सवा सौ साल पुरानी पत्रकारी नजीर (आउटलुक पत्रिका में छपी 'पुरखा पत्रकार का बाइस्कोप' पुस्तक की समीक्षा) आउटलुक पत्रिका और आलोचक हरिमोहन मिश्र का आभार

 "सवा सौ साल पुरानी पत्रकारी नजीर

आज का दौर देख कई बार पत्रकार होने और पत्रकारिता से तौबा कह देने का विचार प्रबल हो जाता है। क्या ऐसी ही पत्रकारिता उस देश की नियति है, जहां आधुनिक पत्रकारिता का इतिहास कम से कम सवा सौ साल से अधिक पुराना है? क्या इतने पुराने इतिहास ने हमें कुछ नहीं सिखाया? लेकिन ‘पुरखा पत्रकार का बाइस्कोप’ शिद्दत से यह एहसास जगाती है कि शुरुआती दौर से ही इस देश में ऐसे दिग्गज पत्रकार हो चुके हैं, जो न सिर्फ स्थितियों को बयान करने में निडर थे, बल्कि बारीक जानकारियों पर निगााह के साथ शैली और शिल्प की खूबसूरती और संप्रेषण कला में माहिर थे। रिपोर्ताज, समीक्षा, रिपोर्ट, संस्मरण, देश के तब के एक कोने से दूसरे कोने और संस्कृतियों के विस्तृत वर्णन का यह संकलन नगेन्द्रनाथ गुप्त का है, जो 1890 के दशक में महान राष्ट्रवादी (आज के अर्थों से उलट) सरदार दयाल सिंह मजीठिया के अखबार ‘ट्रिब्यून’ के संपादक थे। उसके बाद वे उस जमाने के मशहूर पत्र-पत्रिकाओं ‘लीडर’, ‘हिंदुस्तान’ के भी संपादक रहे और ‘मॉडर्न रिव्यू’ जैसे अनेक स्वनामधन्य प्रकाशनों से जुड़े रहे। वे 1940 में मृत्यु तक लगातार सक्रिय रहे और 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम से लेकर तब तक के दौर की बारीक और अनकही जानकारियों से चौंका जाते हैं। पुस्तक का पहला अंग्रेजी संस्करण 1947 में छपा था। उस संस्करण में संविधान सभा के पहले अध्यक्ष सच्चिदानंद सिन्हा अपनी टिप्पणी में लिखते हैं, ‘‘मेरा देश के सभी बड़े पत्रकारों से वास्ता रहा, लेकिन अंग्रेजी भाषा और विविध विषयों पर लेखन में श्री गुप्त जैसा कोई नहीं मिला।’’

लेकिन मौजूदा और पहले हिंदी संस्करण के संपादन और अंग्रेजी से अनुवाद के लिए वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द मोहन को इसलिए भी साधुवाद देना चाहिए कि ऐसी दुर्लभ किताब को उन्होंने ढूंढा और बड़े जतन से हमारे लिए उपलब्ध कराया। अनुवाद सुंदर है और उसमें लेखक की शैली का ध्यान रखा गया है। विषयों के संयोजन-संपादन में भी यह ध्यान रखा गया है कि हर कालखंड का एहसास दिला जाए। अरविन्द मोहन भूमिका में इस किताब की ओर आकृष्ठ होने का ब्यौरा कुछ इस तरह देते हैं, ‘‘इतिहास की काफी सारी चीजों का आंखों देखा ब्यौरा और वही तब के एक शीर्षस्थ पत्रकार का हमने नहीं देखा-सुना था।’’
 इसमें 1857 की क्रांति के किस्से, खासकर कुंवर सिंह और उनके भाई अमर सिंह के हैं, नवाब वाजिद अली शाह को कलकत्ता में नजरबंदी के समय देखने का विवरण और उसके बाद की तो लगभग सारी बड़ी घटनाओं का विवरण कुछ अलग अंदाज और दिलचस्प शैली में मिलता है।  रामकृष्ण परमहंस, ब्रह्म समाज के केशव चंद्र सेन, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती के भाषणों और चमत्कारिक व्यक्तित्वों तथा घटनाओं का आंखों देखा ब्योरा है। ब्रितानी किंग और प्रिंस  के दरबारों और कांग्रेस के गठन से लेकर लगातार उसके अधिवेशनों में भागीदारी और हर बारीक वर्णन ऐसे मिलता है, मानो अरविन्द मोहन के शब्दों में, ‘‘जैसे लेखक पत्रकार न होकर महाभारत का संजय हो।’’
नगेन्द्रनाथ गुप्त का जन्म तो बिहार के पुराने मोतिहारी में हुआ, जो 1934 के भूकंप में एकदम बर्बाद हो गया और अब नया शहर उसके बगल बसा है, लेकिन वे मूल निवासी बंगाल में कोलकाता के एक उपनगर नैहाटी के पास एक गांव के थे। उनके वर्णन से यह भी पता चलता है कि नैहाटी उनके देखते ही देखते कैसे बदल गया और लगभग बहुत हद तक बिहारियों की बस्ती में तब्दील हो गया। यह बताता है कि शहरीकरण कैसे स्थानीयता पर हावी हो जाता है और उसकी संस्कृति की सुंदरता और विशेषता को नष्ट कर डालता है। इसमें गंगा के बीच नाव में रामकृष्ण परमहंस की समाधि लग जाने का भी विवरण है। नगेन्द्रनाथ गुप्त उस दौर की शायद ही कोई बड़ी शख्सियत हो,जिससे न मिले हों और उनके बारे में न लिखा हो। रवींद्रनाथ ठाकुर, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, बालगंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय जो भी नाम आपकी जेहन में आएं, सबके बारे में उनकी अनोखी टिप्पणियां मिलती हैं। वे लाहौर से लेकर देश के हर कोने तक की यात्रा कर चुके थे।
यकीनन यह किताब एक थाती की तरह है, जो हमें काफी समृद्ध कर जाती है। आज के दौर में तो यह बड़ी जरूरी किताब है। कहीं-कहीं प्रूफ की त्रुटियां जरूर खटकती हैं मगर साज-सज्जा आकर्षक है। इसे आज हर किसी को पढऩा चाहिए।

(आउटलुक से साभार)
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आलोचक : हरिमोहन मिश्र
पुस्तक :  पुरखा पत्रकार का बाइस्कोप
नगेन्द्रनाथ गुप्त
संपादन व अंग्रेजी से अनुवाद: अरविन्द मोहन
सेतु प्रकाशन
मूल्य: 235 रु.
पृष्ठ:240
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सामाजिक वर्जनाओं की चारदीवारी में घिरी स्त्री के मन की पीडाओं के कारणों की पड़ताल करती कवितायेँ (पुस्तक 'मैंने अपनी माँ को जन्म दिया है' की समीक्षा) आलोचक अशोक कुमार का आभार

“सामाजिक वर्जनाओं की चारदीवारी में घिरी स्त्री के मन की पीडाओं के कारणों की पड़ताल करती कवितायेँ.” इन कविताओं से गुजरते हुए मैंने यह जाना कि स्त्री मन की पीडाओं को महसूस कर पाना संवेदनशील से संवेदनशील पुरुष के भी बस की बात नहीं है. यहाँ सहानूभूति और अनूभूति के बीच यह जो गहरी खाई है उसे हम पुरुष कभी नहीं पाट सकते। यह कवितायेँ जटिल मानवीय संबंधों (जिनसे झूझते हुए सहेजने की कवायद में स्त्री खुद को कहीं खो बैठती है) को सहजता और सरलता से व्यक्त करती हुई आपको संबंधों और संवेदनाओं के एक अबूझ संसार में ले जाती हैं।



यह कवितायेँ दो शहरों के मध्य अपने अस्तित्व को तलाश रही स्त्री के वह शिकायत पत्र हैं जो वह खुद के नाम लिखती है. जिनमे वह लिखती हैं- “मैं दो शहरों के बीच खोजती हूँ/ एक बीत गयी उम्र/ एक ने मुझे नहीं सहेजा/ दुसरे को मैंने नहीं अपनाया/ मैं दोनों की गुनाहगार रही।

एक तरफ यह कवितायेँ स्मृतियों के उदास दस्तावेज हैं तो दूसरी तरफ दुःख के संस्मरण भी। और इस सबके बीच परिस्थितयों के विरुद्ध टिके रहने के साहस की प्रमाण भी।

एक पल कवियत्री कहती हैं-

मेरी यत्न से सवारी गयी देह/ कुटिलता से उघार देती थी हर बार/ आत्मा की सभी नील-खरोंचे

और दूसरे पल कहती हैं-

हम स्मृतियों में लौटते हैं/ क्योंकि लौटने के लिए कहीं कुछ और नहीं / वह सभी जगह जहाँ हम जा सकते थे/ हमारी पहुँच से थोडा आगे बढ़ चुकी हैं

एक और कविता देखिये-

प्रेम में भय है/ या की भय से ही प्रेम/ वह अपने अन्दर के उस शैतान से डरती है/ जिसे सब कुछ चाहिए/ आँख भर नींद/ उम्र भए के सपने/ थोड़ी सी आंच/ और एक मज़बूत गर्म हथेली/ जिसे थामकर दुखों को पिघलता हुआ महसूस किया जा सके।

यहाँ  वह कविताये हैं जहाँ कवियत्री थक जाने के बाद “नींद को मरहम कहती है” यह थकान मात्र दौड़-भाग की नहीं है।

रानू मंडल के बहाने कवियत्री कहती हैं की हमें दुखो को भी याद रखना चाहिए क्योंकि

“दुखों को भूल जाना/ अपनी आत्मा की सबसे मधुर लय को खो देना है।

यह कवितायेँ केवल स्त्रीमन को टटोलती, दुखों को ही दर्ज करती नहीं बल्कि कवियत्री की सामाजिक चेतना को को भी दर्ज़ करती हुई विश्व की सबसे बड़ी चिंताओं और सवालों को मुखरता से स्वर भी देतीं हैं। दुनियाभर में वह विस्थापित जो पहचान के संकट से जूझ रहे हैं उनके लिए लिखती हैं-

एक घर/ एक परिवार/ एक देश/ एक पहचान/ कागजों से बनी इस दुनिया में जी सकने के लिए/ उन्हें दरकार है/ बस एक कागज की।

कवियत्री केवल अपने दुःख ही नहीं लिखती, वह तमाम स्त्रियों के दुखों को साझा समझते हुए “बहनापा” भी रचती हैं।

यह कवितायेँ साहस की उम्दा मिसाल हैं जहाँ कवियत्री लिख सकी है कि-

मां के लिए लिखी गयी हर कविता में/ तुम एक अघोषित खलनायक थे पिता।

और फिर पिता और माँ के उस प्रेम के लिए जिसे कभी शब्दों में नहीं गया उसके लिए लिखती है कि-

हमारे लिए प्रेम हमेशा अव्यक्त ही रहा/ लेकिन हम आज भी जानते हैं यह बात मन ही मन में/ कि जो अव्यक्त है वही सबसे सुन्दर है।

जहां समाज में आज भी स्त्री का तमाम प्रेम, आत्मा की तमाम पवित्रता उसके देह के किसी ख़ास अंग से आंकी जाती रही है वहां तमाम वर्जनाओं को तोड़ते हुए कवियत्री रच रही है-

उसे पत्थरों से पीटा गया/ जंजीरों से जकड़ा गया/ अग्नि से जलाया गया/ सरियों से विक्षित किया गया/ उपभोग के बाद/ वह घृणा की पात्र थी/ स्त्री की मृत देह पर भी/ योनी को उसके होने की सज़ा दी गयी।

स्त्री के लिए बोनसाई जैसे बिम्ब कविताओं में नवीनता लेकर आये है। बिंदी, नदी के माध्यम से कही गयी कवितायेँ प्रचलित बिम्बों के सहारे कहन का नयापन लिए हुए हैं।

इस संग्रह में एक कविता है “पति की प्रेमिका के नाम”। उसका एक अंश पढिये-

मेरे पास था/ एक प्रेम का अतीत/ एक बीत गयी उम्र/ और एक बीतती जा रही देह के साथ/ उसके प्रणय का प्रतीक/ एक और जीवन तुम्हारे पास था/ एक प्रेम का वर्तमान/ यौवन का उन्माद/ देह का समर्पण/ और मेरे लिए एक चुनौती लेकिन अपना भविष्य तो हम दोनों ने/ किसी और को सौप रखा था।

यह होता कि तुमने मेरे अतीत/ और मैने तुम्हारे वर्तमान का साझा दुःख पढ़ा होता/ काश कि हमें दुःखो ने भी बांधा होता।

इन कविताओं में हम खोते चले जाते है. यह कविताएँ गाँव के पुल को तलाश करती हुई पुरखों की उन माफियों को सुनती हैं जो वह अपनी की गयी तमाम गलतियों के लिए मांग रहे है।

यह कविताएँ ईश्वर पर पक्षपाती होने का आरोप लगाने का साहस करती है, सुख की खोज में भटकती हुई तमाम दुःख देखती हैं, पूंजीवाद और बाजारवाद के विरुद्ध न कहने का माद्दा रखती हैं और मौन को कायरता मानने से इनकार करती हैं।

कुल मिलाकर यह संग्रह पढ़ा जाना चाहिए. अगर मेरी पसंद की एक कविता इस संग्रह से चुननी हो तो वह यह होगी-

एक पुरुष ने लिखा दुख

और यह दुनिया भर के वंचितों की आवाज़ बन गया

एक स्त्री ने लिखा दुःख

यह उसका दिया एक उलाहना था


एक पुरुष लिखता है सुख

वहाँ संसार भर की उम्मीद समायी होती है

एक स्त्री ने लिखा सुख

यह उसका निजी प्रलाप था


एक पुरुष ने लिखा प्रेम

रची गई एक नयी परिभाषा

एक स्त्री ने लिखा प्रेम

लोग उसके शयनकक्ष का भूगोल तलाशने लगे


एक पुरुष ने लिखी स्त्रियाँ

ये सब उसके लिए प्रेरणाएं थीं

एक स्त्री ने लिखा पुरुष

वह सीढियाँ बनाती थी


स्त्री ने जब भी कागज़ पर उकेरे कुछ शब्द

वे वहां उसकी देह की ज्यामितियां ख़ोजते रहे

उन्हें स्त्री से कविता नहीं चाहिए थी

वे बस कुछ रंगीन बिम्बों की तलाश में थे


भक्ति काल में मीरा लिख गयीं -


राणाजी म्हाने या बदनामी लगे मीठी।

कोई निन्दो कोई बिन्दो, मैं चलूंगी चाल अपूठी...

1930 में महादेवी के शब्द थे-

विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरा न कभी अपना होना...


1990 में लिखती हैं अनामिका -

हे परमपिताओं,

परमपुरुषों–

बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो!


2018 में यह पंक्तियाँ लिखते

रश्मि भारद्वाज 
मैं आपके लिए तहेदिल से चाहती हूँ

'ग्रो अप

एन्ड मूव ऑन'


और आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए

20 ....लिख कर रिक्त स्थान छोड़ती हूँ

उम्मीद करती हूँ कि अब कोई नयी बात लिखी जाए!

(रश्मि भारद्वाज) 




आलोचक : अशोक कुमार

किताब: “मैंने अपनी मां को जन्म दिया है”

लेखक: रश्मि भारद्वाज

प्रकाशक: सेतु प्रकाशन

मूल्य: 130 रूपए 

विधा: कविता

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निम्न मध्यवर्गीय जीवन की यातना और स्वप्नभंग (हंस पत्रिका के जुलाई अंक में छपी उपन्यास 'घर बदर' की समीक्षा) आलोचक ज्योतिष जोशी और हंस के संपादक संजय सहाय का आभार





उपन्यास अगर आधुनिक जीवन का महाकाव्य बन सका तो इसीलिए की उसमें वर्तमान के संत्रास को भविष्य की आहट में पहचान सकने की क्षमता देखी गई। यह तब होता है जब उपन्यासकार अपने समय की विरूपताओं से टकराते हुए एक सचेत दृष्टि के साथ भविष्य का खाका हमारे समक्ष रखता है। इसका आशय यह कत्तई नहीं है कि केवल यथार्थ को प्रस्तुत कर देने मात्र से कोई उपन्यासकार अपने कर्तव्य में कृतकार्य हो जाता है। सच तो यह है कि जब तक वह अपने 'विषय' को स्वयं नहीं जीता और बार बार क्षत विक्षत होते हुए जब तक एक स्पष्ट बिंदु तक नहीं पहुंचता, जिसमें हम वर्तमान से भविष्य तक की एक दृश्य रेखा देख सकें, तब तक उसके किए धरे की छाप हम पर नहीं पड़ पाती। इस दृष्टि से हाल ही प्रकाशित सन्तोष दीक्षित का उपन्यास ' घर बदर' ध्यान आकर्षित करता है।


संतोष दीक्षित हिंदी के महत्वपूर्ण कथाकार हैं जिनके अनेक कहानी संग्रह प्रकाशित हैं। 2010 में प्रकाशित उनके चर्चित उपन्यास ' केलिडोस्कोप' के ठीक दस वर्ष बाद ' घर बदर' का छपना कोई संयोग नहीं है, वरन एक रचनाकार के नाते उनके गहन मंथन और आनुभूतिक यात्रा का परिणाम है। यह उपन्यास इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसमें निरन्तर बदलते परिवार और समाज की गहन पड़ताल है तथा एक पराभूत सभ्यता का विमर्श भी। एक परिवार के बहाने सामाजिक परिवर्तन के समानांतर मूल्य विपर्यय को, उसके समग्र अंतर्विरोधों को बारीकी से रखने के कारण निश्चय ही यह उपन्यास गम्भीर बहस की मांग करता है।

' घर बदर ' राम अवतार दुबे तदन्तर दुर्गाशंकर दुबे तथा उनके पुत्र कुंदन दुबे की कथा है जो कमल, किशोर और कौशल नामक उनके तीन पुत्रों तक आती है। घर से विस्थापित तीन पीढ़ियों की कथा में स्थाई घर बनवाने का सपना केंद्र में है। पर इस सपने की जद में एक पूरी सदी को लांघती बढ़ती कथा समाज के बदलते ढंग और ढांचे के साथ हिंदी पट्टी की अधोगति की कहानी भी कहती चलती है। राम अवतार दुबे द्वारा सौंपी गई कुल देवी की प्रतिमा और घर के मरजाद की पुस्तिका सम्भालते कुंदन दुबे माता विष्णुप्रिया की आज्ञा को शिरोधार्य कर जीते हैं। रागिनी, रमोली, रजनी और रानी नामक बहनों की शादी कराते हैं। शर्मिला यानी शारदा को माता की आज्ञा से व्याह कर लाते हैं। इधर उधर की नौकरी से मुक्ति ले रेलवे में मालगाड़ी के गार्ड बनकर जीवन शुरू करते हैं और इस तरह आज्ञाकारिता का भाव क्रमशः तिरोहित होता जाता है और पत्नी शारदा के घर के सपने में खो सा जाता है। घर बनाने की प्रक्रिया में तबाह हो जाते कुंदन दुबे पत्नी से सहज प्यार भी नहीं पा पाते और छोटे बेटे कौशल की नालायकी से आतंकित होकर सेवा निवृत्ति के नरक को भोगते एक दिन लम्बी बीमारी के बाद दम तोड़ देते हैं। 

जीवन भर अपने घर की जदोजहद में खप जाने वाले कुंदन मरने के बाद अपनी तस्वीर में भी जीवित नहीं रहते, उनके श्राद्ध वाली तस्वीर को अशुभ मान घरवाले उनके मित्र को  देकर उनसे मुक्त हो जाते हैं। घर बिक जाता है। बेटे हिस्सा ले उड़ जाते हैं। पत्नी उनकी पेंशन से स्कूल चलाने लगती हैं और इस तरह दुबे परिवार की सनातनी घर बदरी कायम रहती है। 

उपन्यास बदले हुए समय को बारीकी से आंकता है। छीजते मूल्य, दरकती व्यवस्था, सामाजिक छद्म और प्रपंच से भरे नाना सम्बन्धों और समाजों को एक रोचक किसागोई में ढालते श्री दीक्षित ने उपन्यास को जिस तरह बरता है और जिस तरह उसे एक परिवर्तनकामी विमर्श में बदल दिया है, वह सचमुच छूनेवाला है। आज जबकि कथा को महज विमर्श का एक जरिया बनाकर उपन्यास रच डालने की हड़बड़ी दिख रही है, जिसमें न रस है, न रहस्य, न जिज्ञासा है, न घटनात्मक तनाव के मर्म भरे मोड़ ; यह उपन्यास एक सबक की तरह आता है। एक पारिवारिक कथा के बहाने अपने समय से टकराकर मनुष्य की सही जगह की खोज और उसके स्वत्व की निशानदेही करता ' घर बदर ' निश्चय ही हमें एक बड़ी सीख देता है। भाषा, चारित्रिक संयोजन, नाना अंतर्कथाओं से केंद्रीय कथा के संगुम्फन से लेकर उपन्यास में शुरू से अंत तक जिस तनाव का परिपाक हुआ है, वह श्री दीक्षित के कथा कौशल का प्रमाण तो है ही, एक बड़े मानवीय विमर्श के साथ सामाजिक बदलाव का क्रमागत आकलन भी है। 

'घर बदर' का ताना-बाना बेहद जटिल है जिसे बहुत बारीकी से लेखक ने साधा है । उपन्यास ठीक उसी तरह नाना तरह के चरित्रों से भरा पड़ा है, जैसे हमारे समाज और परिवार की संरचना होती है। रायबरेली से विजातीय लड़की से ब्याह रचाकर भागकर इलाहाबाद आये राम अवतार दुबे हों या पिता दुर्गाशंकर दुबे, सब उसी तरह हैं जैसे कुन्दन दुबे हैं। आशंका, भय और कथित मर्यादा में अपने को सिकोड़ कर जीते जैसे राम अवतार चंदा से आतंकित दिखते हैं, वैसे ही दुर्गाशंकर, विष्णुप्रिया से और कुन्दन शर्मिला उर्फ़ शारदा से । नगरपालिका में वकील रिश्तेदार रामदुलारे दीक्षित की कृपा से पानी पिलाने की नौकरी पाकर जिस तरह दिन काटते हैं, उसी तरह दुर्गाशंकर प्राइवेट नौकरी में रहकर गुजर करते हैं। लकवाग्रस्त होने के बाद नौकरी से निकाल दिए गये दुर्गाशंकर परिवार को संकट में डाल देते हैं। तब विष्णुप्रिया की इंटर पास डिग्री काम आती है और वे अपने दूर के रिश्तेदार की मदद से एक ईसाई अस्पताल में हाउसकीपर के पद पर काम पाकर टूटे-बिखरे घर को पटरी पर लाने का यत्न करती हैं ।

यह विष्णुप्रिया दुनियादारी को बहुत बारीकी से समझती हैं। एक चतुर, अड़ियल, मौकापरस्त और दबंग औरत के रूप में वह उपन्यास के पूर्वार्द्ध तक प्रभावी रहती हैं। उनके व्यक्तित्व से जहाँ घर की चारों लड़कियाँ दबंग बन जाती हैं, वहीं कुन्दन दब्बू और आशंकित व्यक्तित्व ही पा पाते हैं जो घर का बोझ लिए कभी ट्युशन करते हैं तो कभी दाल मिल में कैशियर का काम। अंत में बेटे को सरकारी नौकरी में देखने की प्रतिज्ञा विष्णुप्रिया एक दूर के रिश्तेदार की खोज कर पूरी कर लेती हैं। फलतः कुन्दन दुबे रेलवे में गार्ड की नौकरी पा जाते हैं। माता के दबाव में ही शादी करने वाले कुन्दन इतने दब्बू रह जाते हैं कि पत्नी शारदा के चित्त से उतरकर केवल उसकी आकांक्षाओं को पूरा करने के उपकरण में बदल जाते हैं। उन्हें पत्नी का सहज प्यार-दुलार भी नसीब नहीं होता। विष्णुप्रिया जैसी अड़ियल सास और चारों ननदों की गिरफ्त में रहकर, नाना तरह की यंत्रणाएँ, ताने और उपेक्षाएँ सहकर शारदा निर्मम होती जाती है जो कुन्दन जैसे दब्बू व्यक्ति के लिए घातक होता है। एक समय तक माँ के कहे पर चलनेवाले कुन्दन अब शारदा के हुक्म के गुलाम होते हैं। शुरू में बहनों की शादी में उत्साह दिखाते कुन्दन बाद में छुट्टी न मिलने का बहाना कर आने से भी इन्कार कर देते हैं। पत्नी शारदा के घर के सपने को पूरा करने में होम होते कुन्दन मधुमेह की भयावह होती बीमारी की परवाह नहीं करते, दिन-दिन भर चाय पीकर काम करते रहते हैं। इस तरह कई दूसरी बीमारियों को पालकर वे उपरी कमाई पर भी ध्यान देने लगते हैं। एक तरफ पूजा-पाठ, कर्मकांड तथा दूसरी तरफ हराम की कमाई से प्रेम, कुन्दन के व्यक्तित्व के वे पक्ष हैं जो मध्यवर्गीय या ये कहें निम्न मध्यवर्गीय चरित्र के अन्तर्विरोधों का खुलासा करते हैं। 

यह अन्तर्विरोध विष्णुप्रिया में तो है ही, उनकी चारों बेटियों- रागिनी, रमोली, रजनी और रानी में भी है । बेटियों के पतियों- गणेश, अश्विन, प्रवीण आदि में भी यह अन्तर्विरोध कम नहीं है। उपन्यास में तीन पीढ़ियों की कथा में समाज की क्रमशः बढ़ती अकांक्षाओं और बन रहे अर्थतंत्र में उसके विन्यास को बारीकी से दिखाने की चेष्टा है। यह समाज मध्यवर्ग का दिखता है, पर है निम्न मध्यवर्गीय, जिसमें मध्यवर्गीय जीवन का मिथ्याचार, झूठ, दिखावा और अहं का घालमेल है। कथित सवर्ण और उसमें भी ब्राह्मण श्रेष्ठता का दंभ अनावश्यक रूप से इतना हावी है कि समाज से अलग-अलग रहने में ही ' कुल की मरजाद' सुरक्षित रह पाती है । यह मर्यादाबोध विष्णुप्रिया तक बहुत गहरा है जो बाद में क्षीण होता है। लगातार अकेले होते हुए कुन्दन को पूरे जीवन में किसी का साथ मिलता है, तो वे होते हैं- उपन्यास का वाचक (मित्र) और चक्रवर्ती दा; जो रेलवे में अधिकारी होने के साथ मजदूर संघ के नेता भी हैं। वे बेलौस हैं पर तार्किक हैं। कह सकते हैं कि चक्रवर्ती दा ही उपन्यासकार के आधुनिक विचारों के वाहक हैं। वे यथास्थितिवाद पर चोट करते हैं, नियतिवाद को भला-बुरा कहते हैं और वस्तुवादी समय को आड़े हाथों लेते हुए कहते हैं-
'...दुनिया ही विचित्र होती जा रहा है। हमारी सामुदायिक जीवन शैली, हमारा रहन-सहन, खान-पान, हमारी स्थानीय अस्मिता….आज सब पर भारी संकट गहरा रहा है। हर आदमी दिनोंदिन इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का इस्तेमाल कर अकेला होता जा रहा है।'

यह वक्तव्य कुन्दन दुबे द्वारा नया स्मार्टफोन फोन लेने पर चक्रवर्ती दा ने दिया था। इक्कीसवीं सदी की आमद के साथ मोबाइल और कम्प्यूटर से लकदक संस्कृति को लक्ष्य कर कथाकार ने सामाजिक विरूपता के विरोधाभासों को गहराई से देखा है। पूंजीवाद के साथ आये बाज़ारवाद और मुक्त अर्थ-व्यवस्था के इस नये दौर में आधुनिक न हो पाने की लाचारी से जूझ रहे देश में समाज की अधोगति का चित्र बेहद जीवंत है। कुन्दन दुबे जैसा पारंपरिक रूढ़ियों में जीने वाला व्यक्ति भी भले ही अपनी देह को कुपोषण के हवाले कर दें, पर कथित विकास की आँधी में बह जाने को सहज तैयार हैं।

पहले बहनों की शादी के लिए गर्क़ हुए कुन्दन दुबे, बाद में पत्नी शारदा के सपनों में खप जाते हैं और अवकाश प्राप्ति के बाद उनका जीवन नारकीय यंत्रणा में बदल जाता है। तीन पीढ़ियों की कथा में सामाजिक ताने-बाने का प्रवाह क्रमशः जिस दिशा में जाता है, उसमें हम एक सभ्यता के छीजते जाने को देख सकते हैं। कुन्दन उन असंख्य महत्वाकांक्षी और उत्पीड़ित जनों के प्रतिनिधि बन जाते हैं जिनका अपना कोई जीवन नहीं होता। पहले माँ और बहनों की चाकरी में गर्क़ हुए कुन्दन बाद में जिस तरह अपने निजी परिवार की भेंट चढ़ते हैं और एक पैसा कमाऊ यंत्र रह जाते हैं, वह हमारी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था की भयावह त्रासदी रही है। समय बदलने के साथ भी यह त्रासदी नहीं बदल पाई क्योंकि परिवार में ही शोषक नये-नये रूपों में आते गए जो कभी सोचने का अवसर तक नहीं देते। 
 कभी इधर तो कभी उधर के थपेड़ों से आहत कुन्दन अंत में अकेले होते हैं। माँ और बहनों से विदा लेकर   ( यद्यपि कि छोटी बहन रानी ससुराल छोड़ उनके घर पर ही रहती है) भी वे अब पत्नी और बच्चों के लिए शोषण का शिकार होते हैं जिसमें कौशल नामक उनका लम्पट पुत्र बहुधा उन्हें मारता-पिटता है और अभद्रता की हदें पार कर देता है। कमल विदेश जा विराजता है, किशोर कुंदन का साथ देता है,पर नौकरी उसकी भी लाचारी है। साथ रहता है कौशल;जो आज के उन अराजक युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है जो अभिभावकों से अभद्रता से प्रस्तुत होकर मनचाही जरूरतें पूरी करते हैं और कोई काम-वाम नहीं करना चाहते। 
गौर से देखें तो ' घर बदर'  लगभग चालीस-पचास वर्षों की हमारी सामाजिक- सांस्कृतिक अवनति का वृत्तांत है। इसमें स्पष्ट दिखता है कि अलग-अलग पीढ़ियों की प्राथमिकताओं के साथ उनके मूल्य भी बदलते गए हैं। यह बदलाव कुन्दन दुबे के जीवन के उत्तरार्द्ध से स्वयं उनमें भी आया है जिसमें वे अपनी सहजता, मुक्तता और सम्बन्धों के प्रति ईमानदारी भी भूल से गये हैं। बाद में यही मूल्य विपर्यय जब उनकी संततियों का स्वाभाविक आचरण बन जाता है तो कुछ बचता नहीं, बस रह जाती है 'घर बदरी', जिसके लिए यह पूरा परिवार अभिशप्त है। अपने कथित मूल्यों के लिए जीते कुन्दन अपनी ही आँखों से कौशल को बर्बाद होता देखते हैं और अपनी यातना भोगते हैं। बाद में बीमार होकर दम तोड़ देते हैं और समूची कमाई परिजनों के उड़ाने के काम आती है। 
यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि 'घर बदर' में आठवें दशक से लेकर इक्कीसवीं सदी के लगभग डेढ़ दशक के पूरे कालखंड को कथात्मक ढांचे में ढालकर प्रस्तुत करने का सफल प्रयत्न है। इस कालखंड के भीतर आनेवाला आपातकाल हो, सामाजिक परिवर्तनके नाम पर चलनेवाली राजनीति हो, राजनैतिक गठजोड़ों की प्रक्रिया का आरंभ हो, आर्थिक उदारीकरण, बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद हो या कथित राष्ट्रवाद हो- उपन्यासकार ने कथा के भीतर इनके परिणामों की भयंकरता को आँका है और एक तरह से गहन सामाजिक-आर्थिक दुष्प्रभावों और परिणतियों को दिखाया है। यह इस उपन्यास का सबसे सुदृढ़ पक्ष है जिसमें हम लेखक की दृष्टि को देख-समझ पाते हैं और जान पाते हैं कि इनका क्रूर यथार्थ किस वीभत्सता के साथ हमारे सभी मूल्यों-मानों को निगलकर देश को बर्बादी के रास्ते पर ले गया है। इन वर्षों में निम्न और मध्यवर्गीय जीवन किस तरह बदला है तथा उनमें क्या-क्या विकृतियाँ आईं हैं, इसे भी उपन्यासकार ने बहुत बारीकी से चित्रित किया है। बाद के दौर यानी आज के समय की युवा पीढ़ी को दो वर्गों में बाँटकर सच ही लेखक ने एक को 'कैरियरिस्ट' तथा दूसरे को 'एनार्किस्ट' के रूप में देखा है जिसमें पहले का प्रतिनिधि कमल और किशोर हैं तो दूसरे का प्रतिनिधि कौशल है। दोनों को ही सिर्फ अपने से मतलब है, भले ही दोनों के रूप भिन्न हैं पर वे अंततः सामाजिक अधिरचना को नष्ट कर परिवारों को अंधकूप में धकेलनेवाले हैं। इसके जिम्मेवार हम स्वयं हैं, जैसे उपन्यास में कुन्दन दुबे और शारदा हैं जिनके सपनों में पल रहे बच्चे उन्हीं के काल बन जाते हैं। इसके साथ-साथ असंवेदनशील और क्रूर व्यवस्था के द्वारा लिए गये आकस्मिक देशव्यापी निर्णयों से बढ़ती बेकारी, सामाजिक विविधता का बिखरता सिराजा और पुलिस, प्रशासन सहित अस्पतालों की मनमानी पर से पर्दा हटाते हुए उपन्यासकार ने जिस तरह कथा के भीतर आई परिस्थितियों को दिखाया है, वह आंदोलित करनेवाला है।


उपन्यास का कथानक 'घर बदरी' पर  आधारित है, पर वह प्रतीकात्मक है। वस्तुतः उपन्यास अपने पूरे विन्यास में देश के ढाँचे के बिखरने और एक बड़े सपने के ध्वस्त होने का मार्मिक आख्यान है। इस आख्यान में एक परिवार की कथा यानी कुन्दन दुबे  के कुनबे की कथा है, पर यह उस निम्नवर्गीय समाज की यातना-कथा है, जो मध्यवर्ग में दाखिल होने की कोशिश करता है और टूट कर बिखर जाता है।  कथा को एक प्रवाह में साधे रखने का वैशिष्ट्य हो या चरित्रों के संयोजन की ईमानदारी हो, मर्मस्थलों की पहचान के असल बिंदु हों या अनेक अंतर्कथाओं में बुने गये आज के समय के बड़े प्रश्न हों; उपन्यासकार ने कहन की अपनी सादा और रोचक किस्सागोई में इस तरह ढाला है कि उपन्यास हमारे वर्तमान जीवन की त्रासद कथा बन जाता है। कह सकते हैं कि 'घर बदर' निम्न मध्यवर्गीय जीवन की यातना और स्वप्नभंग का त्रासद आख्यान है। निश्चय ही पिछले चार-.पांच दशकों में घटित सामाजिक-आर्थिक तंत्र को विश्लेषित करने वाला यह उपन्यास इधर आए उपन्यासों में महत्वपूर्ण है।

'घर बदर' (उपन्यास)- संतोष दीक्षित
सेतु प्रकाशन प्रा. लि., 305 प्रियदर्शिनी अपार्टमेंट पटपड़गंज, 
दिल्ली-110092, 
मूल्य- ₹ 250

आलोचक-ज्योतिष जोशी  
ईमेल- jyotishjoshi@gmail.com
सम्पर्क-
डी -4/37, सेक्टर 15
रोहिणी, दिल्ली 110089


फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की अधिकृत जीवनी: प्रीति चौधरी (समालोचन वेबपोर्टल से साभार)

 ‘वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था

वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है’ 

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ सरकारों की तानाशाही के ख़िलाफ़  अब प्रतीक बन चुके हैंजहाँ-जहाँ भी ज़ुल्म व सितम होते हैं उनकी कविताएँ पोस्टर और नारों की शक्ल में लहराने लगती हैं. 

‘हम देखेंगे

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे’ 

उनके जीवन के प्रति जिज्ञासा का भाव स्वाभाविक है. उनके नाती अली मदीह हाशमी ने उनकी जीवनी अंग्रेजी में लिखी है जिसका हिंदी अनुवाद सेतु प्रकाशन से आया है. इसे फ़ैज़ की अधिकृत जीवनी कहा जा रहा  है. 


प्रीति चौधरी ने इस क़िताब के बहाने फ़ैज़ की शायरीजीवन और उस समय के राजनीतिक घटनाक्रम को टटोला है.

प्रस्तुत है.  








फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की अधिकृत जीवनी 


2021 में हिंदी में आयी ‘प्रेम और क्रांति: फैज अहमद फ़ैज़: अधिकृत जीवनी‘ जो मूल रूप से अंग्रेज़ी में 2016 में उनके नाती अली मदीह हाशमी द्वारा ‘Love and Revolution : Faiz Ahmad Faiz : The Authorized Biography’ नाम से लिखी गयी थी का हिंदी अनुवाद अशोक कुमार जैसे समर्थ अनुवादक ने किया है और सेतु प्रकाशन ने इसे प्रकाशित किया है.

लाहौर में रहने वाले अली मदीह हाशमी जो फ़ैज़ के नाती हैं और पेशे से मनोचिकित्सक हैं ने इसे फ़ैज़ की अधिकृत जीवनी कहा है. फ़ैज़ की शायरी को पसंद करने वालों के लिए यह किताब एक बेहतरीन दस्तावेज की तरह है जिसमें उनकी ज़िंदगी के अलावा उनकी रचना प्रक्रिया पर भी महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है. फ़ैज़ के फ़ैज़ बनने की कहानी को कहने के लिए उनके नाती ने कड़ी मेहनत की है,पर जो सबसे ज़रूरी काम उन्होंने किया है वो है खुद को नाना-नाती के रिश्ते से दूर खड़ा कर एक महान शायर और उसके समय को समझने की उनकी ईमानदार कोशिश.

इधर पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया ने असहमति की आवाज़ के अधिकार के रूप में फ़ैज़ की नज़्मों को नये सिरे से लोगों के बीच ला दिया है. लेखक को लगता है कि आज फ़ैज़ जिस तरह राजनीतिक रैलियों और आंदोलनों में इस्तेमाल हो रहे हैं उसने फ़ैज़ की शायरी को नयी ज़िंदगी तो ज़रूर दी है पर वे जिस तरह विज्ञापनोंस्कूली किताबों और रैलियों में इस्तेमाल हो रहे हैं उससे उनके गहरे राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ नज़रअंदाज़ होते हैं. ये कुछ ऐसा ही है जैसे क्यूबा की क्रांति के सूत्रधार और महान क्रांतिकारी चे गुएवारा की तस्वीरों वाले टीशर्ट और मग बड़े-बड़े माल में रखे दिख जाते हैं जहाँ वे अपने संदर्भ से पूरी तरह काट एक उत्पाद के रूप में इस्तेमाल किये जाते हैं.

फ़ैज़ जो ताउम्र अपने ढंग से एक इंसाफ़पसंद समाज को बनाने के लिए कलम से लड़ते रहेमज़दूरोंकिसानोंअल्पसंख्यकों,महिलाओं और शोषित वर्ग के साथ खड़े रहे,जिस अफ्रीकी एशियाई लेखक संघ के माध्यम से वे तीसरी दुनिया में समता और मानवीय गरिमा को स्थापित करने के लिए लगातार जद्दोजहद करते रहे वो समय और संदर्भ अब जब पूरी तरह बदल गये हैं .फ़ैज़ के सफर को समझने का मतलब ना सिर्फ़ दक्षिण एशियाई राजनीति के तत्कालीन संदर्भों को समझना है बल्कि ये भी जानना है कि दक्षिण एशिया में समाजवादी मानवतावाद का चेहरा कैसा था.

नया-नया आज़ाद हुआ पाकिस्तान किस तरह अपने शुरुआती दिनों में ही नये राष्ट्र-राज्य निर्माण की किसी ठोस परियोजना के बिना दिशा भ्रम का शिकार हो फ़ौजी हुकूमत की गिरफ़्त में आ अमरीकापरस्त हो जाता है और यह बात फ़ैज़ जैसी विचारधारा वालों के लिए किस कदर तकलीफ़देह साबित होती है इस बात की तस्दीक़ ये किताब स्पष्ट रूप से करती है. वामपंथी विचारधारा की तरफ झुके फ़ैज़ के लिए आदर्श निश्चित रूप से सोवियत संघ की साम्यवादी व्यवस्था थी जिसकी राजधानी मास्को में उन्होंने ठीक ठाक समय बिताया था.

मास्को प्रवास का उनके ऊपर ताउम्र एक गहरा असर रहा. वे सोवियत संघ और चीन की उस व्यवस्था के कायल थे जिसने अपनी आम जनता के जीवन स्तर को ऊँचा उठाने में कामयाबी हासिल थी. किताब में इस बात का ज़िक्र है कि कैसे वे मध्य एशियाई देश तजाकिस्तान की यात्रा में अपने दुशानबे प्रवास के दौरान हुए अनुभव का उल्लेख बहुत ख़ुशी-ख़ुशी करते हैं खासकर जब वहाँ उन्हें यह पता लगा कि कुछ सालों पहले तक वहाँ सिर्फ़ जंगल और झाड़ थे जहाँ लोग लोमड़ियों के शिकार के लिए आते थे और वहाँ आने वाली सारी सूचनाओं और तालीम के स्रोत वहाँ की मस्जिद के मुल्ला ही थे. फ़ैज़ इस बात से बहुत प्रभावित थे कि कैसे इस पिछड़े इलाक़े में सोवियत संघ ने अस्पतालों और स्कूलों के जाल बिछा दिए हैं. फ़ैज़ दुशानबे में रूदाकी समारोह में शिरकत करने गये थे जिन्हें फारसी साहित्य का बहुत बड़ा दिग्गज माना जाता है. दुशानबे में रूदाकी समारोह के उपलक्ष्य में रूदाकी पर किताबों और पत्रों की प्रदर्शनी लगी हुई थी जिसमें भारतीय विद्वान मौलाना शिबली नोमानी की किताब शायर-उल-अजाम (फारसी शायरी का इतिहास) को बहुत सम्मानित जगह मिली थी.

एक पाठक के रूप में दुशानबे के ज़िक्र ने मुझे दो कारणों से प्रभावित किया. एक तो वहाँ मंचित नाटक और दूसरा मौलाना शिबली नोमानी. मेरी ससुराल आज़मगढ़ है जिसका मौलाना शिबली नोमानी से गहरा रिश्ता है. फ़ैज़ ने रूदाकी के जीवन पर आधारित जिस नाटक को देखा उसके कुछ दृश्य और संवाद सीधे उनके सीने में उतर गये. मैंने नाटक देखा नहीं बस उस संवाद को पढ़ा भर है और एक अजीब सा दर्दनाक पर बेहद मानीखेज असर मुझसपर भी तारी हो गया है.

नाटक के दृश्य में बादशाह के हुक्म पर जब रूदाकी की आँखे निकाली जा रही होती हैं रूदाकी चीख पड़ते हैं .... या ख़ुदावे मेरी आँखे निकाल रहे हैंमेरे दिल की आँखों को और खोल देना चाहते हैं.(पृष्ठ 265) मैं यह संवाद सुनकर स्तब्ध हूँ. कवि इतने बेख़ौफ़ भी हुआ करते थे इस धरती पर. डाक्टर अली मदीह हाशमी जो कि उस किताब के लेखक होने के साथ पाकिस्तान के फ़ैज़ फ़ाउंडेशन के ट्रस्टी और फ़ैज़ फ़ाउंडेशन इंक  (अमरीका) के अध्यक्ष भी हैं ने इस बात का हवाला भी दिया है कि फ़ैज़ सोवियत संघ के अंदरूनी हालात पर बहस से अक्सर बचते थे.

सोवियत संघ में बहुत कुछ ऐसा हो रहा था जो समाजवादी सपनों के ख़िलाफ़ था और सोवियत संघ को अपनी अंदरूनी स्थिति की चर्चा कतई पसंद नहीं थीएकाध बार दबी ज़ुबान से फ़ैज़ ने इसको स्वीकार भी किया था. फ़ैज़ एशियाई-अफ्रीकी एकता के जिस बौद्धिक आंदोलन से जुड़े थे वह दरअसल सोवियत संघ की प्रेरणा और अनुदान से बना था. इस संगठन से जुड़े लेखक घोषित तौर पर साम्राज्यवाद और नव उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ थे और अफ्रीका और एशिया की मूल पहचान को बनाये रखने हेतु प्रतिबद्ध थे. इनका मानना था कि तीसरी दुनिया के देशों की अपनी एक अलग समृद्ध और स्वतंत्र साहित्यिक परंपरा है जिसे हर हाल में बचाने की कोशिश होनी चाहिए.

एशियाअफ़्रीका और लातीन अमरीका के लोगों के संघर्ष और उनकी आज़ादी की आकांक्षा वाले साहित्य को पश्चिम में कोई जगह नहीं मिलती तो क्यों न अफ्रीकी एशियाई लेखक संघ अपने लिए कोई साझा मंच बनाये. इसी मक़सद के मद्देनज़र संगठन ने अपनी अंतरराष्ट्रीय पत्रिका शुरू की थी  लोटस’ जिसका मुख्यालय पहले मिस्र के काहिरा में था और इसके मुख्य संपादक मिस्र के लेखक एवं पत्रकार यूसुफ़ अल सिबाई थे जो आगे चलकर मिस्र के संस्कृति मंत्री भी बनेबाद में जिनकी हत्या हो गयी. सिबाई के बाद लोटस के संपादन की ज़िम्मेदारी फ़ैज़ के कंधों पर आ गयी. फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की अधिकृत जीवनी का दावा करने वाली इस किताब में इस बात की ओर भी ध्यान खींचा गया है कि बाद के दिनों में सोवियत संघ की नौकरशाही को ‘लोटस‘ से दिक़्क़त होने लगी थीउन्हें लगता था कि सोवियत पैसे से चलने वाली पत्रिका को सोवियत संघ के प्रचारक की तरह निकलना चाहिए ना कि किसी अपने आज़ाद तेवर के साथ. ज़ाहिर है फ़ैज़ का टकराव मास्को की नौकरशाही से भी होना ही था. वैसे भी फ़ैज़लोटस के संपादन की व्यस्तता के चलते अपनी रचनात्मकता से अच्छे खासे दूर हो गये थे क्योंकि संपादन का काम श्रम और समय पूरा ले लेता था और फ़ैज़ के पास कोई सहायक नहीं था. फ़ैज़ का कहना था कि कई बार तीसरी दुनिया के विभिन्न देशों से आयी रचनाएं इतनी कमजोर होती थीं कि उनके छापने लायक बनाने के लिए बहुत मशक़्क़त करनी पड़ती थी.

फ़ैज़ जैसे महान शायर और अंतरराष्ट्रीय शख़्सियत के बारे में जानने की दिलचस्पी बहुत स्वाभाविक है और ये भी सच है कि उनके बारे में लिखा भी खूब गया है. जो शायर फ़ैज़ को नहीं भी जानते हैं उन्होंने भी उनकी लिखी नज़्मों और ग़ज़लों को तमाम नामचीन गायकों और गायिकाओं से सुना और गुनगुनाया है. फ़ैज़ को चाहने वाले भारत में ज़्यादा हैं या पाकिस्तान में,कहना मुश्किल है पर इतना ज़रूर है कि फ़ैज़ जब भी भारत आये यहाँ मिली इज़्ज़त और मोहब्बत से भावविभोर हुए. ये अलग बात है कि पाकिस्तान में फ़ैज़ पर तमाम तरह के आरोप लगाये जाते रहेजिनमें से कई ऐसे रहे जिनका ज़िक्र भी फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ नहीं करना चाहते थे. रावलपिंडी षड्यंत्र केस ऐसा ही मामला था जिसकी वजह से फ़ैज़ को लगभग पाँच साल कैद में बिताने पड़े. ये सच था कि फ़ैज़ पाकिस्तान सरकार से निराश थे और उसकी जनता से दूरी को सख़्त नापसंद करते थे पर वे तख्तापलट की किसी भी योजना के ख़िलाफ़ थेइसीलिए गिरफ़्तारी के बाद भी उन्हें पूरा यक़ीन था कि वे निर्दोष साबित होंगे.

दरअसल पाकिस्तान में यह तानाशाही के लंबे दौर की शुरुआत थी जिसमें वामपंथी झुकाव के लोगों को फ़ौजी सरकार ढूँढ ढूँढ कर यातनाएँ दे रही थी. जबकि यदि पाकिस्तान के वामपंथी आंदोलन की बात करें तो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की दिक़्क़त बिलकुल अलग थी. बँटवारे के बात वो सारे नेता जो मज़दूरों और किसानों के बीच काम कर रहे थे और जिनके पास संगठन चलाने का अनुभव व क्षमता थी वे अधिकतर हिंदू थे और भारत आ गये थे. फ़ैज़ को किसानों और मज़दूरों से सच्ची सहानुभूति ज़रूर थी पर नारे लगाने जुलूस आदि आयोजित करने के लिए जैसे नेतृत्व की आवश्यकता थी वो उनमें कम थी. हाँ उन्हें छात्रों किसानों और मज़दूरों के बीच भाषण देना बहुत पसंद था. शायद यही वजह है कि कालेजों,मज़दूर संगठनों से आये निमंत्रणों को वे तुरंत स्वीकार कर लेते थे.

भारत के बँटवारे से पहले दिल्ली के नगर निगम में आयोजित एक सम्मेलन में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की अनूठी शिरकत को जिसमें वे फ़ौजी वर्दी में नज़र आते हैं यादगार व ऐतिहासिक माना जाता है. इस सम्मेलन में फ़ैज़ ने प्रगतिशील लेखक संघ पर लगाये गये आरोपों का बहुत संयत और तार्किक ढंग से जवाब दिया था. किताब के हवाले से कहें तो कामरेड सज्जाद जहीर ने फ़ैज़ की वर्दी को लेकर टोका भी था जिस पर फ़ैज़ ने उन्हें इत्मीनान रखने को बोला. बताते चलें कि फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने फ़ौजी वर्दी इसलिए पहन रखी थी क्योंकि वे दूसरे विश्व युद्ध में फासीवादी ताकतों के ख़िलाफ़ ब्रिटिश सरकार की तरफ से रेडियो की नौकरी कर रहे थे. शुरूवाती हिचकजिसमें तमाम लोगों की तरह फ़ैज़ को भी लग रहा था कि वे लोग खुद जब अपने मुल्क की आज़ादी के लिए ब्रिटिश हुकूमत से लड़ रहे हैं तब ब्रिटेन ने भारतीय उपमहाद्वीप की जनता की इच्छा के बिना उसे युद्ध में धकेल दिया है तो इन लोगों को अंग्रेज़ी सरकार का साथ क्यों देना चाहिए. पर जब फ़ैज़ को लगता है कि धुरी राष्ट्रों के ख़िलाफ़ मित्र राष्ट्रों का साथ देना ज़रूरी है तो एक बार मन बना लेने के बाद वे अपना काम पूरी मुस्तैदी से करते हैं और तुरंत प्रमोशन भी पा जाते हैं. यहाँ ज़रूरी ये जानना है कि फ़ैज़ युद्ध के ख़त्म होते ही अपेक्षाकृत बहुत कम तनख़्वाह पर शिक्षक की नौकरी ले फ़ौज की अच्छी तनख़्वाह वाली नौकरी छोड़ देते हैं. 412 पन्नों की किताब में यूं तो कई बातें बेहद दिलचस्प हैं पर कुछ जगहों पर सच में रोमांच हो जाता है.



1 
पहला है फ़ैज़ की रचना प्रक्रिया का ज़िक्र और दूसरा फ़ैज़ का बेरूत प्रवास.पाकिस्तान यूँ तो अयूब खान और याह्या खान के फ़ौजी शासन को झेल चुका था पर जनरल ज़िया उल हक़ की फ़ौजी हुकूमत ने जुल्मतों के नये दौर की शुरुआत की थी. सरकारी धार्मिक कट्टरपंथी ने पाकिस्तान के आम आवाम को घुटन व दमन की घेराबंदी में कैद कर दिया था. सड़क पर फांसी व पत्थर से सजाये मौत ने पाकिस्तान को मध्यपूर्व देशों की कट्टरता के क़रीब पहुँचा दिया था. अब पाकिस्तान में भी औरतों से मज़हब के नाम पर सिर ढँकने को कहा जाता. कुलमिलाकर पूरा माहौल ही साहित्य,संगीत,कला और बौद्धिकता के ख़िलाफ़ बनाया जाने लगा था. ज़ाहिर है ऐसे माहौल में रहने की दुश्वारियों को झेलना फ़ैज़ के लिए मुमकिन नहीं था. फ़ैज़ ने जिया उल हक़ से पाकिस्तान छोड़ने की इजाज़त मांगी और उन्हें जवाब मिला कि “उन्हें रोका नहीं जायेगा”. फ़ैज़ के लिए लंदन में बसने और रहने कीं गुंजाइश थी पर फ़ैज़ का मन लंदन में नहीं लगता था ख़ासकर वहाँ की भागती ज़िंदगी, बादल और बारिश फ़ैज़ को नहीं सुहाते थे. बावजूद इसके कि एक समय में लंदन उर्दू रचनाधर्मिता के प्रचार प्रसार का केंद्र बन गया था फ़ैज़ का मन वहाँ रमता नहीं था.

वे तीसरी दुनिया से अपने लगाव के कारण यहीं रहना चाहते थे. अपने देश में ना रह पाने की मजबूरी में ही उनकी शायरी में ‘जलावतनी’ की बात बार- बार आती है. एक बार अपने एक इंटरव्यू में देशनिकाले के सवाल पर जिसमें उनकी तुलना दुनिया के प्रसिद्ध कवियों नाज़िम हिकमत और महमूद दरवेश (ये दोनों महान कवि निर्वासिन झेल रहे थे) से की जाती है तो जवाब में फ़ैज़ देशनिकाले की बात को नकार देते हैं और जवाब देते हैं कि जलावतनी का दर्द भले उन सबकी शायरी में एक सा है पर उनका मामला नाज़िम हिकमत और महमूद दरवेश से अलग है.

उन्हें हुकूमत ने कभी नहीं निकाला वे खुद ही अपनी मर्ज़ी से यायावरी कर रहे हैं. वे जब चाहें अपने मुल्क लौट सकते हैं. महमूद दरवेश जैसे फ़िलिस्तीन कवि का वतन था तो कहाँ ? फ़ैज़ कहते हैं कि सिर्फ़ महमूद दरवेश ही नहीं पूरी फ़िलिस्तीनी जनता को उनकी ज़मीन से खदेड़ दिया गया है.(पृष्ठ 363)वैसे इस पन्ने पर छपाई की एक बड़ी गलती हुई है जैसे जान के खतरे की वजह से नाज़िम हिकमत के तुर्की से भागने की बजाय ‘तुर्की भाग गये‘. फ़ैज़ यूं तो पूरी उम्र सफर में रहे, दुनिया की तमाम जगहों को ठिकाना बनाया पर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और उनकी पत्नी एलिस का बेरूत प्रवास हैरतअंगेज़ है.

जब आवा (एशियन अफ्रीकन राइटर्स एसोसिएशन) की पत्रिका लोटस के लिए काहिरा का विकल्प खत्म हो जाने के बाद नये मुख्यालय की बात आयी तो फ़िलिस्तीन मुक्ति संगठन के अध्यक्ष यासीर अराफ़ात ने बेरूत में लोटस के कार्यालय के लिए जगह देने की पेशकश की,जिसे सहर्ष स्वीकार कर लिया गया. लोटस पत्रिका वैसे भी फ़िलिस्तीन मुक्ति संगठन के मक़सद के साथ खड़ी थी और अपने हर अंक में उसके साथ अपनी एका का प्रदर्शन करती थी. यह वो समय था जब भारत भी यासिर अराफ़ात के भरोसेमंद मित्रों में से एक हुआ करता था और इंदिरा गांधी से यासिर अराफ़ात के अच्छे संबंध थे. अबु अम्मार (यासिर अराफ़ात ) से फ़ैज़ को इतना लगाव था कि उन्होंने अपना एक संग्रह ही उनको समर्पित किया है. यासिर अराफ़ात से दोस्ती के चलते फ़ैज़ की जान को बेरूत में खतरा था पर बेरूत में रहते हुए फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और उनकी पत्नी एलिसगोली बंदूक़ और बमबारी के इतने आदी हो गये थे कि यह उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन गया था. बेरूत सीरियाईरान,इराक़,पाकिस्तान ,कुवैत हर जगह के लोगों के लिए शरण्यगाह था और वहाँ सारे निष्कासित लेखक और पत्रकार इकट्ठे हो गये थे. आये दिन होती बमबारी में कौन किस पर हमला कर रहा है जल्दी समझ में नहीं आता.

अली मसीह हाशमी लिखते हैं कि एक बार एक बम ठीक उसी अपार्टमेंट पर गिरा जिसमें फ़ैज़ दंपति रहते थे. बम के झटके से वो सोफ़ा ज़मींदोज़ हो गया जिस पर एलिस अक्सर आराम करती थीं. बाहरी कमरे के बर्बाद होने पर फ़ैज़ पत्नी के साथ बेडरूम में चले गये और थोड़ी ही देर में खर्राटे भरने लगे. लोटस के संपादन के अलावा फ़ैज़ के लिए यह अपने देश की आज़ादी के बाद किसी राजनीतिक संघर्ष में सीधे भागीदारी का मौक़ा था जिसे वह गंवाना नहीं चाहते थे. साहित्यिक और बौद्धिक सरगर्मियाँ तो थीं हीं. यहाँ फ़ैज़ को महमूद दरवेशमू’ईन सीसो और अदनोइस सरीखे बुद्धिजीवियों के क़रीब सुकून हासिल होता था. पर जल्दी ही फ़ैज़ इज़राइल सरकार के निशाने पर आ गये और खुद पीएलओ  फ़िलिस्तीन मुक्ति संगठन) ने खतरा बढ़ जाने की बात करते हुए उनको लंबे समय तक सुरक्षा मुहैया कराने में असमर्थता जताई. .फ़ैज़ जाने के पक्ष में नहीं थे पर अंततः उन्हें सबकी सलाह के मद्देनज़र बेरूत छोड़ना पड़ा. यह उनके लिए दोस्तों को बीच मुसीबत छोड़ने जैसा था.



2

 फ़ैज़ अमूमन अपनी आलोचना और आरोपों पर कोई सफ़ाई पेश नहीं करते थे. उनका मानना था कि ऐसा करने से रचनात्मक ऊर्जा जाया होती है और वे ऐसे किसी नकारात्मक काम में शामिल नहीं होना चाहते थे, ये पूछे जाने पर कि वे अपने विरोधियों का जवाब क्यों नहीं देते उनका कहना था कि अगर कुछ लोगों की रोज़ी रोटी उनका विरोध करके चलती है तो उसे चलने देना चाहिए. अली मदीह हाशमी ने दर्ज किया है कि फ़ैज़ विरोधियों से भी बहुत विनम्रता से पेश आते थे और पूरा शिष्टाचार निभाते थे. उनके व्यक्तित्व की सहजता से अधिकांश लोग प्रभावित होते क्योंकि समाज में ये यक़ीन फैला था कि बड़े शायर बहुत मूडी होते हैं और फ़ैज़ जैसे बड़े कद का शायर जब डिनर पर आमंत्रित हो और फ़रमाइश पर ‘अच्छा कुछ सोचता हूँ’ कह कुछ सुना दे तो ये उनके व्यक्तित्व की सरलता के साथ ही वास्तविक महानता को भी साबित करता है. फ़ैज़ की तुलना जब ग़ालिब या इक़बाल जैसे शायरों से होती तो वे बहुत असहज हो जाते. अपनी नज़र में वे उन जैसों के सामने कुछ नहीं थे. शायरी के अदब के बड़े बड़े जानकारों का मानना था कि फ़ैज़ का शिल्प बेजोड़ और भाषा पर उनकी पकड़ अनूठी थी. यही वजह थी कि उनके शिल्प की आलोचना शायद ही कोई कर पाता था. फ़ैज़ खुद,रचने को किसी इलहाम का नतीजा ना मान अपनी कड़ी मेहनत का फल मानते थे. कैद में रहने के दौरान फ़ैज़ को वो मौक़ा हासिल हुआ जब वे अपने शायरी पर पूरा ध्यान दे सकें. अरबी फारसी और उर्दू के साथ अंग्रेज़ी का ज्ञान फै़ज को बेजोड़ बनाता था. अरबी और फारसी के ज्ञान ने जहां पुरानी साहित्यिक परंपरा पर उनकी पकड़ मज़बूत की वहीं समाज इतिहास और सभ्यताओं को समझने में उनकी अभिरुचि ने उनकी सोच को गहराई प्रदान की. उनकी गढ़न में उनके उस्तादों ‘सूफी ‘गुलाम मुस्तफ़ा ‘ तब्बसुम’ और डाक्टर मोहम्मद दीन तासीर का भी बड़ा हाथ रहा है. बेहतरीन कालेजों और उम्दा शिक्षकों के सानिध्य ने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को खूब माँजा.

फ़ैज़ ने अपनी विधा में महारत हासिल करने के लिए बड़े शायरों को भी खूब पढ़ा. उनके पहले संग्रह का नाम ही ‘नक्श-ए-फरियादी’ है जो गालिब के दीवान के पहले शेर से लिया है. फ़ैज़ का मानना था कि ग़ालिब की शायरी में इतनी गहराई और तपिश है कि कोई यह दावा नहीं कर सकता कि उसने ग़ालिब को पूरा पढ़ लिया है. अपने एक व्याख्यान में शायरी और शायर की ज़िम्मेदारियों के महत्व पर बोलते हुए फ़ैज़ ने ग़ालिब के बारे में कहा कि- महान कविता और महान कवि की पहचान यह है कि वह अपनी दृष्टि में अपने दौर को कितना समेटता है. उसका दर्द जितना गहरा होगा, उसकी शायरी उतनी बड़ी होगी.(पृष्ठ 137)

खुद फ़ैज़ जो 1947 के पहले मोहब्बत की शायरी में डूबे थे अपने समय की उथल पुथल के बाद अपनी मशहूर नज्म ‘मुझसे पहले सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग’ लिखते हैं. ग़ालिब की तरह फ़ैज़ की शायरी भी अपने समय का आईना है. फ़ैज़ अनुभूति की वास्तविकता को शब्दों में इस तरह पिरोते हैं कि साधारण रूपकों के बावजूद उनका नये अंदाज़ में इस्तेमाल भाषा और अनुभव दोनों को ताजगी प्रदान करता है. पेश है एक बानगी-

कल शब तुम्हारी भूली हुई याद दिल में इस तरह भर गयी

जैसे वीराने में खामोशी से उतर आयी हो बहार

जैसे रेगिस्तान की मखमली रेत पर हवाओं ने बना दिये हों

अपने कदमों के निशान

जैसे किसी बीमार को किसी तरह आ जाए सुकून. 

यहाँ ‘वीराना’ और ‘बहार’, ‘रेगिस्तान ‘और ‘हवा ‘,’ बीमारी’ और ‘ सुकून ‘को एक दूसरे के साथ रखने का ढंग देखने लायक है. 

अली मदीह हाशमी द्वारा रचित फ़ैज़ का जीवन चरित उनकी रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए फ़ैज़ पर काम किए हुए विद्वानों को उद्धृत करते हुए बहुत जीवंत हो उठता है और पाठक से रचना में गहरे डूबने की पेशकश करता है. किताब की प्रस्तावना में लेखक ने अपने लिए जो बात कही है कि उन्हें इस किताब को लिखते हुए फ़ैज़ को भीतर और बाहर से जानने का मौक़ा मिला ये बात हम जैसे पाठकों के लिए भी मुफ़ीद साबित होती है. इस किताब को पढ़ते समय सच में ऐसा महसूस होता है कि फ़ैज़ आपसे मुख़ातिब हैं.

किताब फ़ैज़ के बारे में बहुत सारे रोचक तथ्यों का भी खुलासा करती है मसलन फ़ैज़ की इकलौती अंग्रेज़ी कविता ‘द यूनिकॉर्न एंड द डांसिग गर्ल’ का ज़िक्र .

And the wheel

was fate

And the yoke was ‘karma’

And fear and want and pain

And withering of age

And death with its mercy

And the tyrant with no mercy in his heart. 

यह कविता शायद सिंधु सभ्यता से प्राप्त पुरातात्विक अवशेषों से प्रेरित है जिसके गहरे दार्शनिक मायने हैं जो आगे चलकर वर्तमान के सामयिक संदर्भों से जुड़ अपने अर्थ में पूरी खुलती है . यह कविता नये नये आज़ाद हुए अफ़्रीकी और एशियाई देशों को संबोधित है. फ़ैज़ पर लिखी इस किताब में तमाम गंभीर बातों के अलावा कुछ हल्के फुल्के प्रसंग भी आते हैं जो गुदगुदाते हैं जैसे यह कि फ़ैज़ ने अपना संग्रह जब किसी ‘कुलसूम’ को समर्पित किया तो कैसे सब यार दोस्त और आलोचक उनके जीवन में किसी महिला मित्र की मौजूदगी के कयास लगाने लगे और फ़ैज़ ने बग़ैर कोई सफ़ाई दिए हुए सबको ये कयास लगाने दिया और खूब मजे लिए .हक़ीक़त ये थी कि ‘कुलसूम‘ फ़ैज़ की पत्नी एलिस का ही बदला नाम था जो विवाह के बाद फ़ैज़ की माँ ने एलिस को दिया था.

(परिवार के साथ फ़ैज़)


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फ़ैज़ का मानना था कि कुलसूम की हक़ीक़त को सामने ला वे दोस्तों को निराश नहीं करना चाहते थे जो शायर की प्रेरणा किसी प्रेमिका में ढूँढना चाहते थे. वैसे फ़ैज़ के जीवन में महिलाओं की कोई कमी नहीं थीउनके जानने वाले ये खूब समझते थे कि फ़ैज़ को महिलाओं की सोहबत और शराब दोनों ही बहुत पसंद थे. शराब में भी उन्हें स्काच खासतौर पर पसंद थी जिसको लेकर दोस्त चुटकियाँ लेते थे कि सियालकोट के स्काच मिशन कालेज में पढ़ने के कारण फ़ैज़ को स्काच की लत लग गयी थी. रही महिलाओं की सोहबत वाली बात तो यह दोतरफा मामला था. फ़ैज़ की शख़्सियत में ही कुछ ऐसा था कि उनके संपर्क में आने वाली महिलाएँ अक्सर उन्हें मानने लगतीं थीं. शायद फ़ैज़ की शराफ़त और औरतों को दिल से इज़्ज़त देने वाली आदत उन्हें औरतों के लिए भरोसेमंद साबित करती थी. उनकी कई महिला मित्र उनके बहुत करीब भी रहीं और उनकी ज़िंदगी को प्रभावित भी किया. उनकी मोहब्बतों का उनकी पत्नी एलिस क्या बुरा नहीं मानतीं थीं या इन सबका उन पर क्या असर पड़ा इस सवाल की बाबत फ़ैज़ का जवाब था कि एलिस उनकी पत्नी ही नहीं दोस्त भी थीं जिनके साथ उनकी गहरी साझेदारी थी.

फ़ैज़ के जीवन में उनकी रूसी अनुवादक लुडमिला वासिलएवाजेहरा निगारमरियम बिलग्रामी ,फरीदा खानम समेत डा. शौकत हारून जैसी महिला दोस्तों की अहम जगह रही है. शौकत हारून का महज़ 49 की उम्र में जाना फ़ैज़ के लिए निजी क्षति जैसा था. फ़ैज़ ने इस ग़म को तीन मर्सिया- ‘दूर जाकर करीब हो जितने‘, चाँद निकले किसी जानिब तेरी ज़ेबाई का’, और ‘कब तक दिल की खैर मनाये’ में जाहिर किया है ,जिन्हें फ़ैज़ की दोस्त फरीदा खानम ने बहुत ख़ूबसूरती से गाया है. फ़ैज़ की निकटता चाहे जितनी स्त्रियों से रही हो उनके जीवन को संवारने का काम उनकी हमदम और दोस्त एलिस ने ही किया.

फ़ैज़ के जेल में रहते हुए उनके किताब छपवाना हो या परिवार संभालनाएलिस ने बहुत सूझ बूझ और मेहनत से ज़िम्मेदारी उठायी. फ़ैज़ की मुहब्बत में लंदन छोड़ पाकिस्तान की गर्मी झेलना कोई मामूली बात नहीं थी. रईसी में बचपन बताये फ़ैज़ की ज़िंदगी पिता सुल्तान खान के निधन के बाद पूरी तरह बदल गयी थी और उन्हें मुफ़लिसी का सामना करना पड़ा था. अली मदीह फातिमी कहते हैं कि बचपन में महिलाओं से भरे पूरे परिवार में रहने के कारण फ़ैज़ काफी सलीकेमंद और महिलाओं के प्रति संवेदनशील हो गये थे. फूफी,मौसीसौतेली बहनों और कामवालियों सबने फ़ैज़ को ऐसी तहज़ीब दी कि वे कभी गाली या कोई बदज़ुबानी करने से बचे रहे. फ़ैज़ के नाती डाक्टर अली मसीह फातमी लिखते हैं कि एकबार अपनी दोस्त जेहरा निगार के ये पूछने पर कि उन्हें कैसी महिलाएँ पसंद हैं पर फ़ैज़ ने जवाब दिया था कि उन्हें दिलकश और बुद्धिमान महिलाएँ पसंद हैं.

ज़ेहरा निगार ने गौर किया कि फ़ैज़, महिलाओं की ख़ूबसूरती को तरजीह नहीं दे रहे वे दिलकश और बुद्धिमानी के मुरीद हैं. देखा जाय तो फ़ैज़ की महिला मित्रों में अधिकतर बहुत काबिल और बुद्धिमती रही हैं.

अली मसीह फातिमी ने जो की फ़ैज़ की छोटी बेटी मोनीजा हाशमी के बेटे हैं ने अपने बचपन का कोई बहुत ज़्यादा समय फ़ैज़ के साथ नहीं बिताया हैपर परिवार जनों से बात करके और अपनी कुछ स्मृतियों के बूते वे फ़ैज़ को परिवार के बीच खूब खुश रहने वाली शख़्सियत के रूप में याद करते हैं. ये अलग बात है कि लगातार यात्राओं के कारण फ़ैज़ को ये समय कम ही मिल पाता था और उनकी बेटियों सलीमा और मोनीजा को अपने अब्बा की मशहूरियत का अंदाज़ा अपने बचपन से ही हो गया था. किताब की शुरुआत ही फ़ैज़ के इस फ़ानी दुनिया को छोड़ने के दृश्य से होती है. फ़ैज़ की मृत्यु के बाद जिस तरह हज़ारों लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने उनके घर पर इकट्ठे हो गये और फ़ैज़ के जनाज़े में मीलो लंबी लाइन लग गयी इससे उनकी शख़्सियत का अंदाज़ा लगता है वो भी ऐसे समय में जब मोबाइल और इंटरनेट नहीं था और पाकिस्तान के सरकारी चैनल ने उनकी मौत की खबर भी बहुत बाद में प्रसारित की थी.

यह सुखद संयोग है कि जीवन के आख़िरी समय में फ़ैज़ अपने मुल्क में और परिवार के साथ थे. ये फ़ैज़ के जीवन का वो समय था जब उन्हें सिर्फ़ अपने घर की ही नहीं अपने पुश्तैनी गाँव, ददिहाल-ननिहाल समेत अपने बचपन के दोस्तों की भी याद सताने लगी थी और वे उन्हें ढूँढ-ढूँढ कर मिल रहे थे. जीवनीकार अली मदीह हाशमी के अनुसार उन्होंने अपने गाँववालों से अपने लिए एक कमरा भी बनवाने को कहा था जिसका रूख सरसों के खेतों की और हो और जहां वे अपनी बची ज़िंदगी गुज़ार सकें. बकौल अली हाशमी अपनी गाँव यात्रा के दौरान उन्होंने अपने पुश्तैनी गाँव काला कादर में अपने पिता द्वारा बनवायी मस्जिद में गाँव वालों के साथ नमाज़ भी अता की थी. मस्जिद के फाटक पर लगे सफ़ेद संगमरमर के फलक पर फ़ैज़ रचित ‘नात’ खुदा हुआ था. 

ऐ तू के: हस्त हर दिले- महज़ूँ सराए तू

आवुर्द:-अम सराये दिगर अज़ बराए तू

 

ख़्वाजा ब तख़्ते - बंद: ए- तशवीशे- मुल्को- माल

बर ख़ाक रश्के - ख़ुसरवे - दौराँ गदाए तू 

(तू वह हैजिसने हर गमगीन दिल में अपना घर बना लिया है. मैं तेरे लिए एक दूसरी सराय लेकर आया हूँ.यह सत्ताधारी वर्ग सत्ता और माल की चिंता में लिप्त हैलेकिन इस धरती के समकालीन शासक तेरे इस भिक्षु से ईर्ष्या करते हैं. पृष्ठ संख्या 15) 

यहाँ फ़ैज़ एक ऐसी शख़्सियत के रूप में सामने आते हैं जो उनकी प्रचलित कम्युनिस्ट छवि से काफी अलग है और उनके वामपंथी मित्रों को असहज करता है. अपने बेटियों की शादी और परिवार जनों के इंतकाल पर भी फ़ैज़ धार्मिक रीति रिवाजों का पालन करते नज़र आते हैं. बक़ौल जीवनीकार एक बार अपने धर्म के बारे में पूछे जाने पर फ़ैज़ का जवाब था कि उनका वही धर्म है जो मौलाना रूमी का था. फ़ैज़ कभी किसी इस्लामी राज्य के मुरीद नहीं रहे और किसी भी क़िस्म की धार्मिक कट्टरता से उन्हें सख्त चिढ़ रही. उन्हें समाजवादी तरक़्क़ी पसंद व्यवस्थाएँ बेशक लुभाती रहीं. उन्होंने हमेशा ऐसी शासन व्यवस्था की वकालत की जो जनता को गरीबी और जहालत की ज़िंदगी से बाहर निकाले. पाकिस्तान में रावलपिंडी षड्यंत्र केस के बाद कैद में लंबा समय बिताने के बाद ,बाहर आने पर मुल्क के हालात देखते हुए, जिसमें फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को फाँसी की सज़ा मिल जाना कोई बड़ी बात नहीं थी ने फ़ैज़ पर गहरा असर डाला था. क़ैद में रहते हुए फ़ैज़ पहले से ज़्यादा मशहूर हो गये थे और उनकी ख्याति पाकिस्तान के बाहर भी फैल चुकी थी. पाकिस्तान के हालात को देखते हुए फ़ैज़ ने खुद को सक्रिय राजनीति से अलग कर लिया और खुद को कला साहित्य और संस्कृति की दुनिया में रमा लिया और देश दुनिया की यात्राएँ करते रहे. पाकिस्तान के अंदर कई बार ऐसी स्थितियाँ बनीं कि वे लंबे समय तक पाकिस्तान के बाहर समय बिताने को मजबूर हुए.

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पाकिस्तान के पहले निर्वाचित व लोकप्रिय सरकार के मुखिया ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ से देश में बने रहने तथा कला संस्कृति के क्षेत्र में अहम रोल अदा करने की गुज़ारिश की जिसे फ़ैज़ ने सहर्ष स्वीकार किया और पाकिस्तान में कला संस्कृति और साहित्य के संरक्षण व संवर्धन के लिए बुनियादी ढाँचा तैयार किया. पाकिस्तान की त्रासदी ये रही कि वो भारत से अलग होने के बाद जिन सपनों के साथ खड़ा हुआ था वे बहुत जल्द ही चकनाचूर हो गये और मज़बूत राज्य बनने के लिए जिस मज़बूत नींव और शासन व्यवस्था की ज़रूरत पड़ती है वो वहाँ कभी ढंग से आकार ही नहीं ले पायीं. प्रजातांत्रिक संस्थाएँ जिस ढंग से भारतीय शासन व्यवस्था का हिस्सा बनीं और आपातकाल के दो वर्षों को छोड़ दें तो भारतीय जनता जिस तरह अपनी मर्ज़ी से सरकारें चुनती और पलटती रही है पाकिस्तान के लोगों को यह सुख कम ही नसीब हुआ.

ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो भी जिस ‘रोटी कपड़ा और मकान‘ के लोकप्रिय नारे के दम पर सत्ता में आये थे और गरीब जनता की उम्मीदों को जगाया था वह जल्द ही सिर्फ़ चुनाव जीतने का हथकंडा साबित हुआ.

खुद ज़मींदार परिवार से ताल्लुक़ रखने वाले भुट्टो ने सरकार बनने के बाद प्रजातंत्र की बजाय सामन्तवाद की तरफ ही अपना झुकाव दिखाया, पर जिस तरह से भुट्टो की निर्वाचित सरकार को गिरा कर जनरल जिया उल हक़ की फ़ौजी तानाशाही वाली सरकार ने भुट्टो को फाँसी दी थी उसने पाकिस्तान की जनता को सकते और सदमे में डाल दिया था. यह सैन्य शासन का ख़ौफ़ पैदा करने और विरोध की किसी भी आवाज़ को दबाने की शुरुआत थी. इससे पहले पाकिस्तान के विभाजन और पर्वी पाकिस्तान के बांग्लादेश के रूप में एक अलग देश बनने की प्रक्रिया भी पाकिस्तान के जन्म के लिए ज़िम्मेदार द्विराष्ट्र सिंद्धात पर गहरी चोट थी. बांग्लादेश के निर्माण ने साबित कर दिया कि सिर्फ़ धर्म किसी राष्ट्र को एक सूत्र में बांधे रहने का काम नहीं कर सकता. इस्लाम को मानने के बावजूद अलग भाषा और संस्कृति वाले पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने जिन्ना के टू नेशन थ्योरी को ही अप्रासंगिक करार दिया जो राज्य के रूप में पाकिस्तान की करारी हार थी. अपने विशद अध्ययन और समझ के चलते फ़ैज़ पाकिस्तान में भी कई धाराओं जैसे शास्त्रीय व लोक परंपराओं को पहचाने जाने की बात करते हैं. राष्ट्रीयताओं के मसले पर भी वे बलूच,पख़्तून आदि अलग पहचान वाली धाराओं को पहचानते थे.. फ़ैज़ 1965 में भारत के ख़िलाफ़ पाकिस्तान के युद्ध में देशभक्ति की कोई नज़्म लिखे जाने के सरकार के अनुरोध को ठुकरा सरकार की आँख की किरकिरी बन जाते हैं पर फ़ैज़ के कद और उनकी शायरी को देखते हुए सरकार की यह अपेक्षा ही बेमानी लगती है.

फ़ैज़ युद्धों और हिंसा के अंजाम को जानते थे और अपने देश के लिए फ़र्ज़ निभाते हुए मर जाने वाले शहीदों के लिए उन्होंने ‘खाक से उठ खड़े हो मेरे बेटों‘ जैसी शायरी की थी. वैसे भी दाग़ दाग़ उजाला रच चुके शायर ने दक्षिण एशिया के लिए आज़ादी के मायने बहुत पहले समझा दिया था. बँटवारे के समय और कुछ समय बाद तक अंग्रेज़ी में पाकिस्तान टाइम्स, उर्दू में इमरोज और आगे चलकर नाइल-ओ-लहर के संपादक के रूप में काम कर चुके फ़ैज़ ने बहुत जल्द एहसास कर लिया कि पत्रकारिता पाकिस्तान जैसे आज़ाद मुल्क में धंधा बन चुकी है और उनके जैसे लोगों का चलना अब मुश्किल है. यदि उनके सारे संपादकीय लेखों को एक साथ रखकर पढ़ने का मौक़ा मिले तो यह उस दौर की सियासत को समझने में बहुत सहायक होगा.

अली मसीह हाशमी ने फ़ैज़ की अपनी जीवनी को यदि अधिकृत जीवनी कहा है तो इसके पीछे कुछ ठोस वजहें हैं. बेशक फ़ैज़ पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है पर वह सब बिखरा हुआ है. अली मदीह हाशमी ने उन सारी मौजूद सामग्रियों को इकट्ठा कर ना सिर्फ़ बढ़िया होमवर्क किया है बल्कि फ़ैज़ की लिखी चिट्ठीयोंउनके दिए भाषणों उनके दोस्तों और परिचितों से मिल उम्दा शोध करने के बाद ही यह जीवनी हमें नज़र की है. .फ़ैज़ ने बेशक पाकिस्तान की मांग का समर्थन किया था पर जिस इंसाफ़ व तरक़्क़ी पसंद मुल्क का सपना उन्होंने देखा था वह जिन्ना की 1948 में हुई मौत के साथ ही ज़मींदोज़ हो गया और पाकिस्तान एक ऐसी राह पर चल पड़ा जिसने फ़ैज़ जैसे लोगों को गहरी निराशा दी. फ़ैज़ आज यदि पूरी दुनिया में असहमति की आवाज़ के पक्षधर लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत लगते हैं तो यह मुनासिब ही है.

मता-ए-लौह ओ कलम छिन गई तो क्या गम है

के: खूने- दिल में डूबो ली हैं उँगलियाँ मैंने

ज़बाँ पे मुहर लगी है तो क्या के: रख दी है

हर एक हल्का-ए- ज़ंजीर में जबाँ मैंने? 

यह महज़ संयोग नहीं है कि पाकिस्तान के पहले जन्मदिन पर लिखी गयी नज्म’ सुबह-ए-आज़ादी ‘पाकिस्तान से अधिक भारत में लोकप्रिय हुई क्योंकि भारत अपनी सारी परेशानियों के बावजूद एक लोकतांत्रिक देश बना रहा और पाकिस्तान की तुलना में यहाँ वामपंथी आंदोलन ज़्यादा प्रभावी रहा. दिलचस्प बात ये है कि ‘सुबह-ए-आज़ादी’ की आलोचना दक्षिणपंथी व वामपंथी दोनों धड़ों की तरफ से की गयी. जाहिर सी बात है ‘ये दाग़ दाग़ उजाला’ और ‘शबगज़ीदा सहर’ जैसे रूपक गहरी चोट करने के साथ ही गहरी समझ की भी अपेक्षा रखते हैं. आज भी जो लोग मानवीय समता व गरिमा में विश्वास रखते हैं,एक वास्तविक लोकतांत्रिक समाज का सपना देखते हैं और अपने-अपने स्तर पर संघर्ष कर रहे हैं वे जानते हैं कि इंसाफ पसंद समाज बनाने की लड़ाई बहुत लंबी है ....चले चलो कि वो मंजिल अभी नहीं आयी.

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आलोचक-प्रीति चौथरी

ई.मेल-preetychoudhari2009@gmail.com


अशोक वाजपेयी की कविताएँ, विपुला च पृथ्‍वी.......(साभार ओम निश्चल की फेसबुक वॉल से)

  संसार में कितनी तरह की कविताएं लिखी जाती हैं। देश काल परिस् थिति को छूती और कभी कभार उसके पार जाती हुई। कभी दुख कभी सुख कभी आह्लाद कभी विष...