घर बदर: इस भाग दौड़ भरी जिंदगी में एक निम्न- मध्यवर्गीय व्यक्ति के संघर्ष से जुड़ा उपन्यास



दस पद्रह दिन पहले एक पुस्तक की खोज के सिलसिले में अशोक राजपथ गया था. पटना युनिवर्सिटी लाइब्रेरी के ठीक सामने सुमनजी की दुकान प्रगतिशील साहित्य सदन पर पहुंचा. कुछ किताबें देख रहा था. इसी बीच पटना शहर के मशहुर साहित्यकार संतोष दीक्षित आ गए. दोनों की एक दूसरे पर नजर पड़ी. कभी कभी कुछ साहित्यिक आयोजनों में देखा था. वह आमूमन मंच पर और मैं एक श्रोता. कभी बातचीत नहीं हो पाई थी. इस मुलाकात के पहले उनको डा०खगेन्द्र ठाकुर की श्रद्धांजलि सभा में सुना था और ठाकुरजी के व्यक्तित्व पर मुझे भी बात रखने का मौका मिला था. इसके बाद उन्हें मेरा नाम और चेहरा दोनों याद हो गया. फिर बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ. इसी दौरान उन्होनें पूछा कि सुनीलजी, क्या मेरी उपन्यास 'घर बदर' आपने पढ़ी है? जो सच था कह दिया कि मैंने देखी भी नहीं है. एक बार पढ़ते. मैंने कहा कि मैं साहित्यकार थोड़े हूंं. उन्होंने ही कहा ," खगेन्द्रजी पर आपको सुना था." मैं निरूत्तर हो गया. उनके सामने ही उस किताब को सुमनजी से लिया. फिर उनके साथ ही निकले.बिछुड़ते समय उन्होंने बड़ी झेंपते हुए संकोच पूर्वक कहा कि पुस्तक पर अपनी प्रतिक्रिया दीजिएगा.मैं थोड़ा गर्वान्वित जरूर हुआ परन्तु एक भार भी अनुभव किया क्योंकि किसी रचनाकार की रचना को खंगालकर प्रतिक्रिया दर्ज करना कठिन है. दोनों विदा हुए लेकिन एक चीज भूल गया कि किताब के साथ दोनों आदमी सेल्फी ले लेते.

यहां पर मुझे भवानीजी की एक कविता याद आती है:

चतुर मुझे कुछ भी
कभी नहीं भाया
न औरत
न आदमी
सामान्यता को ही सदा
असामान्य मान कर
छाती से लगाया
संतोष दीक्षित एक लंबे समय से कथा क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं. अक्सर देश की शीर्षस्थ पत्रिकाओं में इनकी कहानियां प्रकाशित होती रहती हैं. कई कहानी और व्यंग्य कहानी संग्रह के रचनाकार संतोषजी की पहली उपन्यास 'केलिडोस्कोप' के बाद पिछले साल 248पृष्ठों में सिमटा हुआ उनकी चर्चित उपन्यास 'घर बदर' आया.

इस यादगार उपन्यास के प्रकाशन के लिए सेतु प्रकाशन, दिल्ली भी सराहना का हकदार है.

दो शब्द:

प्रकाशक ओर से इस पुस्तक की चर्चा करते हुए लिखा," घर बदर, यह कुमदू यानी कुंदन दूबे की जीलन कथा है. कुंदू जो जीवन भर घर बदर रहे, केवल वे ही नहीं, उनके पुरखे तक. जीवनपर्यन्त वे केवल एक अदद सपना देखते हैं और देखते रह जाते हैं कुछ-कुछ होरी के गोदान की तरह."
उपन्यास ' घर बदर ' राम अवतार दुबे तदन्तर दुर्गाशंकर दुबे तथा उनके पौत्र कुंदन दुबे की कथा है जो कमल, किशोर और कौशल नामक उनके तीन पुत्रों तक आती है. घर से विस्थापित तीन पीढ़ियों की कथा में स्थाई घर बनवाने का सपना केंद्र में है. पर इस सपने की जद में एक पूरी सदी को लांघती बढ़ती कथा समाज के बदलते ढंग और ढांचे के साथ हिंदी पट्टी की अधोगति की कहानी भी कहती चलती है.बडीं भावुकता के साथ यह उपन्यास आज क् दौर की कठोरता लिए इन पंक्तियों के साथ समाप्त होता है ,"जीवन भर अपने घर की जदोजहद में खप जाने वाले कुंदन मरने के बाद अपनी तस्वीर में भी जीवित नहीं रहते, उनके श्राद्ध वाली तस्वीर को अशुभ मान घरवाले उनके मित्र को देकर उनसे मुक्त हो जाते हैं. घर बिक जाता है। बेटे हिस्सा ले उड़ जाते हैं. पत्नी उनकी पेंशन से स्कूल चलाने लगती हैं और इस तरह दुबे परिवार की सनातनी घर बदरी कायम रहती है."
दरअसल यह किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है. यह एक कहानी है उस पूरे परिवार, राष्ट्र और विश्व की जिसे सत्ता, बाजार या अर्थतंत्र ने देश की पूरी आबोहवा को बदल दिया है.नतीजा इसका पूरा प्रभाव हमारे परिवार, आसपड़ोस और समाज पर पड़ा है.

पूरी उपन्यास आम आदमी के संघर्ष के आस पास घूमती है और यही उपन्यास का पिरधान लक्ष्य है.
संतोष दीक्षित बेहतरीन कहानीकार हैं. वह बड़े ही रोचक ढ़ग से एक लंबी कथा को प्रस्तुत किए हैं. पूरे उपन्यास के पढ़ते वक्त उत्सुकता बनी रहती है. यह कहानीकार की सबसे बड़ी सफलता है. बिल्कुल सरल भाषा में उपन्यास लिखी गयी है लेकिन भाषा और चारित्रिक संयोजन दोनों को अच्छे ढ़ग से प्रस्तुत की गया है.

- सुनील सिंह 


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