हंस' के दिसंबर-2020 अंक में कथाकार कैलाश बनवासी के कहानी संग्रह-' कविता पेंटिंग पेड़ कुछ नहीं' पर लेखक-आलोचक गोविंद सेन की समीक्षा
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‘कविता पेंटिंग पेड़ कुछ नहीं’ चर्चित कथाकार कैलाश बनवासी का छठा कहानी संग्रह है। एक उपन्यास भी उनके खाते में है। बनवासी जी सामाजिक सरोकारों से जुड़ी ग्रामीण मध्यमवर्गीय संवेदना के कुशल चितेरे हैं। बाजारवाद से उत्पन्न सामान्य जन की दुश्वारियाँ उनकी आँखों से कभी ओझल नहीं होती। संग्रह की इन कहानियों में सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षिक, धार्मिक, पर्यावरण आदि हर क्षेत्र की विसंगतियों और उसके पीछे के षडयंत्र को बेनकाब किया गया है।
‘बड़ी खबर’ संग्रह की पहली कहानी है। इस कहानी में कथाकार का सूक्ष्म अवलोकन देखते ही बनता है। एक आधुनिक सुविधाओं और उपकरणों से सुसज्जित साफ–सुथरे बैंक में टी.वी. पर किसी मसाला-मूवी के टाइटल की तरह डिजिटली एनिमेटेड आग की लपटों के बीच ‘बड़ी खबर’ की सुर्खियाँ हाईलाइट हो रही हैं। यह बड़ी खबर गुस्सा और नफरत उगल रही है। दूसरी तरफ उस सजीले बैंक में एक देहाती पिता के साथ दो छोटे बच्चे सस्ते कपड़े पहने नंगे पाँव आए हैं। वे सबसे बेखर अपनी दुनिया में मस्त हैं। बैंक के बोझिल वातावरण में वे बेरोकटोक सहज भाव से खेल रहे हैं। कथाकार की नजर में आग उगलती बड़ी खबरों के बीच हिंस्र दुनिया से बेखबर बच्चों का बैंक जैसी जगह पर सहज भाव से खेलना बहुत बड़ी नेमत है । यह आज के समय की सबसे बड़ी खबर है।
‘वाइब्रेंट जगतरा!’ यह कथानायक के ग्रामीण सहपाठी जगन चंद्राकार की व्यक्तिगत सफलता की कहानी है जो प्रजातन्त्र के पूंजीवादी ताकतों के हाथों में जाने की भी कहानी है। जगन ग्रामीणों के प्रतिरोध को भी अपने हित में इस्तेमाल कर लेता है। यह गाँव में पनपने वाले जगन चंद्राकार जैसे युवा नेताओं की हकीकत भी बयान करती है कि वे किस तरह अपने फायदे के लिए ग्रामीणों को गुमराह करते हैं। गाँव में स्टील का कारख़ाना किसानों की ज़मीनों को अधिगृहीत कर बनाया जाता है। किसानों से वादा किया जाता है कि उन्हें ज़मीनों के ऊंचे दाम के साथ ही कारखाने में नौकरी भी मिलेगी। जगन उन्हें समझाता है कि अब खेती लाभ का धंधा नहीं है। लागत बढ़ती जा रही रही है और मुनाफा घटता जा रहा है। इसलिए कंपनी को जमीन बेचकर कारखाने में नौकरी करना ही बेहतर है। इस तरह ग्रामीणों पर मजबूत पकड़ रखने वाला जगन कंपनी के पक्ष में ग्रामीणों को तैयार कर सस्ती दर में उनकी ज़मीनें बिकवा देता है। पर किसान छले जाते हैं। उन्हें न ज़मीनों के ऊंचे दाम मिलते हैं और न ही नौकरियाँ। आक्रोशित ग्रामीण कारखाने में आग लगा देते हैं। अगुवाई कर रहे जनार्दन तांडी और जगन को गिरफ्तार कर लिया जाता है। जगन को आठवें दिन जमानत मिल जाती है पर जनार्दन तांडी को नहीं छोड़ा जाता। उस पर नक्सली होने का आरोप लगाया जाता है। जनार्दन तांडी यह खुलासा करता है कि यह सारा खेल जगन के इशारे पर हुआ है जो कि कंपनी का तीस परसेंट का शेयर होल्डर है।
‘झांकी’ कहानी आज के सबसे तेज गति से बढ़ने वाले नए कारोबार शिक्षा की एक भव्य झांकी प्रस्तुत करती है। कथानायक मिश्रा और देवांगन भव्य और आलीशान ‘राठी इन्स्टीट्यूट’ पहुँचते हैं जहां एस.पी. गौतम साहब को चेयरमैन के.सी. राठी द्वारा फायनल ईयर के स्टूडेंट के फेयरवेल फंक्शन में बतौर चीफ़गेस्ट के रूप में आमंत्रित किया गया है । चेयरमैन उनका स्वागत उसी तरह करते हैं जिस तरह लड़की का पिता बरातियों का स्वागत करता है । वहाँ की लग्जरी को देख कर कथानायक और देवांगन अपने निम्नवर्गीय बोध से ग्रस्त हो तनिक सकुचा जाते हैं। चेयरमैन फंक्शन से पहले उन्हें इंस्टीट्यूट का भ्रमण करवाते हैं। कहानी में इंस्टीट्यूट की भव्यता और साज-सज्जा का अत्यंत सजीव चित्रांकन कथाकार ने किया है। कथाकार की दृष्टि बिल्डिंग के पीछे चल रहे निर्माण कार्य में लगे विपन्न देहाती मजदूरों पर भी जाती है। वे सोचते हैं कि क्या इस आलीशान भवन में इन मजदूरों के बच्चे कभी पढ़ सकेंगे ।
संग्रह को शीर्षक देने वाली कहानी ‘कविता पेंटिंग पेड़ कुछ नहीं’ बहुत कुछ कहती है। नन्दिता देश की एक जानी-मानी चित्रकार है । वह आजीविका के लिए एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती है। वह जहाँ रहती है वहाँ गूलर का एक हरा पेड़ है जिसका उसके दैनिक जीवन में ही नहीं पूरे मोहल्ले के जीवन में बहुत महत्व है। एक दिन गूलर का वह पेड़ काट दिया जाता है। नन्दिता वहाँ उपस्थित नहीं थी । नन्दिता के 55 वर्षीय पिता कटते हुए पेड़ को बचाने की कोशिश करते हैं। पर लेबर उनकी एक नहीं सुनते उल्टे उनका मज़ाक उड़ाते हैं। मोहल्ले का भी कोई शख़्स पेड़ को बचाने के लिए उनका साथ नहीं देता। नन्दिता स्कूल से आती है। जब उसे पिता से पेड़ के कटने की खबर मिलती है तो वह आग-बबूला हो जाती है। स्थानीय दादा बिल्लू भैया को बुलवाती है। बिल्लू पता करता है कि पेड़ को किसने कटवाया है। जब पता चलता है कि उस गूलर को नगर के गणमान्य पुजारी और प्रभावशाली लोगों ने नगर में होने वाले एक बड़े यज्ञ के लिए कटवाया है तो आक्रोशित बिल्लू भी ठंडा पड़ जाता है। आखिर में नन्दिता कटे हुए पेड़ की पेंटिंग बनाकर रह जाती है और उसके पिता एक कविता लिखकर अपना आक्रोश व्यक्त करने के सिवा कुछ नहीं कर पाते। बनवासी जी ने इस कहानी को पूरी तल्लीनता से बुना है। वे कॉलोनी के रहवासियों, मीडिया, पुलिस, तथाकथित दबंग, गुंडों-नेताओं के दोगलेपन और पाखंड को यहाँ बखूबी उजागर करते हैं।
सांप्रदायिकता और जातिवाद की कट्टरता ने सहज प्रेम और मनुष्यता को सोख कर वहाँ वैमनस्य, घृणा, हिंसा और धार्मिक उन्माद को स्थापित कर दिया है। एक कुत्सित मनोवृति द्वारा लोगों के व्यवहार संचालित हो रहे हैं। जब भारत-पाकिस्तान का मैच होता है तो यह सब सतह पर आ जाता है । मजहब की दीवारें और ऊंची हो जाती है। नफरत की लपटें उठने लगती है और वर्षों की अर्जित गंगा-जमुनी तहजीब के परखचे उड़ने लगते हैं । इन्हीं मनोवृत्तियों के चलते कहानी ‘चक दे इंडिया’ में आसिफ और राशि का प्रेम अधूरा ही रह जाता है। ‘अंजामे-ए-मुहब्बत मालूम है लेकिन...’ में भी नम्रता जोशी और देवीलाल यादव का प्रेम एक जगह पर आकर ठहर जाता है। दोनों ही हिन्दू हैं पर बीच में जाति की दीवार। सामंती-रूढ़िवादी और पुरुषवादी समाज दोनों के बीच खलनायक की भूमिका अदा करता है। यह पितृ सत्तात्मक समाज तमाम प्रगतिशीलता के बावजूद स्त्री को मात्र भोग्या ही मानता है और उसी तरह बर्ताव भी करता है। अंत में दोनों को न चाहते हुए भी अलग होने का निर्णय लेना पड़ता है। कहानी की बुनावट कमाल की है। इसमें स्कूल के वातावरण और शिक्षक-शिक्षिकाओं के कार्य-व्यवहार, मानसिकता आदि का सजीव चित्रण है।
‘रोज का एक दिन’ उच्च शिक्षित किन्तु छोटी प्राइवेट नौकरी में लगे, अप-डाउन करते और बेहतर भविष्य का सपना देखते युवक-युवतियों की सजीव कहानी है। इन युवाओं का वर्तमान तो खुशहाल नजर आता है किन्तु उसके पीछे निराशाजन्य उदासी भी नजर आती है। निजीकरण, उदारीकरण और भूमंडलीकरण का इन युवाओं के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ रहा है और आगे क्या असर होगा, यह कहानी उन तमाम सवालों की पड़ताल करती है। कहानी में युवाओं के सहज उल्लास और मस्ती का हृदयग्राही चित्रण है। साइकिल स्टैंड और ट्रेन के भीतर यात्रा कर रहे लड़के-लड़कियों के दृश्य और संवाद अत्यंत सजीव और सहज हैं। प्राइवेट नौकरी में युवाओं का शोषण हो रहा है। सरकारी नौकरियाँ कम होती जा रही हैं । नई नियुक्तियाँ बंद हैं। काम के घंटे बढ़ते जा रहे हैं। ठेका सिस्टम आ गया है। ऐसी स्थिति में इन युवाओं के सुनहरे सपनों का क्या होगा, इसकी गहरी चिंता कहानी में बखूबी प्रकट होती है।
संग्रह की सबसे छोटे और आकर्षक शीर्षक वाली कहानी ‘नो’ प्राइवेट बैंक में शोषित होने वाली जूनियर बैंककर्मी प्रभा की कहानी है। मंदी की मार ने इंजीनियरिंग पास प्रभा को प्राइवेट बैंक की नौकरी करने के लिए मजबूर कर दिया है। बैंक मैनेजर जूनियर बैंककर्मी प्रभा पर काम का बोझ बढ़ाता चला जाता है। प्रभा के लिए यह बोझ असहनीय हो उठता है और आखिर वह नौकरी से इस्तीफा दे देती है। वही नौकरी जिस पर उसका भविष्य और माता-पिता के सपने टिके थे। उच्च शिक्षित युवाओं की बेरोजगारी की विकराल समस्या और प्राइवेट संस्थानों में उनके अतिशय दोहन की प्रतिनिधि कहानी है। प्रकारांतर से यह कहानी भी ‘रोज का एक दिन’ की तरह युवाओं की सम्मानजनक रोजगार के लिए तड़प की कहानी है।
‘विकास की पतंग’ का विकास देवांगन रायपुर की बड़ी और स्थापित स्टील इंडस्ट्री में सीनियर इंजीनियर है। मंदी के कारण उसकी छंटनी कर दी जाती है। उस समय उसके परिवार की कई जिम्मेदारियाँ उसके कंधों पर थी। नौकरी चले जाने से वह अवसाद में चला जाता है। अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है। उसमें एक झूठा आशावाद पैदा हो जाता है। उसे लगता है कि उसे राजनीति में सफलता मिलेगी । वह रूलिंग पार्टी का कार्यकर्ता बन जाता है। घर वालों के लाख मना करने के बावजूद वह पार्षद का चुनाव लड़ता है और अपनी जमापूंजी खो देता है। यूं देखें तो देश का असली विकास तो विकास जैसे लोगों पर ही निर्भर है। मंदी के कारण अरबपति मालिकों के जीवन पर तो कोई प्रभाव नहीं पड़ता पर विकास जैसे अनेक मेहनतकश, हुनरमंद लोग बर्बाद हो जाते हैं । अरबपति मालिकों का जीवन पहले की तरह खुशहाल और शानो-शौकत से भरा रहता है क्योंकि देश की 73 फीसदी संपत्ति केवल एक फीसदी अमीरों के पास है। कह सकते हैं कि देश का तथाकथित विकास उनकी मुट्ठी में है। अब ऐसी स्थिति में आकाश में पूंजीपतियों की पतंग ही उड़ेगी, विकास जैसे सामान्य जन की पतंग कटेगी ही।
‘झूलना झूलै मोरे ललना’ कहानी उन शक्तियों की ओर भरपूर इशारा करती है जो अपनी सत्ता को कायम रखने के लिए प्रतिरोध को दबाने की कोशिश करती हैं। साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय कालेज के प्राध्यापक नवीन भाई समाज में जागरूकता लाना चाहते हैं । उनके साहित्यिक साथी और अधिकारी गण अपने हित में उनका दोहन करना चाहते हैं पर नवीन भाई इसके लिए तैयार नहीं होते। परिणाम स्वरूप उनका तबादला एक दूरस्थ इलाके में कर दिया जाता है। अपना तबादला रुकवाने के लिए वे उन तमाम परिचितों के पास जाते हैं जो सत्ता के करीबी हैं या कहें कि सत्ता के झूले में झूल रहे हैं। वे सभी मौजूदा सिस्टम को चलाने वाले महत्वपूर्ण पुर्जे हैं। इन्हीं पात्रों और परिस्थितियों के जरिए कहानी बुनी गई है। कहानी में व्यंग्य की एक धार शीर्षक से लेकर अंतिम पंक्ति तक बराबर बनी रहती है। यह धार उनकी लगभग सभी कहानियों में बरकरार है।
बनवासी जी इकहरी कहानियाँ नहीं लिखते। समस्या को चित्रित करके ही संतुष्ट नहीं हो जाते। वे उन समस्याओं के कारणों तक भी पाठकों को ले जाते हैं। इस तरह वे कहानी को एक वैश्विक संदर्भ देते हैं, वह भी कहानीपन की रक्षा करते हुए। उनकी कोई भी कहानी बोझिल नहीं है। जीवन की सादगी, सुंदरता और सहजता इन कहानियों में मौजूद है। इनमें ग्राम्य जीवन की खूशबू व्याप्त है। दुर्ग और रायपुर के आसपास का जनजीवन इन कहानियों में बोलता है। बनवासी पात्रों के मनोभावों और उनके क्रिया-कलापों को सटीक उपमाओं के जरिए प्रकट करते हैं। उनकी कहानियाँ जितनी बाहर चलती हैं उतनी ही भीतर भी।
संग्रह में कुल जमा दस कहानियाँ हैं। भूमंडलीकरण से उपन्न मंदी और पूँजीपतियों के लालच ने नौकरीपेशा वर्ग के लिए अनेक दुश्वारियाँ पैदा कर दी हैं। संग्रह की एकाधिक कहानियाँ उन दुश्वारियों को रेखांकित करती हैं। उनकी हर कहानी में पठनीयता कायम रहती है। किताब का कवर किताब के शीर्षक अनुरूप और अर्थपूर्ण है। बोलचाल की भाषा में सहज बहाव है। इस बहाव में कई कहावतें और मुहावरे तैरते मिल जाते हैं । चित्र खींचने में बनवासी जी माहिर हैं। वे दृष्टि सम्पन्न कथाकार हैं। उनकी कहानी में कोई झोल नहीं मिलेगा। उनका हाथ सधा हुआ है । वे सामाजिक सरोकारों का हाथ कभी नहीं छोड़ते। विडंबनाओं को बहुत सादगी से पाठकों के सामने पेश करते चलते हैं।
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पुस्तक: ‘कविता पेंटिंग पेड़ कुछ नहीं’ (कहानी संग्रह)
लेखक: कैलाश बनवासी
प्रकाशक: सेतु प्रकाशन प्रा.लि., 305, प्रियदर्शनी अपार्टमेंट, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
मूल्य: 200/-
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लेखक - गोविंद सेन
193 राधारमण कालोनी, मनावर-454446, जिला-धार, (म.प्र.)

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