तद्भव अंक 42 में छपी दो पुस्तकों की वृहद समीक्षा (आलोचक जगन्नाथ दुबे और तद्भव के संपदाक अखिलेश का बहुत आभार)

 

 



इस वर्ष हिन्दी में आए उपन्यासों में जिन उपन्यासों ने हिन्दीसमाज का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया उनमें दो उपन्यासों का नाम मैं यहाँ मुख्य रूप से लेना चाहूँगा। एक राजू शर्मा का उपन्यास है क़त्ल गैर इरादतन और दूसरा नवल शुक्ल का तिलोका वायकान। अपने कथ्य में ये दोनों उपन्यास भले ही अलगअलग विषयों से जुड़े हुये हों पर दोनों का संदर्भ एक ही है। राजू शर्मा का उपन्यास जहां भारतीय प्रशासनिक सेवा में कार्यरत अधिकारियों और उनके जीवन प्रसंगों से जुड़े सवालों के बहाने भारतीय लोकतन्त्र और भारतीय राष्ट्र-राज्य में न्याय-अन्याय की बहस को केंद्र में रखता है। इसी बहाने यह उपन्यास लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर भी विचार करने को विवश करता है वहीं चर्चित कवि नवल शुक्ल का पहला उपन्यास तिलोका वायकान स्वप्न और यथार्थ के बीच उलझे हुये इंसान का सफरनामा कहता है। इस सफरनामे में नवल जी बहुत सावधानी से तथाकथित सभ्य समाज के समानान्तर आदिवासी जीवन पद्यति को रखते हुये यह दिखाते हैं कि जिन रास्तों से हम आदिवासी समाज के हित की चिंता करते हैं वे रास्ते असल में आदिवासी समाज के बारे में हमारी नासमझी के अलावा कुछ भी नहीं हैं। यूं तो दोनों उपन्यासों का विषय क्षेत्र सर्वथा भिन्न है किन्तु ये दोनों ही उपन्यास भारतीय राष्ट्र-राज्य और भारतीय लोकतन्त्र की यात्रा से जुड़े हुये हैं इसलिए इनके बीच आपसी संगति भी समझी जानी चाहिए। अब हम क्रमशः क़त्ल गैर इरादतन और तिलोका वायकान के बारे में उपन्यास के कथ्य के सहारे अपनी बात करेंगे।

 

 


 

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        क़त्ल गैर इरादतन हिन्दी के प्रसिद्ध कथाकार राजू शर्मा का चौथा उपन्यास है इससे पहले इनके हलफ़नामे’,‘विसर्जन और पीर नवाज नाम से तीन उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। शब्दों का खाकरोब’,‘समय के शरणार्थी और नहर में बहती लाशें नाम से कहानी संग्रह और भुवनपति और जंगलवश नाम से नाटक का लेखन भी इन्होने किया है। अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता में वाममार्गी जनपक्षधर राजू शर्मा प्रशासकीय पेशे से लंबे समय तक जुड़े रहे हैं। उसका लाभ कहें या असर इस उपन्यास में भी दिखाई देता है। प्रशासकीय संरचना की बहुत सी ऐसी बारीकियाँ इस उपन्यास में दर्ज हुई हैं जो उस पेशे से बहुत करीब से न जुड़े होने की स्थिति में संभव नहीं थीं। जैसा कि उपन्यास के शीर्षक से ही ध्वनित होता है कि कोई क़त्ल हुई है। यह क़त्ल जान बूझकर नहीं की गयी है। यह क़त्ल गैर इरादतन है। गलती या धोखे से हो गए काम की तरह। फिर किताब खोलते ही आपको दो और बातें लिखी हुई दिखाई देती हैं। एक तो समर्पण जिसमें लिखा हुआ है –मेरे परिवार के लिए, और उन सबके लिए जो सोते-जागते इंसाफ के लिए संघर्षरत हैं। दूसरा अगले सफ़े पर लिखा हुआ वाक्य चलो इंसाफ़ करते हैं, जज ने कहा। अब शीर्षक के साथ इन दो वाक्यों को मिलाकर पढिए तो किताब के अंदर क्या है यह बहुत कुछ अपने आप ही स्पष्ट होने लगता है। एक क़त्ल हुई है, वह क़त्ल, क़त्ल करने के इरादे से नहीं की गयी है। अगर शीर्षक के इस कहे को सच मान लिया जाये तो फिर इंसाफ़ के लिए संघर्षरत होने का क्या मतलब है? और जज के इस कहे का क्या अर्थ निकाला जाये कि चलो इंसाफ करते हैं? कहने का मतलब यह कि इन बातों की असंगति ही कथा के भावी वितान का सूत्र पाठक के हाथ में थमा देती है। पाठक इस कथा में प्रवेश करने से पहले ही कथासूत्र पकड़ लेता है।प्रत्यक्षतः उपन्यास में एक पात्र जारा अफ़रोज की हत्या/मौत हो जाती है। लेकिन जैसा कि ब्लर्ब पर अमिताभ राय ने लिखा है। उनके लिखे से सहमति जताते हुये यहाँ कोट कर रहा हूँ कि–यह क़त्ल गैर इरादतन है। किसकी? जारा अफ़रोज की – पर इस हत्या के संदर्भ में नैरेटर कहता है कि इसके बाद जारा अफ़रोज के केस में क्या हुआ - वह इस कथा का विषय नहीं है और भौतिक रूप में हत्या भी एक यही हुई है परंतु वास्तव में यहाँ हत्या की शृंखलाएँ हैं। न्याय की हत्या, संवेदना की हत्या, मनुष्य के कोमल भावों की हत्या, व्यवस्था की हत्या और सबसे ऊपर मनुष्य होने के भाव की हत्या। इस शृंखलाबद्ध हत्या के मूल में कथाकार ने उस भाव को माना है जो मनुष्य को सुविधाभोगी बना देता है। ऐसा कहने का आधार यह है कि उपन्यास का मुख्य पात्र सदाकान्त उर्फ कान्त जिसकी वजह से जारा की मौत होती है वह अपनी मध्यवर्गीय कमजोरियों का इस हद तक शिकार है कि जीवनभर सच की लाठी पकड़कर चलने कीहिमायत करने वाला एक झटके में सच से दूर भाग जाता है और अपने बचने की रणनीति तैयार करने में लग जाता है। उसे जैसे ही पता चलता है कि जारा अफ़रोज की मौत की फाइल फिर से खुल गयी है और उसका मुख्य अभियुक्त उसी का साथी मिकी है, जिससे इनदिनों कान्त की नहीं पटतीवह तुरंत अपने सत्यवादी होने का चोला उतार फेंकता है और अपनी सुरक्षा के उपाय तलाशने लगता है। एक तो यह पक्ष बनता है कान्त के व्यक्तित्व के सहारे, किन्तु इस उपन्यास की मूल चिंता के केंद्र में न तो कान्त है और न ही मिकी या जारा, बुशरा जैसी कोई अन्य पात्र। इस उपन्यास के केंद्र में हिंदुस्तान की शासन व्यवस्था, स्वतन्त्रता, समानता, और न्याय जैसे लोकतान्त्रिक मूल्य, राष्ट्र-राज्य की संकल्पना और उसका समकालीन यथार्थ है। यह उपन्यास हमारे आज के बारे में बात करता है। हर रचना अपने समकाल से किसी न किसी रूप में अनिवार्यतः जुड़ी हुई होती है, इस जुड़ाव की अनुपस्थिति में उसका रचनात्मक मूल्य नहीं रह जाता लेकिन यह उपन्यास अपने समकाल की कथा सीधे तौर पर कहता है। यानि इस उपन्यास की कथावस्तु के केंद्र में नई सदी का हिंदुस्तान है। और ज्यादा साफ तौर पर कहूँ तो भूमंडलीकरण,  उदारीकरण और निजीकरण की परिघटना के बाद के भारतीय मानस की अभिव्यक्ति इस उपन्यास में दिखाई देती है। इस उपन्यास की कथाभूमि को, इसके संदर्भ और सरोकार को अप तबतक नहीं समझ सकते जबतक आप आज़ादी,लोकतन्त्र, संविधान का शासन, न्याय, समानता, स्वतन्त्रता आदि शब्दों के असल मायने न जानते हों। जबतक आपको यह न पता हो कि 1992 में मस्जिद के ढांचे को गिराने के बाद इस देश ने क्या क्या खो दिया तबतक आप यह उपन्यास क्या कहता है ये नहीं समझ पाएंगे। कहने का आशय यह कि ये उपन्यास प्रेमचंद के उपन्यास की तरह नहीं लिखा गया है। यह एक ऐसे कथाकार की कृति है जिसकी कथा कहने की शैली उस अर्थ में पारंपरिक कथा की शैली नहीं है, जिस अर्थ में प्रेमचंद, रेणु, या भीष्म साहनी की है। यह शिल्प यशपाल के झूठा सच की याद दिलाता है। जिस तरह झूठा सच में इतिहास, वर्तमान और आख्यान तीनों का समुच्चय दिखाई देता है उसी तरह यह उपन्यास भी इतिहास, वर्तमान और आख्यान का काकटेल तैयार करता है। तमाम बार आपको लगता है कि यह जो कुछ कहा जा रहा है वह सब तो हमारे आसपास की बात है, कई बार लगता है कि यह सब तो इस देश में ही घटित हुआ है और कुछ घटनाएँ ऐसी हैं जो आख्यान की शक्ल में दिखाई देती हैं। इन तीनों का जैसा समन्वयन इस उपन्यास में किया गया है वह बिरल है। 

        हिंदुस्तान जब आज़ाद हुआ तो उसने कुछ ऐसे मूलभूत मूल्य और सिद्धान्त विकसित किए जिसके आधार पर भावी भारत कीनींव रखी जानी थी। ये मूल्य और सिद्धान्त स्वाधीनता की लड़ाई के साथ साथ विकसित हुये ऐसा भी कहा जा सकता है। दुनियाभर में औपनिवेशिकता से मुक्ति के बाद जिन भी देशों ने लोकतान्त्रिक प्रक्रिया अपनाई उन सबके साझे मूल्य की तरह ये मूल्य और सिद्धान्त थे। आज़ाद भारत ने एक संविधान सम्मत लोकतान्त्रिक व्यवस्था को अंगीकृत किया। यह व्यवस्था दुनियाभर में अबतक की सबसे बेहतर व्यवस्था मानी जाती रही है कारण कि आधुनिकता के साथ जिस स्वतन्त्रता, समानता और बंधुत्व की बात शुरू हुई उसे लोकतन्त्र के माध्यम से पूरा करने का संकल्प दुनियाभर के देशों ने लिया। यह उपन्यास उन्हीं मूल्यों और सिद्धांतों की हमारे समकाल में क्या स्थिति है उसका कथात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

        लोकतन्त्र का लोक से कितना और कैसा रिश्ता रह गया है इसे इस उपन्यास के शुरुआती हिस्सों में आए संदर्भों के माध्यम से समझा जा सकता है। उपन्यास की शुरुआत जिस वैचारिक उष्णता के साथ होती है वह भारतीय राष्ट्र राज्य के वर्तमान स्वरूप को समझने के लिए पर्याप्त है। कान्त जो कि जिला सांख्यिकी अधिकारी के पद पर तैनात है वह एक आंकड़े की हेराफेरी से दुखी होकर कहता है –पर सर, अगर भगवान भी झूठ बोलना शुरू कर दें तो?या कोर्ट झूठ का दामन थाम ले? तब सच्चाई और असलियत का क्या होगा? इसी तरह का एक संदर्भ आता है जिसमें नैरेटर की चिंता है कि अगर पुलिस इंसाफ की बातें करने लगेगी तो बेचारे कोर्ट और जज साहेबान क्या करेंगे?’लेकिन उपन्यास के अंत तक जाते जाते न्यायालय की भाषा और पुलिस की भाषा कैसे एक जैसी हो गयी है इसका एक उदाहरण देखिये जहां वत्स जी की जमानत अर्जी खारिज हुई है। वत्स जी एक प्रगतिशील जनपक्षधर नागरिक हैं उनकी अर्जी खारिज करते हुये कोर्ट ने जो लिखा है उसे कान्त के शब्दों में पढिए –यह न्यायिक आदेश न होकर जैसे आक्षेप की फटकार है, इंसाफ की पोलियोग्रस्त उंगली आवेश में उठी है और वत्स जी को निरंतर आरोपित कर रही है, वही वाक्य और रचना जो पुलिस की एफआईआर और अभियोजक की दलील की नकल है, जो भी वत्स जी ने उनके पक्ष ने बचाव में कहा उसका कोई जिक्र नहीं... मानो वत्स जी के शरीर और आत्मा को दीवार पर एक कैलेंडर उआ ढांचे की तरह जड़ दिया है। हमारी न्यायिक व्यवस्था में पुलिस का क्या रोल है इसे अब्दुल सत्तार जैसे गरीब मज़लूमों की गिरफ्तारी के संदर्भ से समझा जा सकता है। सत्तार गुब्बारे बेचने का काम करता था कहीं से अफवाह आई कि सत्तार जिन गुब्बारों को बेचता है उनपर पाकिस्तान जिंदाबाद लिखा हुआ है, पुलिस ने सत्तार को गिरफ्तार किया और सबूत के तौर पर पाया कि उसकी गुब्बारों की पैकेट में से एक गुब्बारा गायब है। अब स्थिति ये है कि सत्तार की बेल 99 बार तो नहीं पर तीन बार नामंज़ूर हो चुकी है। और यह भी गौरतलब है कि एक साल से कस्बे में किसी भी हैप्पी बर्थड़े में गुब्बारे नहीं थे। अब इन सवालों के साथ आप अपने वर्तमान को देखें जिसमें गोविंद पानसारे, नरेंद्र दाभोलकर, एमएम कल्बुर्गी जैसे लोगों की हत्याएं हैं, सैकड़ो सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और लेखकों की गिरफ्तारियाँ हैं फिर विचार करें कि यह उपन्यास हमारे समकाल से किस तरह का रिश्ता बनाता है। इसी समाज में आप देखें कि सैकड़ों लोगों के समूहिक नरसंहार के दोषी सत्ता की मलाई काट रहे हैं वहीं जीवन भर जनता के पक्ष में लड़ने वाले वरवर राव, डॉ. कफ़ील जैसे लोग सलाखों के पीछे हैं। तब आप कान्त के सपने में मिकी की बातों पर गौर करें जहां वह कह रहा है कि –सभी लोग सुन रहे हैं, हामी में सिर हिला रहे हैं, एक हो हल्ला सा बन रहा है। कैदी अधीर और अशांत होने लगे हैं, उत्तेजित कि दुनिया में इंसाफ नदारद है। ये क्या तुक है कि जो निर्दोष हैं, जेल में सड़ मर रहे हैं और कातिल और असली मुजरिम छुट्टे मजे ले रहे हैं। बगावत के अलावा क्या चारा बचा है हमारे पास?’ ये सवाल सिर्फ मिकी का नहीं है हमारी न्याय व्यवस्था का सवाल है।

         उपन्यास की कथावस्तु यह संकेत करती है कि इसमें  मुख्य रूप से न्याय व्यवस्था को केंद्र में रखा गया है। इस उपन्यास के मुख्य चरित्र कान्त और उसकी पत्नी पायल, मिकी और उसकी पत्नी अपेक्षा, जारा और बुशरा अफ़रोज, जो अफ़रोज बहनों के रूप में कुख्यात हैं। इसके साथ ही जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक के साथ कुछ पुलिसकर्मी भी हैं जो बीच बीच में आते हैं किन्तु कथा के केंद्र में कान्त, मिकी दंपति और जारा, बुशरा ही हैं। ये सभी चरित्र उत्तर प्रदेश की प्रशासकीय सेवाओं से जुड़े हुये हैं। इन्हीं के सहारे उपन्यास की कथा आगे बढ़ती है और एक ऐसा वितान रचती है जिसमें हमारे लोकतन्त्र का वर्तमान चरित्र अपने पूरे यथार्थ के साथ उपस्थित हो जाता है। मिकी एक ऐसे गुनाह में फंसाया गया है जो उसने किया ही नहीं है, अब्दुल सत्तार और वत्स जी पुलिसिया दमन के शिकार हैं, किसी भी घटना के प्रत्यक्षदर्शी गवाही देने से इसलिए भी बचते हैं क्योंकि पुलिस उन्हीं के साथ मुजलिमों जैसा सलूक करती है। कवियों, लेखकों और बुद्धिजीवियों के साथ सत्ता का क्या रवौया है इसे इंसाफ की फ़हाशी और उलटबांसियां में देखा जा सकता है। उपन्यास में एक चरित्र हैं कैलाश जी नाम से। कैलाश जी स्वयंसेवक हैं। कान्त उन्हे पर्याप्त सम्मान देता है उसे यह भरोसा है कि वत्स जी कि गिरफ्तारी (जो कि सत्ता की क्रूरता का ही एक और उदाहरण है ) के खिलाफ कैलाश जी से मदद मिल सकती है। वह कैलाश जी के पास जाता है कैलाश जी कहते हैं –देखो यह कानूनी कार्यवाही है, कोर्ट आर्डर है। सच का निर्धारण और न्याय देना कोर्ट का काम है। है कि नहीं? मैं या कोई भी इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता... जैसे अयोध्या का मसला। उसके बारे में मेरी यही धारणा है। जबकि असलियत यह है कि कैलाश जी जैसे लोग ही कानून के खिलाफ सबसे पहले खड़े होते हैं। इसी तरह के अनेक संदर्भ इस उपन्यास में  मौजूद हैं जो हिंदुस्तान की वर्तमान स्थिति को हमारे सामने लाने में सहायक साबित होते हैं।

        यह उपन्यास भारतीय लोकतन्त्र की विकासयात्रा को भी दर्ज करता चलता है। अपने वर्तमान से अतीत की तुलना करते हुये पाठक को यह विचार करने का मौका देता है कि वह खुद समझ सके कि अतीत और वर्तमान में बेहतर स्थिति क्या थी। हमें किस तरह का लोकतन्त्र चाहिए? क्या यह जो है या वह जिसे लेकर हम चले थे। एक उदाहरण से हम इस संदर्भ को और स्पष्ट करना चाहें तो उपन्यास के शुरुआती हिस्से का ही एक संदर्भ है – वहाँ देखा कि जितने बिखरी, फुटपाथिए, बेघर, दीन-हीन, प्रवासी, कोढ़ी, अपंग, कंगाल, फरियादी,दूर दराज गाँव के अर्जीदार, बेदखल विधवाएँ, यतीम सताये... उस एरिया में रात में बसेरा बना लेते थे, उन्हें नगरपालिका की जालीदार बस में ठूस दिया गया था। इस घटना को देखकर कान्त को अपनी नौकरी के पुराने दिन याद आ गए – कान्त को याद है जब उसने नौकरी शुरू की थी, हर जिले के हर नगर और कस्बे में शीतलहर की रातों में अलाव जलाने और निराश्रितों, बेघरों को कंबल बांटने की एक स्कीम हुआ करती थी, जिसके लिए बाकायदा स्टेट के बजट में प्रावधान होता था। आज स्थिति यह है कि कंवरियों पर पुष्प वर्षा कि जाती है और गरीब यतीम को कोई पूछने वाला नहीं है। कथाकार इस स्थिति से चिंतित है। वह इससे भी चिंतित है कि आंकड़ों के साथ इस तरह का खिलवाड़ क्यों होता है? कान्त जिलाधिकारी से कहता भी है- सर अंक और आंकड़े मेरी ज़िंदगी रहे हैं, मेरा सच, मेरा सदाचार। अगर वे भी प्रदूषित हो गए और वो भी हमारे हाथों से, तो हमारी सर्विस का क्या बचेगा?’ यहाँ यह कहने की जरूरत नहीं कि ये आंकड़े कान्त से प्रदूषित ही नहीं होते अपने बचाव के लिए तमाम तरह की आंकड़ेबाजी वह खुद करने लगता है। जारा अफ़रोज की मौत उसके सामने हुई, रेलगाड़ी से कटकर। वह चुप रहा बदनामी के डर से क्योंकि जारा और बुशरा दोनों बहने बदनाम थी पूरे इलाके में। उसी केस में मिकी जो कान्त का बचपन का दोस्त है फंसाया गया। कान्त की पत्नी जानती है कि जिस दिन जारा की मौत हुई उसदिन मिकी उससे मिलने सीतापुर गया हुआ था, बावजूद इसके दोनों यह तय करते हैं कि हम पुलिस को यह बात नहीं बताएँगे। न बताने का कारण  कान्त को स्पष्ट है कि कहीं गलती से भी उसकी गहन तफसील हुई तो उसका फंसना तय है। मिकी पुलिस हिरासत में है। उसपर हत्या का मामला सिद्ध हो पाया या नहीं उपन्यास में इसकी कोई चर्चा नहीं है। पाठक की दिलचस्पी हो तो हो कथाकार का उद्देश्य मिकी पर अपराध सिद्ध होने की तफसील करना नहीं है। कथाकार ने हमारे सामने हिंदुस्तान का नक्शा रख दिया है। लोकतन्त्र, न्याय, विचार और अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब हिंदुस्तान में क्या रह गया है यह इस उपन्यास में बखूबी दर्ज हुआ है। सांप्रदायिक विद्वेष, नफरत और हिंसा का जैसा वातावरण आज इस देश में बना हुआ है उसमें इस तरह के उपन्यास जन जागरूकता अभियान की तरह हैं जो कथा के भीतर इतिहास और समकाल की गझिन पड़ताल करते हैं।

        यह उपन्यास जिस कथा ढांचे का निर्माण करता है उसमें पात्रों के सहारे ही पूरा घटनाक्रम अभिव्यक्त कर पाने की असमर्थता कहे या कुछ और पर इस उपन्यास में नैरेटर दूसरे पात्रों से ज्यादा मुखर है। उपन्यास का मुख्य पात्र भले ही कान्त हो लेकिन नैरेटर उसे वक्त-वक्त पर आकर दुरुस्त करता रहता है। उसे बहकने नहीं देता। एक तरह की सेंसरशिप नैरेटर के द्वारा लगाई हुई दिखाई देती है। यह स्थिति प्रायः सभी पात्रों के साथ देखने को मिलती है। उपन्यास का अंतिम हिस्सा इस पूरी व्यवस्था से खीझ, ऊब और घुटन के बीच उम्मीद का हिस्सा है। व्यवस्था जिसपर सबसे ज्यादा सेंसरशिप लगाती है रचनाकार उसी से सबसे ज्यादा उम्मीद करता है। यह उपन्यास भी कविता से ही उम्मीद करता है। व्यवस्था चुन चुनकर एक एक सोचने विचारने वाले व्यक्ति पर पाबन्दियाँ लगाती है और रचनाकार उन्हीं में से चुन चुनकर अपना पक्ष तैयार करता है। बहुत सारी संगत असंगत घटनाओ, चरित्रों और स्थितियों से हमारे समकाल का एक भरोसेमंद यथार्थ प्रस्तुत करने वाला यह उपन्यास पिछले दस वर्षों में प्रकाशित हिन्दी उपन्यासों में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। जितनी ज़िम्मेदारी से भारतीय लोकतन्त्र, संविधान और न्याय के सवालों को इस उपन्यास में जगह दी गयी है उतनी ज़िम्मेदारी से इन विषयों पर हिन्दी कथा साहित्य में अबतक किसी लेखन की कोई याद मुझे नहीं आ रही है। जो कुछ छिटपुट लेखन कहानी के क्षेत्र में हुआ भी है उसमें भी बातें बहुत कुछ रूपकों के माध्यम से कही गयी हैं। यह स्पष्टता पहली बार राजू शर्मा के इसी उपन्यास में दिखाई देती है। कहानी के क्षेत्र में इधर के दिनों में ऐसा ही काम मनोज कुमार पाण्डेय ने बदलता हुआ देश नाम संग्रह में किया है। ये दोनों पुस्तकें आज के भारतीय लोकतन्त्र के यथार्थ को समझने के लिए पर्याप्त हैं। लोकतन्त्र के इस रूप के बनने की प्रक्रिया किन स्थितियों में शुरू हुई यह भी इनसे जाना जा सकता है।

 

 


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        हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि नवल शुक्ल ने कविता लेखन के साथ ही कथा लेखन के क्षेत्र में भी कदम रखा है। उनका पहला उपन्यास तिलोका वायकान नाम से इसी वर्ष प्रकाशित हुआ है। यह पूरा उपन्यास अपने प्रकाशन के पूर्व तद्भव पत्रिका के 39वें अंक में प्रकाशित हो चुका है। यह उपन्यास आदिवासी जीवन की कथा कहता है आदिवासी जीवन और समाज का तथाकथित सभ्य समाज से क्या रिश्ता है इसके विमर्श में भी यह उपन्यास ले जाता है लेकिन जो सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाली बात है इस उपन्यास की वह है इसकी कथा कहने की शैली। यह पूरा उपन्यास स्वप्न और यथार्थ के बीच आवाजाही के क्रम में अपनी कथा का विकास करता है। कथा का नैरेटर बचपन में एक स्वप्न देखता है स्वप्न में वह जिन दृश्यों, स्थितियों, घटनाओं और चरित्रों को देखता है वे जाग्रत होने पर उसे हूबहू याद रहते हैं। उसकी यह याद उसे रह रहकर रोमांचित करती है। पाठक को भी करती है। नैरेटर युवा होने पर बचपन में देखे गए सपने के दृश्यों, स्थितियों, घटनाओं और चरित्रों से मिलने की ठानता है। अपने संकल्प को पूरा करने के लिए वह अकेले निकल पड़ता है। उसे दूर जंगल में ऐसे लोग,ऐसे दृश्य और ऐसे चरित्र मिलते हैं जो उसके सपने में देखे गए से मेल खाते हैं। उसके सपने में एक लड़की भी आई थी, उस लड़की को वह खोजता है। उसे लगता है कि जब सबलोग मिल जा रहे हैं तो लड़की भी स्वाभाविक तौर पर मिलनी ही चाहिए। अन्ततः वह लड़की भी मिलती है जो उसके सपने में आई थी, सपने में वह उसका नाम तक नहीं जान रहा होता यहाँ वह लड़की तिलोका के रूप में दिखाई देती है। तिलोका को देखते ही उसके भीतर अजीब सी झुरझुरी होती है। वह तिलोका से प्यार करने लगता है, तिलोका भी उससे प्यार करती है। नैरेटर विवाह का प्रस्ताव रखता है, तिलोका मना कर देती है। नैरेटर वापस आने लगता है तो तिलोका सामने आती है,प्यार का इज़हार यहाँ भी है पर शादी को लेकर तिलोका का स्टैंड जस का तस है। नैरेटर वापस आते हुये तिलोका से आने का वादा करता है और उपन्यास खत्म हो जाता है। यह उपन्यास का एक ड्राफ्ट है। इसमें बहुत सारी ऐसी घटनाएँ और हैं जिनसे यह उपन्यास हमारे सामने कुछ सवाल उपस्थित करता है।

        उपन्यास की स्वप्न कथा उपन्यास का पूर्व भाग है और उस स्वप्न की यथार्थ में परिणति कथा का उत्तर भाग बीच में मध्यभाग भी कह सकते हैं जहां स्वप्न से यथार्थ में जाने की प्रक्रिया का वर्णन है। इस उपन्यास में नैरेटर जिसे वड्डे के गाँव वालों ने क्लोयार सिंह नाम दिया है उसके अलावा जो मुख्य पात्र हैं उनमें तिलोका, अइता, वड्डे और उसके गाँव वाले लोग हैं। नैरेटर जब स्वप्नलोग में है तो उसे जो सबसे ज्यादा आकर्षित वाली जगह है उसके बारे में उसका बयान है –उसकी जड़ के पास से बरगत के तीन चार मोटे चिकने और पीले पत्ते एक ओर सरकाकर जड़ पर बैठ गया। जड़ों के पास बैठना किसी आदमी को छूने, उसके पास बैठने जैसा लग रहा था। जड़ों के भीतर की सफ़ेद हल्की पीली सतह की गर्मी मुझतक पहुँच रही थी। यह बयान एक कवि का बयान है। निखालिस कथाकार के लेखन से अलग इस उपन्यास का शिल्प इस मायने में भी अलग है कि इसके वर्णन में एक कवि की सत्ता का आभास बना रहता है। इसका गद्य एक आंतरिक लय में संगुंफित गद्य का श्रेष्ठ उदाहरण है।

        यह उपन्यास आदिवासी समाज की जीवन शैली और उसके रहन सहन की संस्कृति से भी परिचित कराता है। आदिवासी समाज के बारे में हमारी धारणा जिस तरह की बनी हुई है उस धारणा को सवाल के घेरे में खड़ा किया गया है। हम बार बार यह सोचते हैं कि आदिवासी जीवन को सुधारने के लिए हमें कुछ करना चाहिए। हमारी सरकारों को कुछ ऐसे ठोस कदम उठाने चाहिए जिनसे आदिवासी समुदाय के लोगों को मुख्य धारा में लाया जा सके। लेखक ने इस उपन्यास में तथाकथित इस मुख्यधारा में लाये जाने की सोच और आदिवासी जीवन के यथार्थ को हमारे सामने रखा है। जिसे हम मुख्य धारा कहते हैं उससे आदिवासी समाज की संस्कृति की तुलना करने की जहमत भी हमें कभी कभार उठानी चाहिए। ये जो हमारा आपका वेल सिविलाइज्ड समाज है यह कितना सिविलाइज्ड है इसपर भी विचार किया जाना चाहिए।

        भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण के बाद जिस तेजी से पर्यावरण के समक्ष संकट पैदा हुआ है। जिस तरह जलवायु प्रदूषण,ओज़ोन क्षरण बढ़ा है। जिस तेजी से नदियां प्रदूषित हो रही हैं, सूख रही हैं, पहाड़ कट रहे हैं,जंगल गायब हो रहे हैं,अनियंत्रित वर्षा हो रही है, अनेक तरह की नई नई बीमारियाँ जन्म ले रही हैं उन सब ने दुनियाभर के लोगों को अपनी विकासयात्रा पर विचार करने को मजबूर किया है। इधर के दिनों में  हिंदुस्तान में भी यह बहस तेज हुई है कि हमें अब किस रास्ते आगे बढ़ना चाहिए? नेहरू और अंबेडकर के विकास माडल से हमने जो पाया उससे बहुत बहुत ज्यादा गंवाया है। एक था डॉक्टर एक था संत नामक किताब में अरुंधति रॉय लिखती हैं। जैसे जैसे पृथ्वी गर्म हो रही है, हिमनद पिघल रहे हैं और जंगल गायब हो रहे हैं,, गांधी के शब्द पैगम्बरी साबित हो रहे हैं। गांधी के वे पैगम्बरी शब्द कौन से हैं इसे देखना हो तो 20 दिसंबर 1928 का यंग इंडिया देखना चाहिए जिसमें वे लिखते हैं –भगवान न करें कि कभी ऐसा हो कि भारत उद्योगीकरण को उसी तरह से अंगीकार करे जैसे पश्चिम ने किया है। एक छोटे से द्वीप की सल्तनत के आर्थिक साम्राज्यवाद ने पूरे विश्व को जंजीरों में जकड़ रखा है। यदि 30 करोड़ के पूरे देश ने ऐसी ही आर्थिक शोषण की नीति अपना ली तो वह पूरे विश्व को टिड्डीदल की तरह सफाचट ही कर देगा। जरूरी नहीं कि गांधी का मार्ग अपनाने से हमें किसी तरह की समस्या का सामना न करना पड़ता, हाँ यह जरूर है कि शायद सबसे कम सामना करना पड़ता। तब जबकि पिछले छः महीने से ज्यादा समय से दुनिया डरी सहमी अपने घरों में कैद है, मुझे जिस एक किताब की सबसे ज्यादा याद आती है वह महात्मा गांधी की हिन्द स्वराज ही है।  कहने का आशय यह कि हम अपनी जिस संस्कृति में आदिवासी समुदाय को शामिल करना चाहते हैं पहले यह तो तय कर लें कि क्या वह शामिल किए जाने लायक है? जिस सामाजिक बराबरी और सहजीविता के साथ आदिवासी जीते हैं क्या वह बराबरी और सहजीविता किसी भी रूप में त्याज्य है? आज भी आदिवासी समाज गण चिन्हों और प्रकृति की पूजा करता है। प्रकृति को अपनी सहयात्री मानता है। क्या हम ऐसा मानते हैं? हमारे समाज में प्रेम विवाह के पिछलग्गू जैसा है। हम किसी से प्रेम करते हैं तो उसकी अंतिम परिणति हम विवाह के रूप में चाहते हैं तिलोका इस उपन्यास के नैरेटर से ठीक ठीक वैसा ही प्रेम करती है जैसा नैरेटर करता है लेकिन वह विवाह करने से मना कर देती है। उसके मन में ऐसी कोई संरचना नहीं फिट की गयी है कि प्रेम करने का मतलब विवाह करना ही है। तो ये जो परस्पर भेद है दो समुदायों का इनमें हम जिस समुदाय के हिस्से हैं उसे श्रेष्ठ मानकर क्यों चाहते हैं कि आदिवासी समुदाय को हम समाजीकृत करके अपने जैसा बना लें? क्या सिर्फ इसलिए कि हमने भौतिक प्रगति कर ली है, हमारे पास भौतिक संसाधन, वैज्ञानिक आविष्कार, कंप्यूटर और आधुनिक तकनीक है? लेकिन सवाल है कि इनके होने से हमारे मनुष्य होने का कोई प्रमाण मिलता है क्या? दूर दराज के जंगल में रहने वाला आदिवासी समाज एक अपरिचित व्यक्ति से जिस तरह मिलता है और जितना जल्दी उसे अपना बना लेता है, उसे अपने में शामिल कर लेता है लेखक की नजर में मनुष्य होने की वह सबसे बड़ी निशानी है।

        हम आदिवासी समुदाय के समाजीकरण को लेकर खूब चिंतित रहते हैं लेकिन हम उस समाज की आंतरिक जीवन लय को कितना जानते हैं? उपन्यास का नैरेटर जब आदिवासी समुदाय के लोगों के बीच जाता है तो उसके मन में भी कुछ इसी तरह के ख़याल आते हैं कि हमें इनके लिए,इनके बच्चों के लिए, इनके जीवन को सुधारने के लिए कुछ करना चाहिए लेकिन वह सचेत इंसान है। वह अपने करने को लेकर सशंकित भी है। वह कहता है –यदि मैं इस जगह के लिए, अपने इन आत्मीय और सुखद लोगों के लिए, अलग से कुछ कर नहीं पाया तब तो इनके साथ का मेरा संबंध व्यर्थ है। यदि मैं इनके लिए कुछ भी करूंगा तो वह अंततः एक योजना होगी। विकास से संबन्धित, पानी से संबन्धित, शिक्षा, संस्कृति या जीवन से संबन्धित। और इतना तो निश्चित है कि यह योजना यहाँ के लिए आयातित ही होगी। तो क्या मैं अंततः इस क्षेत्र के लिए, इन लोगों के लिए, इनकी जीवनदृष्टि के हिसाब से एक बाहरी मस्तिष्क का आदमी ही रहूँगा। मैं बिना इनकी परवाह किए अपने ढंग से इनमें बदलाव लाऊँगा। जबकि परिवर्तन जो भी होना चाहिए वह वहीं के ढंग से, वहीं की सोच से और उन्हीं के द्वारा होना चाहिए हमें उसमें सहयोगी मात्र की भूमिका निभानी चाहिए। आदिवासी जीवन और उसके विकास के बारे में सोचने का यह ढंग असल में गांधीवादी ढंग है। यहाँ कथाकार इस ढंग पर ज़ोर देकर अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता भी स्पष्ट करता है। वह तथाकथित सभ्य समाज के उन घेरों से बाहर आने की जहमत उठाता है जिन्हें पार करने का साहस सत्ताएन भी नहीं कर पातीं।

        नवल जी ने इस उपन्यास में आदिवासी जीवन और संस्कृति का जिस तरह से चित्रण किया है वह इनसाइडर की तरह लगता है। आदिवासी समुदाय से आने वाले रचनाकारों की चिंता के मूल में जो बातें और जो तथ्य होते हैं उनका बहुत गंभीर अध्ययन इस उपन्यास में देखने को मिलता है। आदिवासी जीवन और संस्कृति का पर्याप्त चित्रण इस उपन्यास में देखने को मिलता है। आदिवासी समुदाय का जंगल से किस तरह का रिश्ता है इसे देखने के लिए एक छोटा सा उदाहरण पर्याप्त होगा- जंगलों के साथ रहने वालों में यह गजब की क्षमता होती है कि ए दूर से धुंधली आकृति देखकर भी, उसे ठीक से पहचान लेते हैं। जंगल के किसी भी कोने में कोई भी पट्टी खड़कती है तो वे जानते हैं कि वह पट्टी क्यों खड़की है। धूल पर कदमों के निशान, झड़ियों के टूटे डंठल या कुचली हुई घास आदि को देखकर भी वे घटना का अनुमान लगा लेते हैं। जंगल में रहने वाले लोग जंगल से प्यार करते हैं। उससे उनका रिश्ता सहजीवी का रिश्ता होता है।

        यह उपन्यास आदिवासी समुदाय के बारे में गढ़े गए भ्रमों और उनके वास्तविक रूप को भी हमारे सामने लाता है। आदिवासी समुदाय से बाहर का व्यक्ति आदिवासियों के बारे में ऐसी ऐसी बातें करता है जैसे वे किसी और ग्रह के प्राणी हों। उपन्यास का नैरेटर जब आदिवासी समुदाय के बीच जाने की बात सोचता है तो उसे उनके बारे में जो कहानियाँ बताई जाती हैं वे भयंकर रूप से डरावनी हैं। यह भी कम मजेदार नहीं है कि ये कहानियाँ वही लोग सुना रहे हैं  जिन्होने कभी उन इलाकों में जाने की जहमत नहीं उठाई है जहां आदिवासी रहते हैं। उपन्यास के एक संदर्भ से यह बात स्पष्ट करना चाहूँ तो ड्राइवर के साथ क्लेयार सिंह आदिवासी इलाके में जा रहा है, रास्ते में आदिवासियों का एक परिवार दिखाई देता है, ड्राइवर गाड़ी तेजी से वहाँ से निकालकर ले जाता है, क्लेयार सिंह के यह पूछने पर कि ऐसा क्यों किया ड्राइवर कहता है –कुछ भी लेकिन गड़बड़ होती जरूर। वे सब बेतहाशा मंद (एक प्रकार का पेय पदार्थ ज्सिए आदिवासी लोग पीते हैं) पिये हुये थे।उन सबके कंधों पर आपने तुम्बा नहीं देखा। उसमें भी मंद थी। मोड पर या चढ़ाई पर हम होते तो वे गाड़ी रोक लेते। वे सब के सब सड़क के बीच में खड़े हो जाते। फिर हमें गाड़ी रोकनी पड़ती। वे इस गाड़ी में पीछे बैठते और उनके पास हमेशा कुल्हाड़ी होती है। यह ध्यान रहे कि ये बात वह ड्राइवर कर रहा है जो आदिवासी इलाके में कभी गया नहीं है। जिसका कोई परिचय तक नहीं है वह उनके बारे में ऐसी बातें कर रहा है। तो आदिवासी समुदाय को लेकर जो एक तरह कि कहानी गढ़ी गयी है उस कहानी से अलग आदिवासी जीवन के बारे में इनसाइडर की तरह बात करते हुये यह उपन्यास आदिवासी जीवन के कई अनछुए पहलुओं को हमारे सामने लाने का काम करता है।

        नवल जी का व्यक्तित्व मूलतः कवि का व्यक्तित्व है। इस उपन्यास में भी उनका कवि उनके कथाकार के साथ साथ चलता रहा है। कविता की आंतरिक लय इस उपन्यास में भी मौजूद है। यह लय इस उपन्यास को शिल्पगत विलक्षणता प्रदान करता है। अपने पहले ही उपन्यास में नवल जी ने अपने कथाकार व्यक्तित्व की एक छाप छोड़ी है। अपने मूल सरोकार में प्रगतिशील जनपक्षधर जीवन मूल्यों के हिमायती नवल जी ने इस उपन्यास में आदिवासी जीवन और संस्कृति का जो रूप हमारे सामने रखा है वह यथार्थवादी रूप है। आदिवासी समुदाय के बारे में दिलचस्पी लेने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों, पाठकों और शोधार्थियों के लिए समान रूप से उपयोगी यह उपन्यास हिन्दी साहित्य में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखेगा इसकी पूरी संभावना है।

 

जगन्नाथ दुबे

शोध छात्र, हिन्दी विभाग

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी

संपर्क-6389003142

ईमेल-jagannathdubeyhindi@gmail.com

 

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