सामाजिक वर्जनाओं की चारदीवारी में घिरी स्त्री के मन की पीडाओं के कारणों की पड़ताल करती कवितायेँ (पुस्तक 'मैंने अपनी माँ को जन्म दिया है' की समीक्षा) आलोचक अशोक कुमार का आभार

“सामाजिक वर्जनाओं की चारदीवारी में घिरी स्त्री के मन की पीडाओं के कारणों की पड़ताल करती कवितायेँ.” इन कविताओं से गुजरते हुए मैंने यह जाना कि स्त्री मन की पीडाओं को महसूस कर पाना संवेदनशील से संवेदनशील पुरुष के भी बस की बात नहीं है. यहाँ सहानूभूति और अनूभूति के बीच यह जो गहरी खाई है उसे हम पुरुष कभी नहीं पाट सकते। यह कवितायेँ जटिल मानवीय संबंधों (जिनसे झूझते हुए सहेजने की कवायद में स्त्री खुद को कहीं खो बैठती है) को सहजता और सरलता से व्यक्त करती हुई आपको संबंधों और संवेदनाओं के एक अबूझ संसार में ले जाती हैं।



यह कवितायेँ दो शहरों के मध्य अपने अस्तित्व को तलाश रही स्त्री के वह शिकायत पत्र हैं जो वह खुद के नाम लिखती है. जिनमे वह लिखती हैं- “मैं दो शहरों के बीच खोजती हूँ/ एक बीत गयी उम्र/ एक ने मुझे नहीं सहेजा/ दुसरे को मैंने नहीं अपनाया/ मैं दोनों की गुनाहगार रही।

एक तरफ यह कवितायेँ स्मृतियों के उदास दस्तावेज हैं तो दूसरी तरफ दुःख के संस्मरण भी। और इस सबके बीच परिस्थितयों के विरुद्ध टिके रहने के साहस की प्रमाण भी।

एक पल कवियत्री कहती हैं-

मेरी यत्न से सवारी गयी देह/ कुटिलता से उघार देती थी हर बार/ आत्मा की सभी नील-खरोंचे

और दूसरे पल कहती हैं-

हम स्मृतियों में लौटते हैं/ क्योंकि लौटने के लिए कहीं कुछ और नहीं / वह सभी जगह जहाँ हम जा सकते थे/ हमारी पहुँच से थोडा आगे बढ़ चुकी हैं

एक और कविता देखिये-

प्रेम में भय है/ या की भय से ही प्रेम/ वह अपने अन्दर के उस शैतान से डरती है/ जिसे सब कुछ चाहिए/ आँख भर नींद/ उम्र भए के सपने/ थोड़ी सी आंच/ और एक मज़बूत गर्म हथेली/ जिसे थामकर दुखों को पिघलता हुआ महसूस किया जा सके।

यहाँ  वह कविताये हैं जहाँ कवियत्री थक जाने के बाद “नींद को मरहम कहती है” यह थकान मात्र दौड़-भाग की नहीं है।

रानू मंडल के बहाने कवियत्री कहती हैं की हमें दुखो को भी याद रखना चाहिए क्योंकि

“दुखों को भूल जाना/ अपनी आत्मा की सबसे मधुर लय को खो देना है।

यह कवितायेँ केवल स्त्रीमन को टटोलती, दुखों को ही दर्ज करती नहीं बल्कि कवियत्री की सामाजिक चेतना को को भी दर्ज़ करती हुई विश्व की सबसे बड़ी चिंताओं और सवालों को मुखरता से स्वर भी देतीं हैं। दुनियाभर में वह विस्थापित जो पहचान के संकट से जूझ रहे हैं उनके लिए लिखती हैं-

एक घर/ एक परिवार/ एक देश/ एक पहचान/ कागजों से बनी इस दुनिया में जी सकने के लिए/ उन्हें दरकार है/ बस एक कागज की।

कवियत्री केवल अपने दुःख ही नहीं लिखती, वह तमाम स्त्रियों के दुखों को साझा समझते हुए “बहनापा” भी रचती हैं।

यह कवितायेँ साहस की उम्दा मिसाल हैं जहाँ कवियत्री लिख सकी है कि-

मां के लिए लिखी गयी हर कविता में/ तुम एक अघोषित खलनायक थे पिता।

और फिर पिता और माँ के उस प्रेम के लिए जिसे कभी शब्दों में नहीं गया उसके लिए लिखती है कि-

हमारे लिए प्रेम हमेशा अव्यक्त ही रहा/ लेकिन हम आज भी जानते हैं यह बात मन ही मन में/ कि जो अव्यक्त है वही सबसे सुन्दर है।

जहां समाज में आज भी स्त्री का तमाम प्रेम, आत्मा की तमाम पवित्रता उसके देह के किसी ख़ास अंग से आंकी जाती रही है वहां तमाम वर्जनाओं को तोड़ते हुए कवियत्री रच रही है-

उसे पत्थरों से पीटा गया/ जंजीरों से जकड़ा गया/ अग्नि से जलाया गया/ सरियों से विक्षित किया गया/ उपभोग के बाद/ वह घृणा की पात्र थी/ स्त्री की मृत देह पर भी/ योनी को उसके होने की सज़ा दी गयी।

स्त्री के लिए बोनसाई जैसे बिम्ब कविताओं में नवीनता लेकर आये है। बिंदी, नदी के माध्यम से कही गयी कवितायेँ प्रचलित बिम्बों के सहारे कहन का नयापन लिए हुए हैं।

इस संग्रह में एक कविता है “पति की प्रेमिका के नाम”। उसका एक अंश पढिये-

मेरे पास था/ एक प्रेम का अतीत/ एक बीत गयी उम्र/ और एक बीतती जा रही देह के साथ/ उसके प्रणय का प्रतीक/ एक और जीवन तुम्हारे पास था/ एक प्रेम का वर्तमान/ यौवन का उन्माद/ देह का समर्पण/ और मेरे लिए एक चुनौती लेकिन अपना भविष्य तो हम दोनों ने/ किसी और को सौप रखा था।

यह होता कि तुमने मेरे अतीत/ और मैने तुम्हारे वर्तमान का साझा दुःख पढ़ा होता/ काश कि हमें दुःखो ने भी बांधा होता।

इन कविताओं में हम खोते चले जाते है. यह कविताएँ गाँव के पुल को तलाश करती हुई पुरखों की उन माफियों को सुनती हैं जो वह अपनी की गयी तमाम गलतियों के लिए मांग रहे है।

यह कविताएँ ईश्वर पर पक्षपाती होने का आरोप लगाने का साहस करती है, सुख की खोज में भटकती हुई तमाम दुःख देखती हैं, पूंजीवाद और बाजारवाद के विरुद्ध न कहने का माद्दा रखती हैं और मौन को कायरता मानने से इनकार करती हैं।

कुल मिलाकर यह संग्रह पढ़ा जाना चाहिए. अगर मेरी पसंद की एक कविता इस संग्रह से चुननी हो तो वह यह होगी-

एक पुरुष ने लिखा दुख

और यह दुनिया भर के वंचितों की आवाज़ बन गया

एक स्त्री ने लिखा दुःख

यह उसका दिया एक उलाहना था


एक पुरुष लिखता है सुख

वहाँ संसार भर की उम्मीद समायी होती है

एक स्त्री ने लिखा सुख

यह उसका निजी प्रलाप था


एक पुरुष ने लिखा प्रेम

रची गई एक नयी परिभाषा

एक स्त्री ने लिखा प्रेम

लोग उसके शयनकक्ष का भूगोल तलाशने लगे


एक पुरुष ने लिखी स्त्रियाँ

ये सब उसके लिए प्रेरणाएं थीं

एक स्त्री ने लिखा पुरुष

वह सीढियाँ बनाती थी


स्त्री ने जब भी कागज़ पर उकेरे कुछ शब्द

वे वहां उसकी देह की ज्यामितियां ख़ोजते रहे

उन्हें स्त्री से कविता नहीं चाहिए थी

वे बस कुछ रंगीन बिम्बों की तलाश में थे


भक्ति काल में मीरा लिख गयीं -


राणाजी म्हाने या बदनामी लगे मीठी।

कोई निन्दो कोई बिन्दो, मैं चलूंगी चाल अपूठी...

1930 में महादेवी के शब्द थे-

विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरा न कभी अपना होना...


1990 में लिखती हैं अनामिका -

हे परमपिताओं,

परमपुरुषों–

बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो!


2018 में यह पंक्तियाँ लिखते

रश्मि भारद्वाज 
मैं आपके लिए तहेदिल से चाहती हूँ

'ग्रो अप

एन्ड मूव ऑन'


और आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए

20 ....लिख कर रिक्त स्थान छोड़ती हूँ

उम्मीद करती हूँ कि अब कोई नयी बात लिखी जाए!

(रश्मि भारद्वाज) 




आलोचक : अशोक कुमार

किताब: “मैंने अपनी मां को जन्म दिया है”

लेखक: रश्मि भारद्वाज

प्रकाशक: सेतु प्रकाशन

मूल्य: 130 रूपए 

विधा: कविता

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