य हिंदी
पुस्तक के आकार में न होना भी एक अलग अहसास पाठकों को कराता है। इस किताब को
सुसंस्कारित ढंग से प्रकाशित करने के लिए सेतु प्रकाशन बधाई के पात्र हैं। अंत में
नजीर अकबराबादी से माफ़ी मांगते हुए कहूँगा कि “कवि कहो, ज्ञानेन्द्रपति कहो- बनारस
का है।”
कुमार मंगलम
शोध-छात्र, इग्नू
नई दिल्ली
[1]ज्ञानेन्द्रपति, गंगातट, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई
दिल्ली, 1999, पृष्ठ 149.
[2]जयप्रकाश, ‘शुभ और सुंदर को आशय रखने वाला...’
शीर्षक आलेख से.
[3]ज्ञानेन्द्रपति, गंगा-बीती, सेतु प्रकाशन, नई
दिल्ली, 2019, पृष्ठ 9.
[4]ज्ञानेन्द्रपति, गंगा-बीती, सेतु प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019, पृष्ठ 53.
[5]ज्ञानेन्द्रपति, गंगा-बीती, सेतु प्रकाशन, नई
दिल्ली, 2019, पृष्ठ 39.
[6]ज्ञानेन्द्रपति, गंगा-बीती, सेतु प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019, पृष्ठ 94.
[7]ज्ञानेन्द्रपति, गंगा-बीती, सेतु प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019, पृष्ठ 183.
[8]ज्ञानेन्द्रपति, गंगा-बीती, सेतु प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019, पृष्ठ 185.
[9]ज्ञानेन्द्रपति, गंगा-बीती, सेतु प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019, पृष्ठ 45.

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