किताबों की दुनिया
इस बार कविता की तीन नई किताबें
1. ” तिमिर में ज्योति जैसे”
संपादक: अरुण होता
सेतु प्रकाशन दिल्ली
2. ”बाकी बचे कुछ लोग”
अनिल करमेले
सेतु प्रकाशन दिल्ली
”तिमिर में ज्योति जैसे” अरुण होता द्वारा संपादित कोरोनाकालीन कविताओं का एक महत्वपूर्ण संचयन हैं। इस संचयन में अरुण होता ने हिंदी के 43 कवियों की कविताओं का संचयन किया है जिसमें अशोक वाजपेई,ज्ञानेंद्र पति, राजेश जोशी,कुमार अंबुज,अनामिका लीलाधर मंडलोई, मदन कश्यप, नासिरा शर्मा, राकेश रेणु,ज्योति चावला, बोधिसत्व, हरीश चंद्र पांडेय, श्री प्रकाश शुक्ल, जितेंद्र श्रीवास्तव, संजय कुंदन, आत्म रंजन, अनिल करमेले शंकरानन्द, रश्मि भारद्वाज, पूरी मालव, अनामिका अनु, यतीश कुमार जैसे महत्वपूर्ण कवि सम्मिलित हैं।
कोरोना जैसी वैश्विक महामारी ने जिस तरह से भारत सहित पूरी दुनिया को तबाह किया है, उस आघात से जल्द ही उबर पाना कभी संभव न होगा।
इस व्यापक नरसंहार ने कवियों की संवेदना को भी बेहद आहत किया है। लगभग 263पृष्ठों में फैल हुए इस काव्य संचयन में कोरोना समय में कवियों की आहत हुई संवेदना को ही नहीं ,जीवन पर उनके अगाध विश्वास को भी साफ साफ देखा जा सकता है। निराशा और हताशा के बाद भी जीवन पर विश्वास ही शायद इन कविताओं की सबसे बड़ी शक्ति है।
इस संचयन में अरुण होता द्वारा लिखित भूमिका महामारी में जिजीविषा बनाए रखने वाली कविताएं ” भी पठनीय और उल्लेखनीय है।
'बाकी बचे कुछ लोग' इधर के उल्लेखनीय कवि अनिल करमेलेे का सद्य प्रकाशित काव्य संग्रह है। अपने पहले काव्य संग्रह " ईश्वर के नाम पर ”से चर्चित कवि अनिल करमेले समकालीनता के दबाव से भरसक बच निकल कर अपने लिए नई अंतर्वस्तुओं का संधान करने वाले ,यथार्थ के अनचीन्हे सुरंगों और तंग गलियों में विचरण का जोखिम उठाने वाले हिंदी के कुछेक कवियों में से हैं।
उनकी कविताएँअक्सर इस चुप्पी भरे समय में तीखे सवाल पूछने का साहस रखने वाली और हमारी ठस्स पड़ी चेतना को कुरेदने वाली हमारे समय की अत्यंत महत्वपूर्ण कविताएं हैं।
इस संग्रह में अनिल करमेले की लगभग 63 कविताएं संकलित हैं। इस संग्रह में संग्रहित एक कविता है ”देवताओं को सोने दो” ।इस कविता में कवि कहते हैं :
" जब बहुत जरूरत थी
मनुष्यों को देवताओं की
वे निद्रा में थे
अपनी आरामगाहों
नुमाइंदे अपने साम्राज्य के
विस्तार के लिए
वोटिंग मशीनो तक
गए को खींच लाये थे
वे बता रहे थे
हमारे सोने की चिड़िया रह चुके
देश में
अब बहुत अच्छा समय
आ गया है”
अनिल करमेले का यह नया काव्य संग्रह अपनी उल्लेखनीय कविताओं के लिए ध्यान खींचने वाला एक महत्वपूर्ण काव्य संग्रह है।इस काव्य संग्रह का हिंदी साहित्य जगत में स्वागत किया जाना चाहिए।
मैंने अपनी माँ को जन्म दिया है
उनका प्रथम काव्य संग्रह ”एक अतिरिक्त अ” भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार 2016 में चयनित और प्रकाशित काव्य संग्रह है।
रश्मि अपनी अलग भाव संवेदना और शिल्प के चलते तेजी से हिंदी काव्य जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाती हुई नजर आ रहीं हैं। इधर अनेक पत्र पत्रिकाओं में भी उनकी कविताएं देखने की मिल रही हैं।
रश्मि भारद्वाज की कविताओं को लेकर इस संग्रह के ब्लर्ब पर अनामिका ने उचित ही लिखा है :
”रश्मि चौथी पीढ़ी की स्त्री कविता में विशिष्ट स्थान इसलिए भी रखती हैं कि इनमें ठहर कर सोचने का शील है और सोच समझ लेने के बाद अत्यंत निर्भीकता से उचार देने की ईमानदारी भी।”
रश्मि की इन कविताओं को पढ़ना जीवन के उन नमालूम राहों और पगडंडियों से गुजरना है जो अब तक कहीं छिपी हुई थी। संवेदना ,करुणा और प्रेम के उस संसार को जानना है ,दुर्भाग्य से जिसे हम अब तक नहीं जानते रहें हैं।
ताज्जुब हो सकता है कि इस संभावनाशील युवा कवयित्री का अनुभव संसार इतना मौलिक इतना उर्वर और इतना बहुरंगी कैसे है।
जीवन और प्रकृति, प्रेम और स्त्रीजनित करुणा से इतना लबरेज कैसे है। पर जो कुछ भी है, वह रश्मि का अपना सिरजा हुआ और मौलिक है।
रश्मि की अनेक सुंदर कविताओं में से एक" प्रेम में स्त्री ” की कुछ पंक्तियां यहां उद्धृत करना चाहूँगा :
”उस स्त्री का गर्वोन्नत शीश
नत होगा सिर्फ तुम्हारे लिए
जब उसे ज्ञात हो जायेगा
कि उसके प्रेम में
सीख चुके हो तुम
स्त्री होना”
रश्मि की कविताएं हमें आश्वस्त करती है कि उनमें निहित करुणा और प्रेम जीवन की ऊष्मा और आभा से परिपूर्ण एक सुंदर दुनिया की कामना से भरी हुई हैं।
’जो अव्यक्त है वही सबसे सुंदर है ’जैसी सुंदर पंक्ति गढ़ने वाली रश्मि के इस उल्लेखनीय और दूसरे काव्य संग्रह का हिंदी काव्य जगत में खूब स्वागत किया जाना चाहिए।
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समीक्षक- रमेश अनुपम



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