उपन्यास अगर आधुनिक जीवन का महाकाव्य बन सका तो इसीलिए की उसमें वर्तमान के संत्रास को भविष्य की आहट में पहचान सकने की क्षमता देखी गई। यह तब होता है जब उपन्यासकार अपने समय की विरूपताओं से टकराते हुए एक सचेत दृष्टि के साथ भविष्य का खाका हमारे समक्ष रखता है। इसका आशय यह कत्तई नहीं है कि केवल यथार्थ को प्रस्तुत कर देने मात्र से कोई उपन्यासकार अपने कर्तव्य में कृतकार्य हो जाता है। सच तो यह है कि जब तक वह अपने 'विषय' को स्वयं नहीं जीता और बार बार क्षत विक्षत होते हुए जब तक एक स्पष्ट बिंदु तक नहीं पहुंचता, जिसमें हम वर्तमान से भविष्य तक की एक दृश्य रेखा देख सकें, तब तक उसके किए धरे की छाप हम पर नहीं पड़ पाती। इस दृष्टि से हाल ही प्रकाशित सन्तोष दीक्षित का उपन्यास ' घर बदर' ध्यान आकर्षित करता है।
संतोष दीक्षित हिंदी के महत्वपूर्ण कथाकार हैं जिनके अनेक कहानी संग्रह प्रकाशित हैं। 2010 में प्रकाशित उनके चर्चित उपन्यास ' केलिडोस्कोप' के ठीक दस वर्ष बाद ' घर बदर' का छपना कोई संयोग नहीं है, वरन एक रचनाकार के नाते उनके गहन मंथन और आनुभूतिक यात्रा का परिणाम है। यह उपन्यास इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसमें निरन्तर बदलते परिवार और समाज की गहन पड़ताल है तथा एक पराभूत सभ्यता का विमर्श भी। एक परिवार के बहाने सामाजिक परिवर्तन के समानांतर मूल्य विपर्यय को, उसके समग्र अंतर्विरोधों को बारीकी से रखने के कारण निश्चय ही यह उपन्यास गम्भीर बहस की मांग करता है।
' घर बदर ' राम अवतार दुबे तदन्तर दुर्गाशंकर दुबे तथा उनके पुत्र कुंदन दुबे की कथा है जो कमल, किशोर और कौशल नामक उनके तीन पुत्रों तक आती है। घर से विस्थापित तीन पीढ़ियों की कथा में स्थाई घर बनवाने का सपना केंद्र में है। पर इस सपने की जद में एक पूरी सदी को लांघती बढ़ती कथा समाज के बदलते ढंग और ढांचे के साथ हिंदी पट्टी की अधोगति की कहानी भी कहती चलती है। राम अवतार दुबे द्वारा सौंपी गई कुल देवी की प्रतिमा और घर के मरजाद की पुस्तिका सम्भालते कुंदन दुबे माता विष्णुप्रिया की आज्ञा को शिरोधार्य कर जीते हैं। रागिनी, रमोली, रजनी और रानी नामक बहनों की शादी कराते हैं। शर्मिला यानी शारदा को माता की आज्ञा से व्याह कर लाते हैं। इधर उधर की नौकरी से मुक्ति ले रेलवे में मालगाड़ी के गार्ड बनकर जीवन शुरू करते हैं और इस तरह आज्ञाकारिता का भाव क्रमशः तिरोहित होता जाता है और पत्नी शारदा के घर के सपने में खो सा जाता है। घर बनाने की प्रक्रिया में तबाह हो जाते कुंदन दुबे पत्नी से सहज प्यार भी नहीं पा पाते और छोटे बेटे कौशल की नालायकी से आतंकित होकर सेवा निवृत्ति के नरक को भोगते एक दिन लम्बी बीमारी के बाद दम तोड़ देते हैं।
जीवन भर अपने घर की जदोजहद में खप जाने वाले कुंदन मरने के बाद अपनी तस्वीर में भी जीवित नहीं रहते, उनके श्राद्ध वाली तस्वीर को अशुभ मान घरवाले उनके मित्र को देकर उनसे मुक्त हो जाते हैं। घर बिक जाता है। बेटे हिस्सा ले उड़ जाते हैं। पत्नी उनकी पेंशन से स्कूल चलाने लगती हैं और इस तरह दुबे परिवार की सनातनी घर बदरी कायम रहती है।
उपन्यास बदले हुए समय को बारीकी से आंकता है। छीजते मूल्य, दरकती व्यवस्था, सामाजिक छद्म और प्रपंच से भरे नाना सम्बन्धों और समाजों को एक रोचक किसागोई में ढालते श्री दीक्षित ने उपन्यास को जिस तरह बरता है और जिस तरह उसे एक परिवर्तनकामी विमर्श में बदल दिया है, वह सचमुच छूनेवाला है। आज जबकि कथा को महज विमर्श का एक जरिया बनाकर उपन्यास रच डालने की हड़बड़ी दिख रही है, जिसमें न रस है, न रहस्य, न जिज्ञासा है, न घटनात्मक तनाव के मर्म भरे मोड़ ; यह उपन्यास एक सबक की तरह आता है। एक पारिवारिक कथा के बहाने अपने समय से टकराकर मनुष्य की सही जगह की खोज और उसके स्वत्व की निशानदेही करता ' घर बदर ' निश्चय ही हमें एक बड़ी सीख देता है। भाषा, चारित्रिक संयोजन, नाना अंतर्कथाओं से केंद्रीय कथा के संगुम्फन से लेकर उपन्यास में शुरू से अंत तक जिस तनाव का परिपाक हुआ है, वह श्री दीक्षित के कथा कौशल का प्रमाण तो है ही, एक बड़े मानवीय विमर्श के साथ सामाजिक बदलाव का क्रमागत आकलन भी है।
'घर बदर' का ताना-बाना बेहद जटिल है जिसे बहुत बारीकी से लेखक ने साधा है । उपन्यास ठीक उसी तरह नाना तरह के चरित्रों से भरा पड़ा है, जैसे हमारे समाज और परिवार की संरचना होती है। रायबरेली से विजातीय लड़की से ब्याह रचाकर भागकर इलाहाबाद आये राम अवतार दुबे हों या पिता दुर्गाशंकर दुबे, सब उसी तरह हैं जैसे कुन्दन दुबे हैं। आशंका, भय और कथित मर्यादा में अपने को सिकोड़ कर जीते जैसे राम अवतार चंदा से आतंकित दिखते हैं, वैसे ही दुर्गाशंकर, विष्णुप्रिया से और कुन्दन शर्मिला उर्फ़ शारदा से । नगरपालिका में वकील रिश्तेदार रामदुलारे दीक्षित की कृपा से पानी पिलाने की नौकरी पाकर जिस तरह दिन काटते हैं, उसी तरह दुर्गाशंकर प्राइवेट नौकरी में रहकर गुजर करते हैं। लकवाग्रस्त होने के बाद नौकरी से निकाल दिए गये दुर्गाशंकर परिवार को संकट में डाल देते हैं। तब विष्णुप्रिया की इंटर पास डिग्री काम आती है और वे अपने दूर के रिश्तेदार की मदद से एक ईसाई अस्पताल में हाउसकीपर के पद पर काम पाकर टूटे-बिखरे घर को पटरी पर लाने का यत्न करती हैं ।
यह विष्णुप्रिया दुनियादारी को बहुत बारीकी से समझती हैं। एक चतुर, अड़ियल, मौकापरस्त और दबंग औरत के रूप में वह उपन्यास के पूर्वार्द्ध तक प्रभावी रहती हैं। उनके व्यक्तित्व से जहाँ घर की चारों लड़कियाँ दबंग बन जाती हैं, वहीं कुन्दन दब्बू और आशंकित व्यक्तित्व ही पा पाते हैं जो घर का बोझ लिए कभी ट्युशन करते हैं तो कभी दाल मिल में कैशियर का काम। अंत में बेटे को सरकारी नौकरी में देखने की प्रतिज्ञा विष्णुप्रिया एक दूर के रिश्तेदार की खोज कर पूरी कर लेती हैं। फलतः कुन्दन दुबे रेलवे में गार्ड की नौकरी पा जाते हैं। माता के दबाव में ही शादी करने वाले कुन्दन इतने दब्बू रह जाते हैं कि पत्नी शारदा के चित्त से उतरकर केवल उसकी आकांक्षाओं को पूरा करने के उपकरण में बदल जाते हैं। उन्हें पत्नी का सहज प्यार-दुलार भी नसीब नहीं होता। विष्णुप्रिया जैसी अड़ियल सास और चारों ननदों की गिरफ्त में रहकर, नाना तरह की यंत्रणाएँ, ताने और उपेक्षाएँ सहकर शारदा निर्मम होती जाती है जो कुन्दन जैसे दब्बू व्यक्ति के लिए घातक होता है। एक समय तक माँ के कहे पर चलनेवाले कुन्दन अब शारदा के हुक्म के गुलाम होते हैं। शुरू में बहनों की शादी में उत्साह दिखाते कुन्दन बाद में छुट्टी न मिलने का बहाना कर आने से भी इन्कार कर देते हैं। पत्नी शारदा के घर के सपने को पूरा करने में होम होते कुन्दन मधुमेह की भयावह होती बीमारी की परवाह नहीं करते, दिन-दिन भर चाय पीकर काम करते रहते हैं। इस तरह कई दूसरी बीमारियों को पालकर वे उपरी कमाई पर भी ध्यान देने लगते हैं। एक तरफ पूजा-पाठ, कर्मकांड तथा दूसरी तरफ हराम की कमाई से प्रेम, कुन्दन के व्यक्तित्व के वे पक्ष हैं जो मध्यवर्गीय या ये कहें निम्न मध्यवर्गीय चरित्र के अन्तर्विरोधों का खुलासा करते हैं।
यह अन्तर्विरोध विष्णुप्रिया में तो है ही, उनकी चारों बेटियों- रागिनी, रमोली, रजनी और रानी में भी है । बेटियों के पतियों- गणेश, अश्विन, प्रवीण आदि में भी यह अन्तर्विरोध कम नहीं है। उपन्यास में तीन पीढ़ियों की कथा में समाज की क्रमशः बढ़ती अकांक्षाओं और बन रहे अर्थतंत्र में उसके विन्यास को बारीकी से दिखाने की चेष्टा है। यह समाज मध्यवर्ग का दिखता है, पर है निम्न मध्यवर्गीय, जिसमें मध्यवर्गीय जीवन का मिथ्याचार, झूठ, दिखावा और अहं का घालमेल है। कथित सवर्ण और उसमें भी ब्राह्मण श्रेष्ठता का दंभ अनावश्यक रूप से इतना हावी है कि समाज से अलग-अलग रहने में ही ' कुल की मरजाद' सुरक्षित रह पाती है । यह मर्यादाबोध विष्णुप्रिया तक बहुत गहरा है जो बाद में क्षीण होता है। लगातार अकेले होते हुए कुन्दन को पूरे जीवन में किसी का साथ मिलता है, तो वे होते हैं- उपन्यास का वाचक (मित्र) और चक्रवर्ती दा; जो रेलवे में अधिकारी होने के साथ मजदूर संघ के नेता भी हैं। वे बेलौस हैं पर तार्किक हैं। कह सकते हैं कि चक्रवर्ती दा ही उपन्यासकार के आधुनिक विचारों के वाहक हैं। वे यथास्थितिवाद पर चोट करते हैं, नियतिवाद को भला-बुरा कहते हैं और वस्तुवादी समय को आड़े हाथों लेते हुए कहते हैं-
'...दुनिया ही विचित्र होती जा रहा है। हमारी सामुदायिक जीवन शैली, हमारा रहन-सहन, खान-पान, हमारी स्थानीय अस्मिता….आज सब पर भारी संकट गहरा रहा है। हर आदमी दिनोंदिन इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का इस्तेमाल कर अकेला होता जा रहा है।'
यह वक्तव्य कुन्दन दुबे द्वारा नया स्मार्टफोन फोन लेने पर चक्रवर्ती दा ने दिया था। इक्कीसवीं सदी की आमद के साथ मोबाइल और कम्प्यूटर से लकदक संस्कृति को लक्ष्य कर कथाकार ने सामाजिक विरूपता के विरोधाभासों को गहराई से देखा है। पूंजीवाद के साथ आये बाज़ारवाद और मुक्त अर्थ-व्यवस्था के इस नये दौर में आधुनिक न हो पाने की लाचारी से जूझ रहे देश में समाज की अधोगति का चित्र बेहद जीवंत है। कुन्दन दुबे जैसा पारंपरिक रूढ़ियों में जीने वाला व्यक्ति भी भले ही अपनी देह को कुपोषण के हवाले कर दें, पर कथित विकास की आँधी में बह जाने को सहज तैयार हैं।
पहले बहनों की शादी के लिए गर्क़ हुए कुन्दन दुबे, बाद में पत्नी शारदा के सपनों में खप जाते हैं और अवकाश प्राप्ति के बाद उनका जीवन नारकीय यंत्रणा में बदल जाता है। तीन पीढ़ियों की कथा में सामाजिक ताने-बाने का प्रवाह क्रमशः जिस दिशा में जाता है, उसमें हम एक सभ्यता के छीजते जाने को देख सकते हैं। कुन्दन उन असंख्य महत्वाकांक्षी और उत्पीड़ित जनों के प्रतिनिधि बन जाते हैं जिनका अपना कोई जीवन नहीं होता। पहले माँ और बहनों की चाकरी में गर्क़ हुए कुन्दन बाद में जिस तरह अपने निजी परिवार की भेंट चढ़ते हैं और एक पैसा कमाऊ यंत्र रह जाते हैं, वह हमारी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था की भयावह त्रासदी रही है। समय बदलने के साथ भी यह त्रासदी नहीं बदल पाई क्योंकि परिवार में ही शोषक नये-नये रूपों में आते गए जो कभी सोचने का अवसर तक नहीं देते।
कभी इधर तो कभी उधर के थपेड़ों से आहत कुन्दन अंत में अकेले होते हैं। माँ और बहनों से विदा लेकर ( यद्यपि कि छोटी बहन रानी ससुराल छोड़ उनके घर पर ही रहती है) भी वे अब पत्नी और बच्चों के लिए शोषण का शिकार होते हैं जिसमें कौशल नामक उनका लम्पट पुत्र बहुधा उन्हें मारता-पिटता है और अभद्रता की हदें पार कर देता है। कमल विदेश जा विराजता है, किशोर कुंदन का साथ देता है,पर नौकरी उसकी भी लाचारी है। साथ रहता है कौशल;जो आज के उन अराजक युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है जो अभिभावकों से अभद्रता से प्रस्तुत होकर मनचाही जरूरतें पूरी करते हैं और कोई काम-वाम नहीं करना चाहते।
गौर से देखें तो ' घर बदर' लगभग चालीस-पचास वर्षों की हमारी सामाजिक- सांस्कृतिक अवनति का वृत्तांत है। इसमें स्पष्ट दिखता है कि अलग-अलग पीढ़ियों की प्राथमिकताओं के साथ उनके मूल्य भी बदलते गए हैं। यह बदलाव कुन्दन दुबे के जीवन के उत्तरार्द्ध से स्वयं उनमें भी आया है जिसमें वे अपनी सहजता, मुक्तता और सम्बन्धों के प्रति ईमानदारी भी भूल से गये हैं। बाद में यही मूल्य विपर्यय जब उनकी संततियों का स्वाभाविक आचरण बन जाता है तो कुछ बचता नहीं, बस रह जाती है 'घर बदरी', जिसके लिए यह पूरा परिवार अभिशप्त है। अपने कथित मूल्यों के लिए जीते कुन्दन अपनी ही आँखों से कौशल को बर्बाद होता देखते हैं और अपनी यातना भोगते हैं। बाद में बीमार होकर दम तोड़ देते हैं और समूची कमाई परिजनों के उड़ाने के काम आती है।
यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि 'घर बदर' में आठवें दशक से लेकर इक्कीसवीं सदी के लगभग डेढ़ दशक के पूरे कालखंड को कथात्मक ढांचे में ढालकर प्रस्तुत करने का सफल प्रयत्न है। इस कालखंड के भीतर आनेवाला आपातकाल हो, सामाजिक परिवर्तनके नाम पर चलनेवाली राजनीति हो, राजनैतिक गठजोड़ों की प्रक्रिया का आरंभ हो, आर्थिक उदारीकरण, बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद हो या कथित राष्ट्रवाद हो- उपन्यासकार ने कथा के भीतर इनके परिणामों की भयंकरता को आँका है और एक तरह से गहन सामाजिक-आर्थिक दुष्प्रभावों और परिणतियों को दिखाया है। यह इस उपन्यास का सबसे सुदृढ़ पक्ष है जिसमें हम लेखक की दृष्टि को देख-समझ पाते हैं और जान पाते हैं कि इनका क्रूर यथार्थ किस वीभत्सता के साथ हमारे सभी मूल्यों-मानों को निगलकर देश को बर्बादी के रास्ते पर ले गया है। इन वर्षों में निम्न और मध्यवर्गीय जीवन किस तरह बदला है तथा उनमें क्या-क्या विकृतियाँ आईं हैं, इसे भी उपन्यासकार ने बहुत बारीकी से चित्रित किया है। बाद के दौर यानी आज के समय की युवा पीढ़ी को दो वर्गों में बाँटकर सच ही लेखक ने एक को 'कैरियरिस्ट' तथा दूसरे को 'एनार्किस्ट' के रूप में देखा है जिसमें पहले का प्रतिनिधि कमल और किशोर हैं तो दूसरे का प्रतिनिधि कौशल है। दोनों को ही सिर्फ अपने से मतलब है, भले ही दोनों के रूप भिन्न हैं पर वे अंततः सामाजिक अधिरचना को नष्ट कर परिवारों को अंधकूप में धकेलनेवाले हैं। इसके जिम्मेवार हम स्वयं हैं, जैसे उपन्यास में कुन्दन दुबे और शारदा हैं जिनके सपनों में पल रहे बच्चे उन्हीं के काल बन जाते हैं। इसके साथ-साथ असंवेदनशील और क्रूर व्यवस्था के द्वारा लिए गये आकस्मिक देशव्यापी निर्णयों से बढ़ती बेकारी, सामाजिक विविधता का बिखरता सिराजा और पुलिस, प्रशासन सहित अस्पतालों की मनमानी पर से पर्दा हटाते हुए उपन्यासकार ने जिस तरह कथा के भीतर आई परिस्थितियों को दिखाया है, वह आंदोलित करनेवाला है।
उपन्यास का कथानक 'घर बदरी' पर आधारित है, पर वह प्रतीकात्मक है। वस्तुतः उपन्यास अपने पूरे विन्यास में देश के ढाँचे के बिखरने और एक बड़े सपने के ध्वस्त होने का मार्मिक आख्यान है। इस आख्यान में एक परिवार की कथा यानी कुन्दन दुबे के कुनबे की कथा है, पर यह उस निम्नवर्गीय समाज की यातना-कथा है, जो मध्यवर्ग में दाखिल होने की कोशिश करता है और टूट कर बिखर जाता है। कथा को एक प्रवाह में साधे रखने का वैशिष्ट्य हो या चरित्रों के संयोजन की ईमानदारी हो, मर्मस्थलों की पहचान के असल बिंदु हों या अनेक अंतर्कथाओं में बुने गये आज के समय के बड़े प्रश्न हों; उपन्यासकार ने कहन की अपनी सादा और रोचक किस्सागोई में इस तरह ढाला है कि उपन्यास हमारे वर्तमान जीवन की त्रासद कथा बन जाता है। कह सकते हैं कि 'घर बदर' निम्न मध्यवर्गीय जीवन की यातना और स्वप्नभंग का त्रासद आख्यान है। निश्चय ही पिछले चार-.पांच दशकों में घटित सामाजिक-आर्थिक तंत्र को विश्लेषित करने वाला यह उपन्यास इधर आए उपन्यासों में महत्वपूर्ण है।
'घर बदर' (उपन्यास)- संतोष दीक्षित
सेतु प्रकाशन प्रा. लि., 305 प्रियदर्शिनी अपार्टमेंट पटपड़गंज,
दिल्ली-110092,
मूल्य- ₹ 250
आलोचक-ज्योतिष जोशी
ईमेल- jyotishjoshi@gmail.com
सम्पर्क-
डी -4/37, सेक्टर 15
रोहिणी, दिल्ली 110089


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