वरिष्ठ कथाकार श्री संतोष दीक्षित का पिछले वर्ष प्रकाशित उपन्यास ' घर बदर ' राम अवतार दुबे तदन्तर दुर्गाशंकर दुबे तथा उनके पौत्र कुंदन दुबे की कथा है जो कमल, किशोर और कौशल नामक उनके तीन पुत्रों तक आती है। घर से विस्थापित तीन पीढ़ियों की कथा में स्थाई घर बनवाने का सपना केंद्र में है। पर इस सपने की जद में एक पूरी सदी को लांघती बढ़ती कथा समाज के बदलते ढंग और ढांचे के साथ हिंदी पट्टी की अधोगति की कहानी भी कहती चलती है। राम अवतार दुबे द्वारा सौंपी गई कुल देवी की प्रतिमा और घर के मरजाद की पुस्तिका सम्भालते कुंदन दुबे माता विष्णुप्रिया की आज्ञा को शिरोधार्य कर जीते हैं। रागिनी, रमोली और रानी नामक बहनों की शादी कराते हैं। शर्मिला यानी शारदा को माता की आज्ञा से व्याहकर लाते हैं। इधर उधर की नौकरी से मुक्ति ले रेलवे में मालगाड़ी के गार्ड बनकर जीवन शुरू करते हैं और इस तरह आज्ञाकारिता का भाव क्रमशः तिरोहित होता जाता है और पत्नी शारदा के घर के सपने में खो सा जाता है। घर बनाने की प्रक्रिया में तबाह हो जाते कुंदन दुबे पत्नी से सहज प्यार भी नहीं पा पाते और छोटे बेटे कौशल की नालायकी से आतंकित होकर सेवा निवृत्ति के नरक को भोगते एक दिन लम्बी बीमारी के बाद दम तोड़ देते हैं।
जीवन भर अपने घर की जदोजहद में खप जाने वाले कुंदन मरने के बाद अपनी तस्वीर में भी जीवित नहीं रहते, उनके श्राद्ध वाली तस्वीर को अशुभ मान घरवाले उनके मित्र को देकर उनसे मुक्त हो जाते हैं। घर बिक जाता है। बेटे हिस्सा ले उड़ जाते हैं। पत्नी उनकी पेंशन से स्कूल चलाने लगती हैं और इस तरह दुबे परिवार की सनातनी घर बदरी कायम रहती है।
उपन्यास बदले हुए समय को बारीकी से आंकता है। छीजते मूल्य, दरकती व्यवस्था, सामाजिक छद्म और प्रपंच से भरे नाना सम्बन्धों और समाजों को एक रोचक किसागोई में ढालते श्री दीक्षित ने उपन्यास को जिस तरह बरता है और जिस तरह उसे एक परिवर्तनकामी विमर्श में बदल दिया है, वह सचमुच छूनेवाला है। आज जबकि कथा को महज विमर्श का एक जरिया बनाकर उपन्यास रच डालने की हड़बड़ी दिख रही है, जिसमें न रस है, न रहस्य, न जिज्ञासा है, न घटनात्मक तनाव के मर्म भरे मोड़ ; यह उपन्यास एक सबक की तरह आता है। एक पारिवारिक कथा के बहाने अपने समय से टकराकर मनुष्य की सही जगह की खोज और उसके स्वत्व की निशानदेही करता ' घर बदर ' निश्चय ही हमें एक बड़ी सीख देता है। भाषा, चारित्रिक संयोजन, नाना अंतर्कथाओं से केंद्रीय कथा के संगुम्फन से लेकर उपन्यास में शुरू से अंत तक जिस तनाव का परिपाक हुआ है, वह श्री दीक्षित के कथा कौशल का प्रमाण तो है ही, एक बड़े मानवीय विमर्श के साथ सामाजिक बदलाव का क्रमागत आकलन भी है।
इस यादगार उपन्यास के प्रकाशन के लिए सेतु प्रकाशन, दिल्ली भी सराहना का हकदार है।
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ज्योतिष जोशी, वरिष्ठ रचनाकार, आलोचक

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