कवि कहो ज्ञानेन्द्रपति कहो बनारस का है- कुमार मंगलम

 




कुमार मंगलम युवा कवि-आलोचक हैं। वरिष्ठ कवि ज्ञानेन्द्रपति के दो संग्रहों- गंगा-तट और गंगा-बीती को आधार बनाकर उन्होंने कवि, बनारस और गंगा के रचनात्मक संबंध को बेहद संजीदा और शोधपरक दृष्टि एवं सधी हुई भाषा में परखा है। 

जहाँ विश्वास और प्रेम जीवित है अभी - 'जीवन हो तुम' पर नीरज कुमार मिश्र की समीक्षा

 




युवा कवि निशांत के कविता संग्रह 'जीवन हो तुम' पर प्रखर युवा आलोचक नीरज कुमार मिश्र की यह समीक्षा प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका आजकल (जनवरी 2021) में प्रकाशित हुई है। 

घर बदर : मध्यवर्गीय जीवन की यातना और बदलते समय में ध्वस्त हुए सपनों का कथालोक - ज्योतिष जोशी







वरिष्ठ कथाकार श्री संतोष दीक्षित का पिछले वर्ष प्रकाशित उपन्यास ' घर बदर ' राम अवतार दुबे तदन्तर दुर्गाशंकर दुबे तथा उनके पौत्र कुंदन दुबे की कथा है जो कमल, किशोर और कौशल नामक उनके तीन पुत्रों तक आती है। घर से विस्थापित तीन पीढ़ियों की कथा में स्थाई घर बनवाने का सपना केंद्र में है। पर इस सपने की जद में एक पूरी सदी को लांघती बढ़ती कथा समाज के बदलते ढंग और ढांचे के साथ हिंदी पट्टी की अधोगति की कहानी भी कहती चलती है।

वे जन्म दे रही हैं हर क्षण एक नयी पृथ्वी : मैंने अपनी माँ को जन्म दिया है पर अरुण होता की समीक्षा





 मैंने अपनी माँ को जन्म दिया है पर वरिष्ठ आलोचक अरुण होता का यह सुचिन्तित आलेख पाखी के दिसंबर -20 अंक में प्रकाशित हुआ है। 

आज से लगभग चार साल पहले रश्मि भारद्वाज का पहला कविता संग्रह ‘एक अतिरिक्त ‘अ’ ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार से पुरस्कृत हुआ था। रश्मि का सद्यतम प्रकाशित दूसरा कविता संग्रह है ‘मैंने अपनी माँ को जन्म दिया है’। इस संग्रह की कविताओं से गुजर कर सबसे पहले जो बिंदु हमारे सामने उभर कर आता है वह है कवयित्री का सोचने का नज़रिया।इस दृष्टिकोण के चलते कवयित्री अपने समकालीनों से भिन्न है।

कविता की संभावना और आलोचना के संकट- प्रियदर्शन



नया पथ- जुलाई/सितंबर अंक में चार युवा कवियों के संग्रह पर सुपरिचित कथाकार-आलोचक प्रियदर्शन की टिप्पणी

कविता पेंटिंग पेड़ कुछ नहीं - सामाजिक सरोकार-संवेदना से जुड़ी कहानियाँ









हंस' के दिसंबर-2020 अंक में कथाकार कैलाश बनवासी  के कहानी संग्रह-' कविता पेंटिंग पेड़ कुछ नहीं' पर लेखक-आलोचक गोविंद सेन की  समीक्षा 

अशोक वाजपेयी की कविताएँ, विपुला च पृथ्‍वी.......(साभार ओम निश्चल की फेसबुक वॉल से)

  संसार में कितनी तरह की कविताएं लिखी जाती हैं। देश काल परिस् थिति को छूती और कभी कभार उसके पार जाती हुई। कभी दुख कभी सुख कभी आह्लाद कभी विष...