मधुमती अंक-61 (राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर) में छपी पुस्तक 'क्षीरसागर में नींद' की समीक्षा, आलोचक जगन्नाथ दुबे और मधुमती के संपादक ब्रजरतन जोशी का आभार

 

विष्णु जी सो रहे हैं क्षीरसागर में


आज हम जिस समय में जी रहे हैं, इसमें साहित्य या कला की दूसरी विधाओं पर विचार करते हुये ज्यादा जरूरत इस समय और समाज पर विचार करने की महसूस होती है। हमारे कलारूपों में हमारा समय और समाज किस रूप में दर्ज हो रहा है यह जानना आज ज्यादा जरूरी हो गया है। सृजनात्मक अभिव्यक्ति की किसी भी विधा का मूल्यांकन विशुद्ध कला के मूल्यों पर करने की न तो आज जरूरत है, न ही गुंजाइश। क्योंकि यह तो आप भी मानते ही होंगे कि साहित्य या कोई भी कला निर्वात में जन्म नहीं लेती,उसका आधार हमारा समय और समाज ही होता है। इसलिए जब हम साहित्य पर बात कर रहे हों तो हमें समय और समाज पर भी बात करनी चाहिए। इसे उलट कर भी कहा जा सकता है। हम जैसे ही आज का समय,हमारा समय,यह समय जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं वैसे ही हम इस समय को दूसरे समय से अलग कर रहे होते हैं। ऐसा करते हुये हमें यह भी विचार करना चाहिए कि यह जो आज का समय, हमारा समय,यह समय है, यह किस समय से और कैसे अलग है? हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि यहाँ हम जिन शब्दों का प्रयोग अपने समय के लिए कर रहे हैं उनका प्रयोग हर समय में, अपने समय के लिए किया जाता रहा है। इसलिए जब कोई कहे कि हमारा समय तो उसे कुछ ऐसे ठोस संदर्भ अपने समय के लिए देना चाहिए जिससे वह दूसरे समयों से अलग होता हुआ दिखे।  

          यहाँ जब मैं अपने समय की बात कर रहा हूँ तो मेरा बहुत स्पष्ट मानना है कि हमारा आज का समय 1990 के आसपास के बाद की बनी हुई दुनिया का समय है। अब तो कई बार लगता है कि 2014 के बाद के भारत का समय हमारा समय है।  भारत समेत दुनिया के एक बड़े हिस्से में 1990 के आसपास बहुत कुछ ऐसा घटित हो रहा था जो हमारे समय को 1990 से पहले के समय से अलग कर रहा था। भूमंडलीकरण,उदारीकरण और निजीकरण जैसे मूल्य 90 के आसपास के वर्षों में ही विकसित हुये जिनका व्यापक असर हमारे समय की सामाजिक-राजनैतिक संरचना पर पड़ा। भूमंडलीकरण के प्रभाव से पूरी दुनिया का अर्थतन्त्र और सामाजिक ताना-बाना बदल गया। बल्कि कहना यह चाहिए कि बिगड़ गया। इस बदलाव का असर व्यक्ति,परिवार,समाज और राष्ट्र-राज्य सभी स्तरों पर पड़ा। इसके साथ ही दुनिया के नक्शे पर दो बड़ी घटनाएँ और घटित हुईं। सोवियत संघ टूट गया। बाबरी मस्जिद का ढांचा ढहा दिया गया। इन दोनों घटनाओं पर बड़े स्तर पर त्वरित प्रतिक्रिया भले ही न हुई हो पर हमारे आज के समय के लिए ये किसी दूसरी घटना से ज्यादा महत्व की हैं। इन दो घटनाओं से एक तरफ तो दुनिया में समाजवादी राज्यव्यवस्था का स्वप्न-संकल्प टूट गया दूसरी तरफ भारत के सेकुलर स्टेट बने रह पाने की संभावनाओं पर शंका जाहिर होने लगी। आज हम इस देश और दुनिया के बड़े हिस्से में जिस दक्षिणपंथ का उभार देख रहे हैं असल में उसकी पटकथा 90 के दशक की इन्ही घटनाओं से लिखी जा चुकी थी। ये घटनाएँ जिन वर्षों में घटित हो रही थीं उन वर्षों में हिन्दी कविता में जो पीढ़ी प्रवेश कर रही थी उनमें एक महत्वपूर्ण नाम श्रीप्रकाश शुक्ल का है। श्रीप्रकाश शुक्ल अपनी पीढ़ी के उन विरल कवियों में हैं जिनके पास एक खास तरह की लोकसम्बद्ध चेतना है। उनकी यह चेतना ग्लोबल होते समय में अपने लोकेल की तलाश करने के क्रम में विकसित हुई है। इस विकास को भूमंडलीकृत हो रहे बाजार के समानान्तर अपनी लोक-संस्कृति,लोक परम्परा, मिथकीय चेतना और लोक-विरासत को नया अर्थ संदर्भ देने की जद्दोजहद के रूप में देखना चाहिए। इस संदर्भ से जब हम श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताओं को देखते हैं तो उनके सम्पूर्ण कवि व्यक्तित्व के विकासक्रम के कम से कम तीन चरण दिखाई देते हैं। पहला चरण उनके शुरुआती लेखन का है जिसमें उनके शुरुआती दो कविता संग्रह अपनी तरह के लोग और जहां सब शहर नहीं होता तक की कवितायें शामिल हैं। इन कविताओं में लोकजीवन के प्रति एक खास किस्म का रागात्मक लगाव दिखाई देता है। दूसरे चरण में उनके तीन कविता संग्रहों बोली बात’, ‘रेत में आकृतियाँ और ओरहन और अन्य कवितायें को शामिल करते हुये कहा जा सकता है कि यहाँ कवि लोकजीवन,लोक-संस्कृति और लोक-परंपरा के साथ तथाकथित नागर समाज का क्या रिश्ता है? इसपर फोकस्ड है। यहाँ लोक और नागर के बीच का संघर्ष कई बार शासक और शासित के बीच के संघर्ष में बदल जाता है। यह संघर्ष उनके नए कविता संग्रह क्षीरसागर में नींद में भी यदा-कदा दिखाई दे जाता है।  यहाँ लोक जनपदीय चेतना से जुड़कर अपना अर्थ-विस्तार कर लेता है। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताओं का तीसरा चरण उनके नए काव्य संग्रह क्षीरसागर में नींद से शुरू होता है।

          यह संग्रह जिस समय में प्रकाशित हुआ है वह  पोस्ट-ट्रुथ और फेक न्यूज़ क्रियेटिंग मीडिया का रचा हुआ समय है। यह एक ऐसा समय जिसमें घटनाएँ और तथ्य गढ़े हुये हैं। यहाँ ज्ञान उत्पादन के साधन शिक्षण संस्थान नहीं राजनैतिक पार्टियों के आईटी सेल हैं। जिसे पत्रकार रविश कुमार व्हाट्सप यूनिवर्सिटी कहते हैं वहीं से तथ्य और सूचनाएँ तैयार किए जाते हैं। इन पोस्ट-ट्रुथ तथ्य और सूचनाओं के समक्ष ट्रुथ तथ्य और सूचनाएँ मूल्यहीन साबित हो रही हैं। जिस जनता को जागृत करने के लिए साहित्य रचा जाता है अब उसका ज्ञानवर्धन आईटी सेल से किया जा रहा है। जनता को नए तरीके से ट्रेंड किया जा रहा है/कर दिया गया है। अब उसके लिए फ़ैक्ट और इन्फार्मेसन वही है जो व्हाट्सप पर आया है/आ रहा है। हम जिस जनता के लिए लिख रहे हैं वह गायब कर दी गयी है। जो जनता हमारे सामने खड़ी है उसे हमारी भाषा समझ में ही नहीं आ रही है। उसके लिए हम और हमारे लिए वह एलियन जैसी हो गयी है। जो जनता हमारे आसपास है उसकी चेतना पर एक मोटी पोस्ट-ट्रुथ परत जमी हुई है। इस परत को हटाये बगैर उसके लिए हमारे लेखन का कोई औचित्य नहीं है। क्षीरसागर में नींद की कवितायें इस परत को भेद सकने में कामयाब होने की संभावना तलाशने वाली कवितायें हैं। इन कविताओं का वितान इसलिए भी बड़ा है क्योंकि जब सवाल करने का मतलब देशद्रोही होना है तब ये कवितायें सवाल करती ही नहीं हैं सवाल करने को प्रेरित भी करती हैं।

          संग्रह की कविताओं के संदर्भ से बात करने से पहले आखिरी बात और वह यह कि इस संग्रह से पहले श्रीप्रकाश शुक्ल की छवि एक ऐसे कवि की थी जिसकी कविताओं में सामाजिक-राजनैतिक प्रतिबद्धता मौजूद तो है पर वह कविता में बाहरी तौर पर स्पष्ट रूप से दिखती नहीं है। यानि अपनी सामाजिक-राजनैतिक प्रतिबद्धता को लेकर वे सचेत तो हैं लेकिन मुखर नहीं हैं। इस स्तर पर आकर वे केदारनाथ सिंह के साथ खड़े दिखते हैं जिनकी कविताओं में लाउडनेस के अभाव की बात एक आरोप की तरह कही जाती रही है। इस संग्रह में श्रीप्रकाश शुक्ल की पोलिटिकल लाउडनेस बढ़ी है। शायद हमारे समय के दबाव ने इसे संभव किया है।

          क्षीरसागर में नींद संग्रह का नाम ही संग्रह की प्रतीकात्मक कथा कहने के लिए पर्याप्त है। क्षीरसागर में नींद का संदर्भ विष्णु के मिथक से जुड़ा हुआ है। भारतीय माइथालजी में विष्णु को पालनकर्ता माना गया है। अब सवाल है कि लोकतन्त्र में जनता का पालनकर्ता कौन है? उत्तर होगा चुनी हुई सरकार और उसका मुखिया। तब मैं कहूँगा कि यह कविता उसी मुखिया के बारे में है। उस मुखिया पर तंज़ कसती हुई। कविता की शुरुआती पंक्तियाँ हैं-

 

बाढ़ आए

बादल फटे

सूखा पड़े

फसल सूखे

किसान मर जाएँ

महामारी घर कर जाय

 

सरेआम एक आदमी को गोली मार दी जाए

धर्म,जाति और जमीन के नाम पर हत्या कर दी जाए

फिर भी कुछ मत बोलो

विष्णु जी सो रहे हैं

क्षीरसागर में

 

यहाँ आप याद कीजिये युवा कवि उमाशंकर चौधरी की कविता तानाशाह की नींद जिसमें वे लिखते हैं- जब पूरी दुनिया/पाप और पुण्य के बीच/न्याय और अन्याय के बीच/धूमिल पड़ती जा रही विभेदक रेखा को/ढूँढने की एक असफल कोशिश में लगी हुई थी, और/जब भारत का वह एक अदना सा आदमी/बगैर कोई समाचार सुने उसदिन भी/अपने सूखे पड़ चुके खेत पर बैठ/आसमान की ओर निहारने के लिए घर से निकाल चुका था,.... कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे अफ़सोसनाक स्थिति यही है कि यह सब इस आर्यावर्त में हो रहा है और यकीनन विष्णु जी सो रहे हैं। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता विष्णु के दैवीय रूप पर जितना बड़ा प्रश्नचिन्ह है उससे ज्यादा लोकतन्त्र की त्रासदी का बयान है। कविता में कवि जिन घटनाओं के होने की बात कह रहा है जीवन में वह उन्हे घटित होते नहीं देखना चाहता। हर प्रगतिचेता रचनाकार समतामूलक समाज का स्वप्न देखता है। इस संग्रह की कविताओं में भी यह मौजूद है। असमानता,भेदभाव,शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ इस संग्रह की कवितायें मुखर प्रतिरोध दर्ज कराती हैं। पंजाबी के बेहद तरक़्क़ीपसंद कवि अवतार सिंह पाश की एक कविता है जिसमें वे कहते हैं मुझे झूठमूठ का कुछ नहीं चाहिए,मुझे सचमुच का सबकुछ चाहिए। उसी भावभूमि की एक कविता इस संग्रह में जो कुछ हो जाता है शीर्षक से है। पाश की कविता में सत्तासीनों द्वारा झूठे आश्वासन के खिलाफ अपने हक को सचमुच में हासिल करने की दृढ़ इच्छाशक्ति है तो श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता में होने और देने को नियति का भ्रम रचकर सत्तासीन रहने वाले वर्ग के प्रति अस्वीकार का भाव है। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता ज्यादा समकालीन और जरूरी है क्योंकि इसमें धर्म के नाम पर नियतिवाद परोसने वालों की सीधी मुखालिफ़त की गयी है। जब कवि कहता है नहीं बंधी है हमारी नियति/जो कुछ हो जाता है उसके होने से/हम जो कुछ करते हैं/होता वही है। तो यहाँ हजारों वर्षों की होने की नियतिवादी व्याख्या का नकार उपस्थित होता है। यह नकार पहली बार नहीं हुआ है। जबसे नियति के स्वीकार की व्यवस्था बनाई गयी है तभी से नकार की भी उपस्थिति है। इस उपस्थिति को हर समय में नकारा गया है/नकारा जाना चाहिए। किसी के सुगंधित होने से/नहीं होती हमारी देह/सुखी व संतुष्ट/हमारी देह के सुखी व संतुष्ट होने से/जो कुछ होता है/सुगंधित होता है यह जो हमारे होने से होने का भाव है असल में यही आधुनिक और मानवीय भाव है।

          क्षीरसागर में नींद की कविताओं में हमारे समय की सामाजिक-राजनैतिक संरचना का विद्रूप पूरे यथार्थ के साथ उपस्थित हुआ है। 1990  के बाद की भारतीय समाज की जो सामाजिक संरचना निर्मित हुई है उसमें बहुत कुछ के बदल जाने की आहट इस संग्रह में मौजूद है। अमेरिकी पूंजी और बाजार के प्रकोप से जो व्यवस्था विकसित हुई है वहाँ मानवीय मूल्यों के लिए कोई स्थान शेष नहीं है। जो पूंजी के दायरे से बाहर है उसकी जगह लोकतन्त्र में भी नहीं है। इस संग्रह की अधिकतर कविताओं में इस तरह के विकसित हुये गठजोड़ से व्याकुल मानुष मौजूद है। एक ऐसा मानुष जो अपनी व्याकुलता में भी संघर्ष की चेतना को सँजोये हुये है। आंच शीर्षक कविता के मानुष की तरह जो कहता है हमें चिंगारी नहीं/आंच चाहिए/ चिंगारियाँ तो जलाने के काम आती हैं/हमारा काम तो पकाना है/ वह हांडी का चावल हो/या अपने मूल से छिटके हुये शब्द इस संग्रह की अधिकांश कविताओं में ये आंच महसूस की जा सकती है। यह आंच पक्का महाल संदर्भित उन कविताओं में महसूस की जा सकती है जिसके बारे में कवि का कहना है कि यह एक चीख है,शायद आखिरी चीख लेकिन एक कवि आखिर चीख ही तो सकता है। बनारस में पक्का महाल वह जगह है जो विश्वनाथ मंदिर और गंगा नदी के बीच का क्षेत्र है। वहाँ विकट परिस्थिति तब पैदा हुई जब सत्ता के जनविरोधी और सनकी फैसले से एक कॉरीडोर बनाने का संकल्प लिया गया। तर्क दिया गया कि ऐसा करके गंगा माँ को बाबा शिव से मिलाया जाएगा। इस फैसले से पक्का महाल के आसपास की बस्ती के हजारों लोगों को निर्वासित होना पड़ा,जिनमें एक बड़ी आबादी गरीब-दलित समुदाय की थी। मुआवजे के नाम पर वही हुआ जो इस देश में अधिकतम गरीबों के साथ होता है। जितना पीड़ादायी यह निर्वासन था उतना ही पीड़ा बनारस के स्वरूप के ध्वस्त हो जाने की भी थी। पुराने शहरों का यह स्वरूप भी तो आखिर हमारी विरासत का ही हिस्सा है! इस पूरे प्रकरण पर जब बौद्धिक वर्ग चुप्पी साधे बैठा था तो एक कवि (श्रीप्रकाश शुक्ल) चीख रहा था,एक पत्रकार (रविश कुमार) इस पूरी व्यवस्था से सवाल कर रहा था। इस चीख से निकली हुई कवितायें इस संग्रह में दर्ज हुई हैं। इन कविताओं में जो आंच मौजूद है उसकी तपिश बहुत दूर तक जाएगी। आने वाली नस्लें जब हमसे यह सवाल पूछेंगी कि जब इस देश की आत्मा पर चोट की जा रही थी तब आप कहाँ थे? उस वक्त हमारे पास क्या जवाब होगा? तब ये कवितायें आने वाली नस्लों को बताएँगी कि हम चीखने के अलावा कुछ नहीं कर सकते थे इसलिए हम चीख रहे थे। इस कवि की  चीख में हम सबकी चीखें शामिल हैं। इस चीख से संदर्भित कवितायेँ पक्का महाल के टूटने को क्रोनी कैपिटिलज़्म से जोड़कर जिस तरह का पाठ प्रस्तुत करती हैं वह हमारे सभ्यतागत विकास की सम्पूर्ण गाथा कहने में समर्थ है। एक कविता है पक्का महाल में जेसीबी। यह कविता यूं तो पक्का महाल के टूटने की अंतर्कथा व्यक्त करने वाली कविता है लेकिन उस अंतर्कथा में बाजार का चरित्र जिस रूप में सामने आया है वह विचारणीय है। कविता की पंक्तियाँ हैं-

श्रीप्रकाश शुक्ल 

चलते-चलते कुछ का यह भी कहना था कि यहाँ एक बिग बाजार होगा

जहां सब तरह की सामग्री सब प्रकार के दामों में उपलब्ध होगी

और पूजा की दिव्य सामग्री व शव पार्लर के साथ

एक भव्य पंडितालय भी होगा

जिसकी एक ढलान मंदिर की ओर होगी

तो दूसरी मणिकर्णिका की ओर


यह जो बिग बाजार का कल्चर है, इसी कल्चर को विकसित करने के नाम पर बहुत कुछ ऐसा है जिसे नष्ट किया जा रहा है। पक्का महाल से संबन्धित कविताओं के शीर्षक भी उस भयावहता को दर्ज करते हैं जिसे यहाँ की जनता ने देखा और झेला है। पक्का महाल में जेसीबी,पक्का महाल में हथौड़े, मलबे में मकान, पक्का महाल में छायाएं ऐसे ही शीर्षक हैं जिनसे उस बस्ती के तबाह होने की करुण कहानी व्यक्त होती है। इन कविताओं में कवि की पक्षधरता बहुत स्पष्ट है। वह इस पूरी विभीषिका में उस जन के साथ खड़ा है जो सरकार के निशाने पर है। एक कविता है ललिता घाट नाम से। घाट पर चलते हुये कवि संवाद कर रहा है -घाट से।

ललिता घाट पर चलते हुए आज लगा कि

वह कह रहा है कि मुझे एकबारगी तोड़ दो

और जितना जल्दी हो

जेसीबी को इधर मोड दो

मैं किसी मजबूर मजदूर के हथौड़े से

नहीं टूटना चाहता

यह जो घाट की पीड़ा है असल में यह मानवीय बोध की पीड़ा है। यह उस निर्दोष मजदूर के तरफ से बयान है जिसकी ज़िंदगी के असल मकसद रोटी तक ही महदूद होकर रह गए हैं। अपनी बनाई हुई निर्मिति को ख़ुद से ही तोड़ना कितना पीड़ादायी होता है यह एक सर्जक ही जानता है। मजदूर भी तो एक सर्जक ही है, हम सबसे बड़ा सर्जक। एक कवि उस सर्जक की पीड़ा को दर्ज करता है। ऐसी ही न जाने कितनी अनाम पीड़ायें पक्का महाल के ध्वंस में दबकर रह गईं।

          क्षीरसागर में नींद संग्रह में कई कवितायें ऐसी हैं जिनमें मनुष्य की कुछ मूलभूत  प्रवृत्तियाँ दर्ज हुई हैं। ऐसी प्रवृत्तियाँ जो नई सदी के बनते भारतीय समाज की हैं। वे नकारात्मक हैं, पर बहुत तेजी से इस समाज में जगह बना रही हैं। इस तरह की कविताओं में चापलूस, पाँव छूने के किस्से, पाँव छुवाई जैसी कवितायें हैं। चापलूसी एक ऐसी प्रवृत्ति है जो मनुष्य तब करता है जब उसे अपने किए पर भरोसा नहीं होता या अपनी क्षमता के अतिरिक्त कुछ दाय के रूप में पाना चाहता है। इसी ढंग की एक कविता कवि के पिछले काव्य संग्रह ओरहन व अन्य कवितायें में संकलित है कनफुकवे नाम से। इन दोनों कविताओं को एकसाथ पढ़ने पर हमारे समाज का एक ऐसा रूप सामने उपस्थित होता है आदतन ख़ुशामद करने वाले लोगों से बनता है।

          पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में एक नया ट्रेंड विकसित हुआ है। इस ट्रेंड ने घोषणाओं का ऐसा घटाटोप रचा है जिसमें जनता उलझकर रह गयी है। कविता का काम यूं तो तात्कालिकता में जीना नहीं होता पर ऐसा भी नहीं है कि कवितायें तात्कालिकता से प्रभावित नहीं होतीं। इस तरह की तात्कालिक घटनाओं और घोषणाओं से भी कई कवितायें निर्मित हुई हैं जो इस संग्रह में दर्ज हैं। इस तरह की दो कविताओं का उल्लेख यहाँ अपेक्षित जान पड़ता है बुरे दिनों के ख़्वाब और बदलाव। ये कवितायें बन तो रही हैं तात्कालिकता के दबाव से लेकिन इनकी रेंज तात्कालिकता के आर-पार देख सकने की है। जब बदलाव शीर्षक कविता में कवि कहता है कि -अल्लाह के बंदे हैं जो/ईश्वर के धंधे में लिप्त हैं/यादें जिनकी भोथरी हैं/वे स्मृतियों को चमका रहे हैं। तो यहाँ कवि के ऊपर तात्कालिकता का दबाव तो है पर वह हावी नहीं है। अल्लाह के बंदों का ईश्वर के धंधों में लिप्त होना कहकर कवि 1990 के बाद की भारतीय राजनीति के सांप्रदायिक चरित्र को व्यक्त कर रहा है। यादों के भोथरेपन से स्मृतियों के चमकाने का संदर्भ भारतीय समाज में दक्षिणपंथ की पूरी कहानी कह देता है।

          इस संग्रह में पिता पर तीन कवितायें हैं। श्रीप्रकाश शुक्ल ने पिता को एक मूल्य की तरह याद किया है, हमारे समाज में पिता की यथार्थ उपस्थिति के साथ। पिता देवदारु हैं,वे पहरे पर हैं पर रोते भी हैं। पिता कब रोते हैं और क्यों रोते हैं इसे कविता में यूं दर्ज किया गया है।- आजकल पिता बात-बात पर रोते हैं/रोना जैसे अपने होने को जीना है। कहीं कुछ याद आ जाता है तो रोते हैं/ कहीं कुछ भूल जाते हैं तो रोते हैं.... जब वे रोते हैं तब अपने वर्तमान में होते हैं/जब हँसते हैं तब अतीत में। पिता का इस तरह रोना और हँसना बहुत कुछ कहता है। भारतीय समाज में पिता का अस्तित्व जिन मूल्यों को अपने में सँजोये हुये है उसके टूटने की निशानी है पिता का रोना। इस टूटन को कवि की दूसरी कवितायें भी दर्ज करती हैं। पहरे पर पिता खाँसते हैं तो देवदारु पिता अक्सर उदास रहते हैं। हिन्दी कवि कुँवर नारायण के यहाँ नचिकेता पिता से मिलकर आश्वस्त होता है कि उसका संसार अभी जीवित है,श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता में पिता देवदारु की झुकी हुई शाखाओं की मानिंद ख़ुद को समेटते हुये से दिखते हैं। कविता में आया हुआ यह अंतर दो पीढ़ियों की कवि संवेदना से ज्यादा दो पीढ़ियों के समाज का अंतर है।  

          क्षीरसागर में नींद संग्रह में स्त्री जीवन से जुड़ी हुई कई कवितायें भी दर्ज हुई हैं। इनमें स्त्री की पारंपरिक छवियों से अलग संघर्षशील स्त्री की छवि भी दर्ज हुई है। इस संग्रह में एक कविता है आंदोलन शीर्षक से। यह कविता स्त्री जीवन और उसके संघर्ष की पूरी परंपरा का बोध विकसित करने वाली कविता है। कविता की पंक्तियाँ हैं

जब वे देखते थे देह के उभार को /उनके देखने के भार से वे झुक जाती थीं।

जब उन्होने दिखाने शुरू कर दिये अपने विचारों के उभार/उनकी आँखों में उतर आई हिंसा/और वे कातिल हो गए

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जिसे आप आंदोलन कहते हैं/वह कुछ और नहीं /उनकी देह के भीतर बैठे भय का विसर्जन है।

 

          इस कविता में पुरुषवर्चस्ववादी मानसिकता के खिलाफ स्त्री के प्रतिरोध की प्रतिक्रिया में पुरुष द्वारा स्त्री के मूल्यांकन का संदर्भ दर्ज हुआ है। ऐसा नहीं है कि यह संदर्भ श्रीप्रकाश शुक्ल के यहाँ पहली बार दर्ज हुआ हैं इसलिए इसपर विचार करना चाहिए। यह संदर्भ श्रीप्रकाश शुक्ल से पहले बहुत से कवियों के यहाँ दर्ज हुआ है और श्रीप्रकाश शुक्ल के बाद भी बहुत से कवियों के यहाँ दर्ज होगा। इसकी यहाँ चर्चा इसलिए जरूरी है कि यह संदर्भ जहां और जितनी बार दर्ज हो उसे वहाँ और उतनी बार रेखांकित करना जरूरी है। यह जरूरत हमतरे मानवीय बने रहने की निशानी है। 

यह संग्रह अपनी बनावट में विविध रंगी है। इस संग्रह में  21वीं सदी का भारतीय सामाजिक-राजनैतिक ताना-बाना तो दर्ज हुआ ही है जिसे हम हाशिया समझते आए हैं उसकी आवाज भी मुखरता से दर्ज हुई है। भारतीय लोकमानस में मौजूद मिथकीय चेतना से जुड़ी कई कवितायें इस संग्रह में मौजूद हैं। यह संग्रह कठोर और मुलायम के बीच बने हुये तनाव को जानने वाले कवि का संग्रह है। जो आंच की मांग करता है। जिसकी कविताओं में आंच मौजूद है।

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आलोचक : जगन्नाथ दुबे 

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय,वाराणसी 221005

मोबाइल-6389003142

समीक्ष्य संग्रह-क्षीरसागर में नींद,कवि श्रीप्रकाश शुक्ल,प्रकाशक-सेतु प्रकाशन, नई दिल्ली

       

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