संसार में कितनी तरह की कविताएं लिखी जाती हैं। देश काल परिस्थिति को छूती और कभी कभार उसके पार जाती हुई। कभी दुख कभी सुख कभी आह्लाद कभी विषाद कभी शोक कभी अपार भावविह्वलता से भरी कितनी तरह की कविताओं से हम आए दिन गुजरते हैं। हमारे हर क्षण के मनोविज्ञान से उलझती हुई, समय समाज और व्यवसथा की विडंबनाओं को उधेड़ती हुई, सत्ता प्रतिष्ठानों को प्रश्नांकित करती हुई, प्रकृति के बियाबान में अपने लिए काव्य सौष्ठव के उपादान संजोती हुई और अपने कथ्य को विभिन्न अलंकरणों, रूपकों, उपमानों उपमेयों उत्प्रेक्षाओं और सौंदर्य के अंतस्तत्वों से निमज्जित करती हुई कितनी तरह की कविताओं से यह संसार भरा है। न कविता का लिखा जाना खत्म होता है न अपार भाव समुद्र जो हर वक्त लहराता ही मिलता है अपनी उत्ताल तरंगों में जीवन जगत के सौंदर्य और रहस्यों को समेटे हुए।
ऐसी ही भाव-तरंगों से टकराती हैं अशोक वाजपेयी की कविताएं जिनके अब तक दर्जनों कविता संग्रह आ चुके हैं। शहर अब भी संभावना है(1966) से लेकर कम से कम(2019) तक उनकी कविता ने एक सुदीर्घ यात्रा तय की है। इस दौरान उन्होंने आलोचनाएं भी बहुत लिखी हैं। अपने देश और काल के मुद्दों पर वैचारिक आलेख और गद्य भी। यों तो समय समय पर उनके चयन आते ही रहे हैं। इससे पहले उनका एक कविता चयन 'विवक्षा' प्रकाशित हुआ था तथा उनकी कविताओं के दो खंड भी आ चुके हैं। इस बार जब वे 80 के हो चुके हैं, उनके अब तक के कविता संसार को दो खूबसूरत खंडों में संजोया है सेतु प्रकाशन ने। इसी के साथ उनके स्वतंत्र रूप से व रेनाता चेकाल्स्का के साथ किए विदेशी कवियों की कविताओं के अनुवाद का एक तीसरा खंड भी इसी में शामिल है। याद है विश्व कविता समारोह के दौरान आए विदेशी कवियों के कविता चयन 'पुनर्वसु' ने विश्व के तमाम उल्लेखनीय कवियों को पहली बार इतने समादर के साथ भारतीय कविता के परिवेश और परिसर में जगह दी थी। इसी के साथ हिंदी कवियों के बीच विदेशी कवियों की पैठ बननी शुरू हुई। वे कवियों के अध्ययन कक्ष का अंग बने। ग्लोबलविलेज की अवधारणा बेशक बाद में आई पर कवियों का एक ग्लोबल समवाय पहले से ही बन चुका था। वैसे भी कविता ही है जो कोई सीमाएं नहीं मानती।
अशोक वाजेपयी की कविता के पहले दोनों खंड उनके कवितावदान को समझने में सहायक हैं। यह भी कि अपने समकालीनों से उनका लेखन कमतर नहीं है। उनकी कविताओं का प्ररूप प्रारंभ में और बाद में भी प्राय: वैयक्तिक रहा है। निज के प्रक्षेपण उनके यहां प्रभावी रहे हैं। उन्होंने डूब कर प्रेम की कविताएं लिखी हैं तो अवसान, मृत्यु, पारिवारिकता और विलोपन की कविताएं भी कम न होंगी। उनकी कविताओं का सौंदर्यगत सौष्ठव पारंपरिक नहीं है, वह मुक्त छंद के स्थापत्य से संवलित है।
विदेशी कविताओं के विशद पठन पाठन ने न केवल अशोक वाजपेयी बल्कि उनके अनेक समकालीनों के चित्त को आकर्षित किया है। इस आकर्षण की मौजूदगी ऐसी कविताओं के स्थापत्य में कहीं न कहीं दिखती है। इसलिए जिस देशज अंदाज से आधुनिक हिंदी कवियों में त्रिलोचन बोलते हैं, नागार्जुन बोलते हैं, जिस प्रखर दो- टूक शब्दावली में केदारनाथ अग्रवाल बोलते हैं, जिस आधुनिक भारतीय भाषा संवेदना के साथ केदारनाथ सिंह बोलते हैं, जिस अंदाजेबयां के साथ राजेश जोशी लिखते हैं, जिस भाषाई वैभव के साथ ज्ञानेन्द्रपति बोलते हैं, अशोक वाजपेयी की कविता उससे कुछ अलग दिखती है। हालांकि उनकी कविताओं में भी भारतीय परिवेश की बारीकियां नजर आती हैं पर उसकी निर्मिति विदेशी कविता के ढॉंचे से मेल खाती है। वह कवि की चित्तवृत्ति को एक अलग भाव संप्रेषण में पर्यवसित करती है। यहां तक कि ऐसी कविताओं में कभी कभी देश काल भी बहुत मुखर होकर बोलता नहीं दिखता। कविता शाश्वत अभिव्यक्ति सी लगती है किसी भी देश काल परिस्थिति से मुक्त आख्यान रचती हुई। वहां समकालीनता की आवधिकता बहुत दृश्यमान नहीं होती।
तथापि अशोक वाजपेयी की कविता का संसार बहुत लुभावना है। पद प्रत्यय बहुत मनोहारी हैं। देवता, नक्षत्र, प्रकृति, पृथ्वी, आकाश, प्रतीक्षा, कामना, उम्मीद, हताशा जैसे प्रत्यय कविताओं में बार बार आते हैं। उनकी प्रेम कविताओं का स्थापत्य तो इतना सुगठित और कमनीय लगता है जैसे किसी गीत के पद को तोड़ कर लिख दिया गया हो। उससे एक स्नेहिल आभा आलोकित होती हुई दिखती है। चूँकि कविता का काम केवल रमणीयार्थ प्रतिपादक की ही साधना नहीं हैं, उसमें अपने बीहड़ समय की पुकार को भी सुनने का माद्दा होना चाहिए ---अशोक जी के यहां यह पुकार न तो मुक्तिबोध जैसी है, न विनोद कुमार शुक्ल जैसी। वह वैसी कलावादी भी नहीं है जिसके लिए वे सुख्यात या कुख्यात रहे हैं। उनके कवि ने अपनी निजता के लोकतंत्र की रक्षा भी की तथा धीरे धीरे अपने उत्तर जीवन में समाज के सुख दुख में शामिल होने की चरितार्थता भी कायम की।
गुजरात त्रासदी के समय से ही उनके कवि ने करवट बदली तथा अपने ही कविता कवच को तोड़ते हुए उसके सामाजिक प्रतिपाद्य को समझने की कोशिश की। तत्काल तो नहीं पर कुछ समय बाद इसका प्रतिफल उनकी कविताओं में दिखने भी लगा। इससे पहले वह सत्ता से टकराती हुई नजर नहीं आती। वह मानवीय व नियति के प्रश्नों से टकराती है पर एक खास भाषायी अध्यात्म रचते हुए। उसमें निज की सांसारिक प्रवृत्तियॉं ज्यादा हावी दिखती थीं। 'दुख चिट्ठीरसा है' से उनकी कविता देश काल के गवाक्ष से सत्ता के चरित्र का उन्मीलन करती है तथा उत्तरोत्तर कवि के कार्यभार उठाती हुई 'कहीं कोई दरवाजा', 'नक्षत्रहीन समय में' व 'कम से कम" में अपने राजनीतिक बोध और प्रतिरोध का सांकेतिक निर्वचन करती हुई दिखती है। अपने विचारों में तो वे पिछले डेढ़ दशक से सत्ता के सांप्रदायिक चरित्र से टकराते रहे हैं पर कविताओं में राजनीतिक चेतना उस तरह से छन कर नहीं आती कि वह किसी वैचारिक एजेंडे से परिचालित दिखे। पर बिना लाउड हुए कविता में शाइस्तगी से वह सब कह देना कि कवि का असली मंतव्य समझ में आ जाए, वैसा उनकी उत्तरवर्ती कविताओं में स्पष्ट दिखता है।
अशोक वाजपेयी की कविताएं शुरु से ही पढ़ता रहा हूँ। उनकी भाषा-संवेदना और कथ्य के निरूपण में आधुनिकता दिखती है। इस वजह से वह ध्यानाकर्षी बन जाती है। अब जब सारी कविताएं पुन: दो प्रशस्त खंडों में समाविष्ट होकर प्रकाशित हैं ---उनके अद्यतन कविता संसार को कविता की कसौटियों के साथ विवेचित करने में आसानी होगी। उन्हें समझने की राहें प्रशस्त होंगी इसमें संदेह नहीं। सेतु प्रकाशन ने सर्वथा शुद्धता के साथ इसे प्रकाशित किया है यह देख कर बची खुची प्रकाशकीय गरिमा के प्रति आश्वस्ति होती है।
संस्मरण क्यों लिखे
जाते हैं? क्या उनके बहाने
अपने पूर्वजों का ऋण स्वीकार करना ही संस्मरणों का उद्देश्य होता है? क्या वे जितनी संस्मृतों के बारे में होते हैं
लगभग उतने ही संस्मरणकार के बारे में भी? क्या संस्मरणों से इतिहास की अपेक्षा करना अनुचित है? कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी के संस्मरणों की
पुस्तक अगले वक्तों के हैं ये लोग पढते हुए कथेतर साहित्य से जुड़े ये सवाल फिर
खड़े हो जाते हैं। सुदीर्घ और व्यापक सार्वजनिक जीवन में रहे अशोक वाजपेयी के ये
संस्मरण विगत पचास पचपन सालों के सांस्कृतिक परिदृश्य पर भी टिप्पणी हैं। अस्सी के
दशक में भोपाल के भारत भवन के पुरस्कर्ता रहे अशोक वाजपेयी की गहरी दिलचस्पी
साहित्य और कलाओं के सार्वजनीकरण में रही। वे भारत भवन और अन्यान्य संस्थाओं के
मार्फत यह कोशिश करते रहे कि कलाकारों और साहित्यकारों की सार्वजनिक उपस्थिति बढ़े
और समाज में साहित्यप्रेमी रसिक लोगों की संख्या बढ़े। स्वाभाविक ही था कि इसके
लिए उन्होंने विभिन्न कलाकारों और साहित्यकारों का सहयोग लिया। अगले वक्तों के हैं
ये लोग में सिर्फ इन्हीं लोगों का विगत नहीं है,
यहां मुक्तिबोध जैसे लेखक भी हैं जिनकी पहली पुस्तक ही उनके
निधन के बाद छप सकी।
अशोक वाजपेयी के
संस्मरणों की पहली विशेषता है संस्मृत के अवदान पर आलोचनात्मक निगाह। वे किसी
व्यक्तित्व की आभा से मुग्ध होते हुए भी उसके अवदान का मूल्यांकन करते हुए भूलते
नहीं कि व्यापक परंपरा में संस्मृत की जगह कहां होगी (यदि कोई है तो), साथ ही देशकाल के प्रसंग में भी उसके योगदान को
देखने का प्रयत्न इन संस्मरणों को खास बनाता है। व्यक्तित्वों के आकर्षण में
चुटीले प्रसंग खोजना और उन्हें चमकीली भाषा में प्रस्तुत करना संस्मरणों को
लोकप्रिय बनाने का अचूक नुस्खा है लेकिन वाजपेयी को इसकी आवश्यकता नहीं है। अपने
संस्मतों के व्यक्तित्वों की गंभीरता का समूचा तापमान इन संस्मरणों में मौजा है।
पस्तक का प्रारंभ अज्ञेय पर लिखे संस्मरण से होता है जिसे उन्होंने गरेका
हार्तिकता से रचा है। भारत भवन के संबंध में ही अज्ञेय और वाजपेयी के संबंध तनावपर्ण
दो गए थे और 'बढा गिद्ध क्यों पंख
फैलाये' जैसे समीक्षा लेख के
कारण अज्ञेय से उनकी टी दिखाई देती थी। संबंधों की इस तनी हुई रस्सी पर वाजपेयी
संतुलन साधने के बजाय अडिग और अविचल रहकर अज्ञेय के व्यक्तित्व का बखान करते हैं।
सागर विश्वविद्यालय में छात्र जीवन के दौरान ही वे अज्ञेय के संपर्क में आ गए थे
और उनके पाठक प्रशंसक हो गए थे। प्रशासनिक सेवा में आने के दौरान और तदुपरांत अनेक
छोटे बड़े प्रसंगों के कारण अज्ञेय और उनमें दूरियां बढ़ती गईं। वाजपेयी ने लिखा
है, "सैद्धांतिक
स्तर पर वे सत्ता की संस्कृति में हस्तक्षेप से कतई और उचित ही, असहमत थे। मेरी असफलता यह थी कि मैं उन्हें या
उन जैसे कुछ औरों को यह नहीं समझा पा रहा था कि मध्य प्रदेश में सांस्कृतिक विकास
का एक बिलकुल नया मॉडल विकसित हो रहा था जिसमें सरकार का धन और साधन थे पर
हस्तक्षेप बिलकल नहीं। यह भी कि एक लेखक होने के नाते मैं सरकार के किसी भी
हस्तक्षेप को बीच में रोक लेता था। यही नहीं,
स्वयं संस्कृति विभाग अपनी स्वायत्त संस्थाओं को पूरी
स्वतंत्रता के साथ काम करने दे रहा था। हस्तक्षेप होता तो स्तरधर्मिता नहीं हो
सकती थी जिसके लिए इन संस्थाओं की कीर्ति फैल रही थी। पर प्रवाद यह व्याप्त था कि
सभी संस्थाएं मेरे कड़े और लगभग निजी नियंत्रण में हैं। इसलिए अगर उनमें कोई
गड़बड़ी हो तो उसके लिए अक्सर दोषी और जवाबदेह मैं मान लिया जाता था।" वामपंथी लेखक संगठनों ने भारत भवन का बहिष्कार
किया था और यहां की गतिविधियों को कलावादी गतिविधियां मानकर उन्हें समाजविरोधी
प्रतिक्रियावादी वाग्विलास घोषित करने का चलन था। अब रोचक बात यह है कि कलावादी
लेखन के पुरोधा माने जाने वाले अज्ञेय इस भारत भवन और यहां की गतिविधियों पर अपने
विरुद्ध संदेह की दृष्टि रखते थे। वाजपेयी ने लिखा है,
"विडंबना यह थी कि हम पर अज्ञेय की मूल्यदृष्टि
का विलंबित और अधिक चालाक संस्करण होने का आरोप लगता रहा जबकि अज्ञेय हमसे मुंह
फेरे बैठे थे। दूसरी ओर बावजूद संघों के प्रस्तावों
और सेंसर के, प्रमुख प्रगतिशील लेखक हमारे साथ सहयोग करते
रहे। अज्ञेय के साथ हमारी स्थिति नाजुक बनी हई थी।"
अंतत: इला जी के प्रयासों से अज्ञेय भारत भवन की गतिविधियों
में आने के लिए तैयार हए और यह उनके जीवन का भी अंतिम दौर ही था। अज्ञेय आए और
उन्होंने अपनी अप्रासंगिकता (उपेक्षा?) पर टिप्पणी भी की। अशोक वाजपेयी ने इस समूची स्थिति पर लिखा, "क्या अज्ञेय की नियति में, बिना पढ़े अप्रासंगिक मान लिए जाने में हम कई
लोगों की भी नियति का पूर्वाभास नहीं है? एक ऐसे समाज में, जो इतने बड़े लेखकों
को उनकी कृतियों के पढ़े समझे जाने की बुनियादी सुविधा न दे, लिखते रहना किसी हद तक साहस और क्या किसी हद तक
ट्रेजिक लाचारी का मामला नहीं है?" इस
संस्मरण का समापन अज्ञेय के निधन प्रसंग से हआ है जहां चिता की लपटों में अज्ञेय
विदा हो रहे थे और संस्मरणकार की टिप्पणी थी,
"राग विराग के तीस वर्ष मेरे अंदर जैसे धीरे
धीरे खाक हो रहे थ। कुछ था जो मेरे भीतर भी जलकर भस्म हो रहा था। भरी दोपहर में
मैं सूर्यास्त देख रहा हममें से कई उनकी देह को भस्मावशिष्ट होते देखते हुए मन ही
मन पा लागन कर रहे थे।"
शमशेर बहादुर सिंह, त्रिलोचन और मुक्तिबोध पर लिखे गए संस्मरणों
में तनाव के ये प्रसंग नहीं हैं लेकिन इन संस्मरणों को पढकर पाठक के मन में इन मूर्धन्य
कवियों के प्रति सम्मान और श्रद्धा का भाव गहरा होता है। जाहिर है वाजपेयी किसी
श्रद्धा की फलश्रति के लिए संस्मरण नहीं लिख रहे लेकिन यहां आए प्रसंग और वर्णन की
हार्दिकता से ऐसा होता है। क्रूर और असंवेदनशील होते जा रहे मनुष्य समाज में
स्मृतियां ऐसा काम करें तो यह साहित्य के लिए शुभ ही है। अच्छी बात यह भी है कि
वाजपेयी संस्मरणों के बहाने किसी कलुष का संधान व उत्खनन नहीं करते बल्कि
संस्मृतों के उज्ज्वल और गहरे मानवीय पक्षों को फिर फिर खोलने में उनकी रुचि दिखाई
देती है। जैसे शमशेर जी के लिए वे लिखते हैं,
"यह शमशेर का स्वभाव था वे अपने कवि स्वभाव से
सर्वथा विपरीत कवियों जैसे मुक्तिबोध को भी बहुत शिद्दत और ईमानदारी से पसंद करते
और उनके लिए लड़ सकते थे।" उनकी कविताओं को याद
करते हुए जीवन के आलोक में इस टिप्पणी को देखिए,
"बहुत सारे अभावों के बावजूद शमशेर का जीवन
अधूरा नहीं था। इतनी सारी अधपंक्तियों और अधर में लटके शब्दों के बावजूद शमशेर की
कविता मुकम्मल है। एक आदमी के रूप में शमशेर भले जिंदगी भर अपने को खयाल से भी कम
समझते रहे हों पर यह स्पष्ट है कि उनमें अद्वितीय पूर्णता थी।" इसी तरह जब वे त्रिलोचन को याद करते हैं तो
उनकी 'निपट मानवीयता' का रेखांकन नहीं भूलते और यह भी लिखते हैं कि "हिंदी की परंपरा के अनुरूप उन्हें वह सब नहीं
मिला जिसके कि वे सर्वथा सुपात्र थे।" मुक्तिबोध पर लिखा गया संस्मरण किंचित घटना बहुल है और उसमें मुक्तिबोध के
व्यक्तित्व की भी अनेक परतें खुलती हैं। मसलन उनका अत्यंत साधारण जीवन और उनका 'अपने असली कद से बेखबर'
होना। यहां एक रेलयात्रा में मुक्तिबोध और अशोक वाजपेयी
भोजन प्रसंग भी आया है जिसे मुक्तिबोध की अत्यंत साधारण जीवन स्थिति और वाजपेयी जी
की गहरी नैतिकता के लिए याद रखा जा सकता है।
अशोक वाजपेयी
परसाई जैसे
विचारधारा के लिए प्रतिश्रुत लेखक पर लंबा संस्मरण पढ़ना अनेक पाठकों के लिए
प्रीतिकर अनुभव हो सकता है क्योंकि वाजपेयी न केवल परसाई के संबंध में अनेक
प्रशंसात्मक टिप्पणियां लिखते हैं अपितु अपने कार्यों की सिद्धि में परसाई के 'प्रोत्साहन के बल'
को भी श्रेय देना जरूरी समझते हैं। उन्होंने लिखा है, "परसाई की लड़ाई खुली लड़ाई थी, उसमें छिपकर वार करने की युक्ति कभी शामिल नहीं
हो पाई।" और, “पवित्रता को लेकर इतने अधिक छद्म परसाई के
सामने थे कि वे उसके विरुद्ध हमेशा ही फरसा लिए खड़े नजर आते हैं। उन्हें किसी
पवित्रता की खोज न थी। वे तो साधारण ईमानदारी,
हिम्मत और पारदर्शिता में भरोसा रखते थे।" और भी देखिए,
"भारत के सार्वजानिक जीवन में स्वतंत्रता के बाद
स्थापित लोकतंत्र के कुछ लेखक प्रामाणिक साक्षी कहे जा सकते हैं, परसाई उनमें से थे।"
लोकतंत्र की कसौटी पर ही वे जैसे कृष्णा सोबती के मुरीद हैं
और उनके लेखकीय व्यक्तित्व से कहीं अधिक उनकी निर्भीकता और जागरूकता के प्रशंसक
दिखाई देते हैं। निर्मल वर्मा पर लिखा गया संस्मरण पुस्तक के अच्छे संस्मरणों में
है जिसमें संस्मृत के प्रति संबंधों का राग विराग पारदर्शी ढंग से आया है। वाजपेयी
जहां निर्मल जी के गद्य और चिंतन के प्रशंसक हैं वहीं जीवन के उत्तरार्ध में उनकी
भारत व्याकुलता और कांग्रेस दुराग्रह के प्रति आलोचक। निर्मल वर्मा पर पूर्वग्रह
का विशेषांक और पुस्तक संपादित करने वाले वाजपेयी याद करते हैं कि 'कड़े शब्दों में महर्षियों, भगवानों,
साईं बाबाओं, बालयोगियों की भर्त्सना' करने वाले निर्मल
वर्मा 'अंतत: आत्मनिष्ठ' प्रतीत होते है और उनकी टिप्पणी है, "हम सबके लिए यह दुखद अचरज की बात रही है कि ऐसा
मत रखने वाला बुद्धिजीवी बुद्धिविरोधी शक्तियों का पक्षधर हो गया। यह ऐसा स्खलन था
जो न तो समझ में आता है, न उसका बचाव किया जा
सकता है सिवाय यह नोट करने के कि इस स्खलन से उनकी रचना मुक्त रही।"
इन संस्मरणों में
जहां तहां कवियों और साहित्य पर अशोक वाजपेयी गहरी टिप्पणि करते हैं जो अक्सर
उक्तियों की तरह मालूम होती हैं। ये टिप्पणियां उनके व्यापक अनभवों और विशद अध्ययन
का प्रमाण हैं। जैसे-"नागार्जुन त्रिलोचन
शमशेर में एक समानता अलबत्ता थी : उन्हें अपने कवि होने के कारण विशेष होने का
रत्तीभर अहसास नहीं था। आम रोजमर्रा की जिंदगी में आम आदमी की तरह ही व्यवहार करते
थे और अपनी धजा सजा का उन्हें कोई खयाल नहीं रहता था।"
कवि राजनेता श्रीकांत वर्मा पर उन्होंने लिखा है, "वे हमेशा नरक के कवि रहेंगे जो हमें उजालों के
झूठ, उम्मीदों के फरेब और
सपनों के मायाजाल से सतर्क करते रहेंगे ताकि हम अपने दु:स्वप्न, नियति और नश्वरता को खली आंखों देख और झेल सकने
का साहस जुटा पाएं। ऐसा नरक जो उतनी ही ईमानदारी से उन्होंने दूसरों पर थोपा नहीं।
बीसवीं शताब्दी का अंधेरा जिन हिंदी लेखकों में है,
उनमें वह श्रीकांत वर्मा के यहां शायद सबसे गाढ़ा और बेराहत
है।"
पुस्तक का बड़ा भाग
शास्त्रीय संगीत और चित्रकला के पुरोधाओं पर लिखे संस्मरणों का है। सचमुच यह हिंदी
लेखन का कमजोर पक्ष है कि कलाओं और कलाकारों पर हिंदी में लिखने का चलन नहीं है।
अशोक वाजपेयी भारत भवन और बाद में भी लगातार कलाओं के सक्रिय पक्षधर बने रहे हैं।
उन्हें कलाओं और कलाकारों पर सरुचि लिखने के लिए भी जाना जाता है। यहां
मल्लिकार्जुन मंसूर, कुमार गंधर्व, सैयद हैदर रजा,
जगदीश स्वामीनाथन, हबीब तनवीर और ब. व. कारंत पर उनके संस्मरण गुजरे दौर के इन कला मूर्धन्यों
के प्रति हार्दिक भावांजलि हैं। इन कलाकारों के व्यक्तित्व और इनकी मान्यताओं को
समझने में वाजपेयी के संस्मरण काम के हैं। मंसूर जैसे बड़े गायक निजी जीवन में
कितने सरल और निस्पृह थे यह जानना सचमुच सुखद है। इसी तरह चौंकाने वाली बात है कि
भारत भवन के आयोजनों में कुमार गंधर्व की सक्रियता एक आयोजक या संस्थान के न्यासी
के रूप में भी हो सकती थी। जगदीश स्वामीनाथन पर लिखते हुए वाजपेयी बहुत रम जाते हैं
और उनके संबंधों की उष्मा साफ दिखाई देती है। दूसरी तरफ रजा साहब पर लिखा गया
संस्मरण पुराना है और पाठक इसे स्वीकार करने में किंचित कठिनाई महसूस करता है।
विभा कारंत कांड वह घटना थी जिसने भारत भवन की कीर्ति को खंडित किया। इसका आंशिक
उल्लेख एक जगह हुआ है किंतु आश्चर्यजनक ढंग से कारंत पर लिखे संस्मरण में इस कांड
का कोई जिक्र नहीं है।
जिस तनाव की चर्चा
पुस्तक के पहले संस्मरण के संबंध में हुई थी लगभग उसी तनी हई रस्सी पर अशोक
वाजपेयी तब भी चलते हैं जब वे अर्जुन सिंह पर लिखते हैं। एक तो पुरानी पीढ़ी के
राजनेताओं पर लिखने में यह सुविधा थी कि स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट निर्माण के
अवलंबन से उन पर लिखने का कोई नैतिक संशय न रह जाता था जबकि इधर के राजनेताओं पर
लिखना सचमुच जोखिम की बात है।
इन संस्मरणों की
भाषा पर भी अलग से बात की जा सकती है जिसमें सहज अभिव्यक्ति के साथ ऐसे प्रयोग हैं
कि पाठक एक शिष्ट मुस्कराहट से भर जाए। गद्य में लालित्य के लिए उन्हें चलताऊ
शब्दों और घिसे हुए अनुप्रासों की जरूरत नहीं लगती। वे अपनी गरिमापूर्ण अभिव्यक्ति
को कमजोर क्षणों में भी कातर नहीं होने देते। कवियों का गद्य कहना भले पुरानी बात
लगे लेकिन इन संस्मरणों की भाषा सचमुच प्रसन्न,
जीवंत और भंगिमाओं से भरी है। जैसे हबीब तनवीर पर ये वाक्य
देखिए, "उनका
बहुत सारा सच उनके सपने से उपजा था और उनका सपना उनके बहुत सारे सच को अर्थ देता
था। बाहर की दनिया में सचाई और सपने के बीच कितनी ही दूरी क्यों न रही हो, हबीब अपने रंगकर्म में इस दूरी को लांघ जाते
थे। उसमें सच सपना हो जाता था, सपना सच हो जाता था।" संस्मरणों पर इधर आई अनेक पस्तकों में भाषा और
प्रस्तुति की यह सुगढ़ता विरल ही है।
पुस्तक में अनेक
प्रसंग ऐसे हैं जो अनेक बार आए हैं जैसे अस्पताल में मृत्यु शैया पर पडे मक्तिबोध
का प्रसंग पुस्तक में अनेक बार आया है लेकिन भिन्न भिन्न व्यक्तियों के संदर्भो
में एक प्रसंग कैसे भिन्न अर्थ छवियां देता है यह देखा जा सकता है। मुक्तिबोध की
इस स्थिति में शमशेर को देखना अत्यंत कारुणिक है जो अपने मित्र और श्रेष्ठ कवि के
लिए भावविभोर दिखाई देते हैं, श्रीकांत वर्मा के
संबंध में यह समूचा प्रसंग एक और नयी छवि गढ़ता है तो अज्ञेय को अस्पताल में देखना
भी भिन्न अनुभव ही है। कथेतर विधाओं में संस्मरण का वैशिष्ट्य भी इस प्रसंग में
समझना चाहिए कि एक ही घटना या भाव को भिन्न भिन्न व्यक्तियों के प्रसंग में देखना
कैसे पृथक और किंचित नया अनुभव होता है। बेहतर होता कि इसी पुस्तक में नामवर सिंह, रघुवीर सहाय,
कुंवर नारायण, ज्ञानरंजन और विद्यानिवास मिश्र पर भी संस्मरण होते, जिनमें से कुछ के न होने का उल्लेख लेखक ने
भूमिका में किया है। अच्छा ही है कि इन सबके लिखे जाने पर संस्मरणों की एक और
पुस्तक संभव होगी। भूमिका में उन्होंने स्मृति को सृजन से जोड़ा है; कहना न होगा कि स्मृति का यह सृजन उजाला करता
है और इधर की समूची निराशा में आशा के भूले हुए किसी द्वीप सरीखा लगता है। और यह
कह देना भी किसी चालू रिवायत जैसा ही लगे तब भी कहना होगा कि पिछले पचास सालों के
सांस्कृतिक परिदृश्य का ऐतिहासिक विवरण इस पुस्तक में आ गया है। स्वतंत्र भारत की
सांस्कृतिक नीतियों और कार्रवाइयों के अध्ययन के लिए तो यह किताब अनिवार्य संदर्भ
की तरह रहेगी।
अपने संस्मरणों में
वाजपेयी का अपना व्यक्तित्व भी उभरता है। नेमिचंद्र जैन पर लिखते हुए उनके
मार्क्सवादी आग्रहों का उल्लेख करते हैं और इस उल्लेख को पढ़ते हुए पाठकों को
वाजपेयी की मार्क्सवाद के प्रति पुरानी तल्खियां याद आ सकती हैं। पुराने पाठक
आलोचना में ऐसी एक परिचर्चा को यादकर निश्चय ही मुस्करा सकते हैं। कहना चाहिए कि
समय के साथ वाजपेयी भी अपने आग्रहों पूर्वाग्रहों से आगे बढ़े हैं। एक और बात उनके
प्रशासनिक अधिकारी होने से जुड़ी है। वाजपेयी को जानने वाले किसी भी पाठक को यह
पुस्तक पढ़ने से पहले अंदेशा हो सकता है कि संस्मरणों के बहाने यहां लेखक कहीं
अपनी उपलब्धियों का अंकन न करने लगे क्योंकि पूरी सावधानी के बावजूद तथ्यों की
प्रस्तुति से वे बच नहीं सकते। ऐसे किसी प्रसंग से पहले वे जिस सावधान की मुद्रा
में आते हैं वह दर्शनीय है और संस्मरण विधा में दिलचस्पी रखने वालों को उससे सीखना
चाहिए। जैसे यह वाक्य, “किसी हिंदी प्रदेश
में होने वाली सदी की सब से बडी और व्यापक सांस्कृतिक पहल का मैं लगभग कर्णधार
बना।" यहां 'लगभग' का प्रयोग सचमुच उन्हें आत्मप्रशंसा के गहरे कुंड में गिरने से बचा ले जाता
है। ऐसे ही अन्य प्रसंगों में वाजपेयी जी का भरसक प्रयत्न रहा है कि तथ्यों को
क्षति पहुंचाए बिना बात कहते रहें और कहीं भी आत्मश्लाघा न हो। बहरहाल इन
संस्मरणों में एक जिद्दी कलाप्रेमी और अपने संकल्पों में अडिग सांस्कृतिक उद्यमी
को देखना अब दुर्लभ हा है क्योंकि जिस समय और समाज ने वाजपेयी जैसे लोगों के लिए
यह संभव किया कि नए दौर में भी वे संस्कृति का उद्यम कर सकें वह समय और समाज अब
नहीं है, सरकार तो बिलकुल भी
नहीं।
बीसवीं सदी के कई ऐसे कवि और शायर हुए जो देखते-देखते एक मिथक में बदल गये और प्रतिरोध के प्रतीक बन गये, चाहे निराला हों या मुक्तिबोध या पाब्लो नेरुदा या नाजिम हिकमत।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ एक ऐसे ही शायर थे जो भारतीय उपमहाद्वीप ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया मे इंक़लाब के शायर बन गये।
पाकिस्तान के लायलपुर के एक जमींदार परिवार में जनमे एक शर्मीले युवक के बारे में भला कौन जानता था कि वह एक दिन दुनिया में मोहब्बत औऱ इंक़लाब का इतना बड़ा शायर हो जाएगा। उसकी शायरी ने उसे धीरे-धीरे दुनिया के महान कवियों पाब्लो नेरुदा, नाजिम हिकमत, ब्रेख्त और लोर्का की पंक्ति में खड़ा कर दिया और वह मुखालफत तथा इंक़लाब का मसीहा बन गया। अगर लियाकत अली को सत्ता से बेदखल करनेवाले रावलपिंडी कॉन्सपिरेसी केस में उस शायर को फँसाया नहीं गया होता तो उसकी शायरी में वह दर्द और इंकलाब नहीं आता। लेकिन इस जेल यात्रा ने उसकी शख्सियत में भी एक नया आयाम जोड़ा और जेल से निकलने के बाद एक नये फ़ैज का जन्म हुआ। इसी जेल में उनके दूसरे नज़्म संग्रह के प्रकाशन की खुशी मनायी गयी और नज़्मों का एक मजमुआ ‘ज़िंदा नामा’ इसी जेल की सौगात के रूप में सामने आया।
यह अजीम शायर आज हर किसी की जुबान पर हैं और जितना वह पाकिस्तान में मशहूर हैं उससे कहीं अधिक भारत में लोकप्रिय हैं। मीर, ग़ालिब और इक़बाल के बाद अगर कोई शायर लोगों की जुबान पर है तो वह फ़ैज़। भारत के लोग तो उन्हें अपने वतन का ही शायर मानने लगे हैं क्योंकि उनकी शायरी में बयां दुख-दर्द, कशमकश, क्रांति की अकुलाहट भारतीय यथार्थ की मिट्टी से मेल खाती है। फ़ैज़ 1946 में दिल्ली में रहे और बाद में भी भारत आए। इलाहाबाद में फ़ैज़ महादेवी और फ़िराक़ की ऐतिहासिक मुलाकत भी हुई थी।
फ़ैज़ में मोहब्बत और क्रांति का रंग ऐसा है कि यह कहना मुश्किल है कि वह मोहब्बत के शायर हैं या फिर प्रतिरोध के। फ़ैज़ के नाती अली मदीह हाशमी ने फ़ैज़ साहब की एक अधिकृत जीवनी कुछ साल पहले अंग्रेजी में लिखी थी, अब उस अंग्रेजी जीवनी का हिंदी में अनुवाद आया है और यह अनुवाद वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार ने किया है। फ़ैज़ के हिंदी पाठकों को पहली बार इस शायर की जिंदगी के अफसानों से रूबरू होने का मौका मिलेगा। 415 पेज की जीवनी में फ़ैज़ की जिंदगी और उनकी शायरी के सभी पहलुओं पर तफसील से लिखा गया है।
इस जीवनी की खासियत यह है कि इसमें एक युग को समेटा गया है। फ़ैज़ अहमद ख़ान का फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ बनना अपने आप में एक इतिहास है। पाकिस्तान की हुकूमत से उनके टकराव ने उनके अंदर एक बागी व्यक्तित्व का विकास किया और उनके जीवन संघर्ष ने उनको एक बड़ा शायर बना दिया। इसमें उनके वामपंथी दोस्तों का भी हाथ है जिनकी सोहबत में आकर वह मार्क्सवाद की ओर झुके और प्रगतिशील लेखक संघ के आंदोलन से जुड़ने के बाद उनकी शख्सियत में एक नया आयाम जुड़ा।
आज फ़ैज़ की ‘मेरी पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग’, ‘बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे’ तथा ‘यह दाग दाग उजला शबग जीदा शहर, वह इंतजार था जिसका यह वह सहर तो नहीं’ या और ‘खून के धब्बे धुलेंगे, न जाने कितनी बरसातों के बाद’, ‘हम जो तारीक राहों में मारे गए’, ‘आज बाजार में पा ब जौलां चलो’ जैसी पंक्तियाँ सबकी जुबान पर हैं।
बीते जमाने की मशहूर गायिका नूरजहाँ से लेकर मेहँदी हसन और आज की मशहूर ग़ज़ल गायिका राधिका चोपड़ा की आवाज़ ने फ़ैज़ की नज़्मों को घर-घर पहुंचा दिया और यह लोगों की रूह को छू गयी। अब तो युवा लड़के अपने बैंड बनाकर फ़ैज़ को गाते हैं। लंदन में फ़ैज़ की जिस तरह जन्मशती मनायी गयी उससे पता चलता है फ़ैज़ की शायरी सात समंदर पार कर विदेशों तक पहुंच गयी है, लेकिन जब उर्दू के अज़ीम शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने ‘मेरे महबूब मेरी पहली सी मोहब्बत न मांग’ जैसी नज़्म लिखी तो उनके कद्रदानों और पाठकों के मन में यह सवाल उठा कि आखिर फ़ैज़ साहब की यह महबूब कौन है? इस जीवनी से पता चलता है कि फ़ैज़ को अपनी ज़िंदगी में मोहब्बत का पहली बार अहसास 17 साल की उम्र में हुआ और वह भी एक अफगान लड़की से, हालांकि इस मोहब्बत की कहानी का कोई अंजाम नहीं निकला। मोहब्बत की यह आग उनके सीने में दब कर रह गयी। बाद में उनकी एकतरफा मोहब्बतें कई लड़कियों से हुईं। लेकिन जब एक विदेशी महिला एलिस से मोहब्बत हुई तो वह उनकी शरीके हयात ही बन गयीं।
फ़ैज़ साहब एक पारंपरिक मुस्लिम परिवार में जनमे थे लेकिन ब्रिटेन की इस गोरी खातून से निकाह, उस ज़माने में बहुत बड़ा तरक़्क़ीपसंद फैसला था। शायद यह उनकी किस्मत में लिखा था या जीवन में कुछ ऐसा संयोग बना जिसके कारण उनकी मोहब्बत की दास्तां अमर हो गयी। शायद इस इश्क ने उन्हें मोहब्बत और इंकलाब का सबसे बड़ा शायर बना दिया क्योंकि उनकी मोहब्बत रूमान की बुनियाद पर नहीं टिकी थी बल्कि विचारों की बुनियाद पर टिकी थी। एलिस ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी की मेंबर थीं। शायद यह भी कारण रहा होगा कि दोनों एक दूसरे के बहुत नज़दीक आए। इतने नज़दीक कि एक दूसरे के होकर रह गये।
जीवनी में एलिस के व्यक्तित्व पर भी काफी रौशनी डाली गयी है। उनके बारे में दुनिया को अभी कम पता है कि वह कितनी साहसी और धैर्यवान महिला थीं। शौहर के साये में उनका साया दब कर रह गया जबकि वह खुद एक रंगकर्मी,पत्रकार,शायरा थीं जो कभी कृष्ण मेनन की सेक्रेटरी भी रह चुकी थीं और बाद में वह संयुक्त राष्ट्र की अधिकारी भी बन गयीं। उन्होंने हर मुसीबत में फ़ैज़ का साथ दिया। फ़ैज़ जब लियाकत अली ख़ान को सत्ता को हटाने के रावलपिंडी कॉन्सपिरेसी केस में गिरफ्तार हुए तब एलिस ने बड़ी हिम्मत दिखायी।
जीवनी के अनुसार फ़ैज़ और एलिस की मुलाक़ात मोहम्मद दीन तासीर के घर पहली बार हुई थी। तासीर साहब अमृसर के एक कॉलेज में प्रिंसिपल थे। वह अल्लामा इकबाल के शागिर्द थे तथा सज्जाद जहीर के दोस्त भी थे। वह भारतीय महाद्वीप में पहले शख्स थे जिन्होंने ऑक्सफ़ोर्ड से पीएचडी की थी। ऑक्सफोर्ड में पढ़ाई के दौरान ही उनकी शादी क्रिस्टनबेल से हुई जो एलिस की बड़ी बहन थीं। शादी के बाद एलिस भी उनसे मिलने पाकिस्तान आयी थीं। उनका पूरा नाम एलिस कैथरिन इवी जॉर्ज था। वह किताबों की बिक्री करनेवाले परिवार में 1913 में जनमी थीं और उनके तीन भाई थे। उनकी मां एलिस गार्टन क्रूसीफिक्स ने 1910 में उनके पिता ज्योफ़्रे जॉर्ज से शादी की थी।
फ़ैज़ की बीवी एलिस गणित में पूरे लन्दन में टॉप आयी थीं लेकिन आर्थिक हालात के कारण मैट्रिक से आगे नहीं पढ़ सकीं। बाद में वह स्टेनोग्राफर का कोर्स करने लगीं और भारत की आज़ादी के आंदोलन में ब्रिटेन में इंडिया लीग बना तो एलिस वी.के. कृष्ण मेनन की सचिव बन गयीं। वह सोलह साल की उम्र में ही ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य बन गयीं। लन्दन में दोनों बहनें भारतीय छात्रों के संपर्क में आयीं। इन छात्रों में मुल्कराज आनंद, सज्जाद जहीर, रजनी पाम दत्त आदि शामिल थे। इन्ही छात्रों में डॉ तासीर भी थे जिनसे एलिस की बड़ी बहन ने शादी कर ली। इक़बाल ने निकाहनामा तैयार किया था और वे काज़ी बने थे। 1936 में तासीर भारत आ गये और अमृसर के.एम.ए.ओ. कॉलेज में प्रिंसिपल बन गये। इसी कॉलेज में फ़ैज़ साहब अंग्रेज़ी के लेक्चरर थे।
यहीं दोनों की मुलाकात हुई और यह मुलाकात मोहब्बत में बदल गयी लेकिन उन दोनों ने अपनी मोहब्बत को छिपाये रखा। एलिस तो छुट्टियाँ मनाने अपनी बहन के घर आयी थीं लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण फँस गयीं। तासीर साहब को फ़ैज़ और एलिस की दोस्ती शुरू में पसंद नहीं थी और वह फ़ैज़ को एलिस के योग्य नहीं मानते थे लेकिन बाद में उन्होंने फ़ैज़ को अपना साढ़ू कबूल कर लिया।
एलिस को अमृतसर के रोजमेरी इंटर गर्ल्स कॉलेज में अंग्रेजी और फ्रेंच पढ़ाने की नौकरी मिल गयी और वह टीचर्स हॉस्टल में रहने लगीं जबकि तासीर साहब कश्मीर में एक कॉलेज के प्रिंसिपल बनकर कश्मीर चले गये। फ़ैज़ की मुलाकातें एलिस से अधिक होने लगीं और मोहब्बत परवान चढ़ने लगी। एलिस ने कहा है कि “अमृतसर ही मेरे लिए हिंदुस्तान था और फ़ैज़ साहब ही मेरे लिए वह हिन्दुस्तान थे।”
फ़ैज़ की अम्मी और बहनों की ख्वाहिश थी कि फ़ैज़ साहब एक समृद्ध परिवार में शादी करें। मगर फ़ैज़ एलिस से निकाह करने का मन बना चुके थे। फैज़ का परिवार मुश्किलों के दौर से गुजर रहा था क्योंकि फ़ैज़ के वालिद के इंतक़ाल के समय इस परिवार पर ₹80000 का कर्ज़ था और परिवार की ज्यादातर जमीन बिक चुकी थी और बाकी जमीन मुकदमे में फँसी थी। फ़ैज़ ने एलिस को यह सब पहले से बता दिया था। एलिस भी जानती थीं कि वह केवल फ़ैज़ से नहीं बल्कि उनके पूरे परिवार से शादी कर रही हैं जो उनके ऊपर ही आश्रित था। लंबे इंतजार के बाद आखिर फ़ैज़ की अम्मी राजी हुईं तो फ़ैज़ ने एलिस से कहा अगर तासीर और क्रिस्टिना बेल तैयार हों तो वह उसी साल सादे ढंग से शादी कर सकते हैं। एलिस की बड़ी बहन तथा उनके पति भी काफी खुश हुए क्योंकि इसका मतलब था दोनों बहनें भारत में ही रहेंगी। तब तक डॉक्टर तासीर अपनी पत्नी के समझाने पर एलिस की फ़ैज़ से शादी के लिए राजी हो गये थे।
फ़ैज़ और एलिस की शादी 28 अक्टूबर 1941 को हुई। फ़ैज़ ने एलिस के लिए शादी की जो अँगूठी ली वह भी उन्होंने अपने दोस्त मियाँ इफ्तिखार उद्दीन से ₹300 उधार लेकर ली थी। शेख अब्दुल्ला ने फैज की शादी में काजी की भूमिका निभायी थी। नये जोड़े ने दो दिन श्रीनगर में हनीमून मनाया और फिर लाहौर लौट आया।
एलिस ने लाहौर में अपनी मेहनत से कई औरतों के लिए एक मिसाल पेश की। लाहौर आर्ट काउंसिल में पहला कठपुतली थिएटर, चिल्ड्रंस एंड सोसाइटी, पाकिस्तान टीवी एसोसिएशन के गठन के लिए उन्होंने खूब काम किया और इस सब के लिए वह प्रेरणास्रोत ही बनी रहीं। वह पाकिस्तान की पहली महिला प्रकार थीं। उन्होंने पाकिस्तान टाइम्स में महिलाओं और बच्चों के लिए एक पन्ना शुरू कराया था।
फ़ैज़ की जब रावलपिंडी कॉन्सपिरेसी केस में गिरफ्तारी हुई तो शुरू में एलिस को बताया नहीं गया कि वह किस जेल में बंद हैं। बाद में जब वह जेल में फ़ैज़ से मिलीं तो यह वाकया एक फिल्मी किस्से की तरह दर्द भरा था।
भारत पाकिस्तान के बीच दोस्ती का एक पुल बने मक़बूल शायर फैज़ अहमद फैज़ का असली नाम फ़ैज़ अहमद ख़ान था लेकिन बाद में ख़ान मिट गया और उन्होंने अपना तखल्लुस भी फ़ैज़ ही रख लिया। इस तरह वे पूरी दुनिया में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के नाम से मशहूर हो गये।
फ़ैज़ साहब के वालिद सुल्तान मोहमद अफगानिस्तान के अमीर के दुभाषिये और राजदूत रहे तथा उनकी जीवनी भी लिखी। वे 1901 से 1905 तक लन्दन में रहे। उन्होंने ऑक्सफोर्ड से कानून की डिग्री भी ली। 1905 में इक़बाल ऑक्सफ़ोर्ड में पढ़ने आए। इक़बाल के वह दोस्त भी बने। फ़ैज़ के वालिद पाकिस्तान लौटकर बड़े वकील बने। उनकी कई बीवियाँ थीं और रखैलें भीं। फ़ैज़ की माँ सलमा फातिमा, जिसे बेबे के नाम से पुकारा जाता था, का निकाह 18 साल में हुआ जब फ़ैज़ के वालिद की उम्र 50 साल के करीब थी। फ़ैज़ चार भाई थे। बड़े भाई तुफैल जो जज बने, दूसरे खुद फ़ैज़, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर के शायर बने, तीसरे इनायत, जो फौज में मेजर हुए, और चौथे बशीर, जो पैदाइशी विकलांग थे।
इस जीवनी में पता चलता है कि फ़ैज़ ने जब विभाजन के हालात से दुखी होकर ‘ये दाग़ दाग़ उजाला’ लिखा तो उन्हें सरदार जाफरी जैसे तरक्कीपसंद लोगों की आपत्तियों और विरोध को भी सहना पड़ा क्योंकि उन्होंने इस आज़ादी की आलोचना की थी। फ़ैज़ के बारे में यह बात कम लोगों को पता है कि उन्होंने जागो हुआ सवेरा नामक फ़िल्म की कहानी लिखी थी। रोमियो जूलियट और दिलीप कुमार अभिनीत फिल्म मजदूर में उनकी नज्म का इस्तेमाल हुआ था।
जीवनी में फ़ैज़ को दुनिया मे शांति दूत के रूप में भी पेश किया गया है। फ़ैज़ ने पूरी दुनिया की यात्रा की थी क्योंकि वह एक अंतरराष्ट्रीय हस्ती बन गए थे। वह अपने देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए सांस्कृतिक राजदूत भी थे। उनकी मुलाकात पाब्लो नेरुदा और नाजिम हिकमत से हुई। एशियाई-अफ्रीकी लेखक संगठन के जरिये उन्होंने तीसरी दुनिया के लेखकों को एकजुट किया और फिलीस्तीन के पक्ष में आवाज़ उठायी। लोटस पत्रिका के प्रकाशन के सिलसिले में बेरुत में रहे और वहां चलती गोलियों में घिरकर बाल बाल बचे। यासिर अराफात से भी उनकी एक ऐतिहासिक मुलाक़ात रही।
फ़ैज़ का जीवन घटनाओं से भरा हुआ था और उनके व्यक्तित्व के इतने आयाम हैं कि इस किताब की समीक्षा के बहाने उन्हें समेटना बहुत मुश्किल है। इस जीवनी से फ़ैज़ के मुरीदों को बहुत कुछ नया जानने को मिलेगा। यह जीवनी बताती है कि एक साधारण मनुष्य असाधारण इंसान और एक विश्व कवि कैसे बन गया।
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आलोचक : विमल कुमार
किताब : प्रेम और क्रांति (फैज़ अहमद फैज़ की जीवनी)
लेखक : डॉ अली मदीह हाशमी
अनुवादक : अशोक कुमार
प्रकाशक : सेतु प्रकाशन, सी-21, सेक्टर 65, नोएडा-201301