युवा कवि निशांत के कविता संग्रह 'जीवन हो तुम' पर प्रखर युवा आलोचक नीरज कुमार मिश्र की यह समीक्षा प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका आजकल (जनवरी 2021) में प्रकाशित हुई है।
आज का दौर सामाजिक और राजनैतिक विद्रूपताओं के चरम का दौर है। जहाँ विचारधाराओं की चारदीवारी ने मानसिक स्वतंत्रता को और जकड़ लिया है। इस चारदीवारी के अंदर नई तरह की विचारधारा विकसित की जा रही है। ये नई विचारधारा समाज में प्रेम को पनपने नहीं देना चाहती। आज हर जगह प्रेम पर पहरे लगाए जा रहे हैं । हिंदी साहित्य के सभी काल खंड़ों में प्रेम अलग अलग प्रवृत्तियों में विद्यमान है। साहित्य से लेकर सिनेमा तक में प्रेम के विविध रूप देखने को मिलते हैं। जिसने एक बार प्रेम को अनुभव कर लिया उस अनुभव के सामने उसे सब कुछ फीका नज़र आता है। तभी तो जायसी ने इस अनुभवजन्य प्रेम के बारे में लिखा कि “मानुष पेम भएउ बैकुंठी । नाहिं त काह, छार भरि मूठी”। सच्चे प्रेमी के लिए प्रेम ही सब कुछ है।वह इसमें सब कुछ निछावर कर सकता है। कबीर ने प्रेम की इसी फक्कड़ प्रवृति की ओर संकेत किया है कि " प्रेम पियाला जो पिये शीश दक्षिणा देय ! लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय।" प्रेम केऐसे माहौल मेंएक युवामन प्रेम की बीनबजाता समाज में प्रेम की अगन लगाता घूम रहा है-" कहाँ से सीखा इतनी अच्छी बाँसुरी बजाना/इस जंगल में आग लगाना।"इस कवि के लिए ये “ जंगल एक जादू है/मन एक आकाश/ प्रेम एक आग है”। इसी आग के आईने में निशांत जैसा कवि समाज के कई पक्षों को उजागर करता है।
कवि निशांत के अंदर ऐसा ही युवामन प्रेम की पाठशाला जमाये बैठा है। ये कवि मन प्रेम को खुद ही नहीं जीता, बल्कि अपनी कविताओं के माध्यम से पाठकों
को भी इसका अहसास कराता है। इस कवि का हाल में प्रकाशित संग्रह "जीवन हो तुम" में प्रेम की अनुभूति से पगी कविताओं का
संकलन है। प्रेम को लेकर इस कवि ने अनेक कविताएं लिखीं हैं।प्रेम के अनेक पहलुओं को
इस संग्रह की कविताओं में आप देख सकते हैं।सही मायने में प्रेम करने वाले केवल
प्रेम नहीं करते,बल्कि एक-दूसरे को रच
रहे होते हैं।इनकी कविताओं में आया प्रेम वासनाजन्य प्रेम नहीं है, बल्कि ये प्रेम; विश्वास,आस्था
और समानता के सहचर से उपजा है।आज के विकट समय में प्रेम की बहुत जरूरत है।प्रेम
अंतर्मन को छूने की एक अद्भुत कला है।प्रेम कोमल अनुभूतियों का अप्रतिम एहसास
है।प्रेम में डूबने वाला,उसमें और डूबना चाहता
है।प्रेम के अनेक रंग इस संग्रह की कविताओं में देख सकते हैं।एक प्रेमी के लिए
उसका प्रेम ही सब कुछ होता है।आज के कठिन समय में प्रेम के माध्यम से ही समाज में
खत्म होती मनुष्यता को बचाया जा सकता है।ये कवि उसी जर्जर होती को मनुष्यता को
बचाने में लगा है।कहानीकार और कवि उमाशंकर चौधरी ने इस संग्रह के ब्लर्ब में सही लिखा
है कि “ एक ऐसे कठिन समय में जब चारों तरफ सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर उथल-पुथल मची
हुई हो,जब आदमी के हित को
बहुत पीछे छोड़ सत्ता और तंत्र के पक्ष में एक खास तरह की मानसिकता तैयार की जा
रही हो,जब आम आदमी की जिंदगी को चंद अस्मिताओं में सिमटा कर उसे वोट बैंक में
तब्दील किया जा रहा हो या इस बाजारवादी संस्कृति में जिसके महत्त्व का अवमूल्यन
किया जा रहा हो,तब प्रेम के लिए इस सबसे भयावह समय में
निशांत का प्रेम कविताओं का यह संग्रह कोमल पत्तों पर ओस के फाहे जैसा है।यह
संग्रह जहाँ एक तरफ हमें सुकून देता है,वहीं दूसरी तरफ अपने
स्वरूप में प्रतिरोध का एक नया अध्याय भी रचता है।”
सही मायने प्रेम स्वयं के विसर्जन की पराकाष्ठा है।प्रेम में
संभव और असम्भव सब एक साथ घटित होते दिखते हैं।प्रेमी मन जब मिलते हैं तो कुछ नया
सृजित करते हैं।कवि राकेशरेणु की कविता “सृजन” प्रेमीमन की इसी सृजन प्रक्रिया
व्यंजित करती है।इस कविता में प्रेम की उत्कर्ष-कथा निर्मित होती दिखती है-“ प्रेम
में डूबा आदमी स्वयं उत्कर्ष है मनुष्यता का/उसी ने रची संस्कृति,ऋचाएँ/इसी मोड़
पर मिले हम-तुम एक दिन/ कभी न बिछड़ने और/इतिहास रचने के लिए।” इस ढाई अक्षर के
शब्द को हम किसी परिभाषा में नहीं बाँध सकते। इस बात को कवि निशांत “परिभाषा”
कविता में स्वीकार करता है-“प्यार की/कोई परिभाषा नहीं है मेरे पास।” लेकिन इस कवि
के लिए प्रेम ‘मौन भी अभिव्यंजना है’के रूप में परिलक्षित होता
है।“प्रेम” कविता इसी मौन को स्वीकृत करती है-“ एक मीठे प्यास का दरिया/ एक अतृप्त
पथिक / दोनों वाचाल/मौन खड़े।” सच्चा प्रेम देह को महत्त्व नहीं देता है क्योंकि
प्रेम देह को मारकर ही पैदा होता है।कवि सुभाष राय की कविता “प्रेम” में प्रेम की
इसी मौन वीणा को परिभाषित किया गया है-“तुम प्रेम की परिभाषाएँ चाहे जितनी कर लो/
पर प्रेम का अर्थ नहीं कर सकते/प्रेम खुद को मारकर सबमें जी उठना है/ प्रेम अपनी
आँखों में सबका सपना है”। तभी तो ये कवि अपनी समस्याओं से घिरे इस जीवन होते रेत
को बचाने के लिए बार बार प्रेम की ओर लौटता है-“ दूर नहीं,पास
लहरा रही होती हैं/समस्याएँ/जीवन रेत की तरह हो रहा होता है/ आता हूँ तुम्हारे
पास।”
आज बाज़ारवाद
ने हमारे सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य को बदल दिया है। इस परिदृश्य ने हमारे आपसी
संबंधों की मिठास को लगभग सोख लिया है।सभी दबावों के बावजूद प्रेम में स्त्रियाँ
सबकुछ छोड़कर भी कुछ नहीं छोड़ पातीं। विडम्बना ये है कि उस समय हम पुरुष उन स्त्रियों
को समझ नहीं पाते।“एक फूल” कविता इसी विडम्बना को चरितार्थ करती है-“ कैसे पुरुष
हो ? एक स्त्री की बात नहीं समझते/उन क्षणों में स्त्री,स्त्री
नहीं रहती/ पूरी प्रकृति होती है/जो भी माँगो बन जाएगी/ जो भी चाहो,हो जाएगी/प्राण देह भूख इंसान
जानवर देवी देवता /कुछ भी...”। इस कविता के माध्यम से कवि स्त्री-पुरुष के बीच के
भेद को मिटाकर समानता की पैरवी करता है। इस संग्रह की कविताएँ दो प्रेमियों के
आपसी संवाद से उपजी हैं।अज्ञेय जिस तरह स्त्री-पुरुष संबंधों में मैत्री संबंधों
को सर्वोपरी मानते हैं।उसी तरह इस संग्रह में इस कवि ने सखी सखा संबंध को केवल
विकसित ही नहीं किया,बल्कि प्रेअम की भावभूमि में प्रतिष्ठित
करने का महत्त्वपूर्ण काम किया है। यही वजह है कि इन कविताओं में आए एक-एक शब्द इन
प्रेमीमन में उपजे प्रेम को परिभाषित करते दिख जायेंगे। प्रेम को एक छोटी सी डिबिया
में बचाने की चाह रखने वाला ये कवि क्रूर होते समाज के सामने प्रतिरोध का नया
आख्यान खड़ा करता हुआ प्रेम की नई वैकल्पिक दुनिया रचता है।इन प्रेम कविताओं के
माध्यम से कवि ने सामाजिक विड़ंबनाओं का कटु यथार्थ हमारे सामने खड़ा दिया है।
इस संग्रह की कविताएँ दार्शनिक प्रेमानुभूति को व्यंजित करती
हैं।बहुत सहजऔर सरल भाषा में इस कवि ने अपने मन के अंतरंग कोमल भावों को जैसे
पाठकों के सामने खोलकर सहजता से रख दिया हो।संवादशैली में लिखा ये संग्रह कहीं–कहीं
बहुत सरलीकरण का शिकार होता दिखता है।इसके बावजूद ये संग्रह प्रेम और मानुष जीवन
के बीच सेतु की तरह काम करता दिखता है।ये संग्रह पाठकों के दिलों में प्रेम की
कितनी मिठास घोल पाता है ये तो आने वाला समय ही बतायेगा।
कविता-संग्रह – जीवन हो तुम
कवि –निशांत
प्रकाशक – सेतु प्रकाशन
संस्करण- 2019

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