किताबों की दुनिया में 'तिमिर में ज्योति जैसे', 'बाकी बचे कुछ लोग' और मैंने अपनी माँ को जन्म दिया है' की संक्षिप्त समीक्षा (साभार रमेश अनुपम की फेसबुक वॉल से)

 किताबों की दुनिया

इस बार कविता की तीन नई किताबें
1. ” तिमिर में ज्योति जैसे”
संपादक: अरुण होता
सेतु प्रकाशन दिल्ली
2. ”बाकी बचे कुछ लोग”
अनिल करमेले
सेतु प्रकाशन दिल्ली
3.” मैंने अपनी माँ को जन्म दिया है”
रश्मि भारद्वाज
सेतु प्रकाशन दिल्ली


तिमिर में ज्योति जैसे



”तिमिर में ज्योति जैसे” अरुण होता द्वारा संपादित कोरोनाकालीन कविताओं का एक महत्वपूर्ण संचयन हैं। इस संचयन में अरुण होता ने हिंदी के 43 कवियों की कविताओं का संचयन किया है जिसमें अशोक वाजपेई,ज्ञानेंद्र पति, राजेश जोशी,कुमार अंबुज,अनामिका लीलाधर मंडलोई, मदन कश्यप, नासिरा शर्मा, राकेश रेणु,ज्योति चावला, बोधिसत्व, हरीश चंद्र पांडेय, श्री प्रकाश शुक्ल, जितेंद्र श्रीवास्तव, संजय कुंदन, आत्म रंजन, अनिल करमेले शंकरानन्द, रश्मि भारद्वाज, पूरी मालव, अनामिका अनु, यतीश कुमार जैसे महत्वपूर्ण कवि सम्मिलित हैं।
कोरोना जैसी वैश्विक महामारी ने जिस तरह से भारत सहित पूरी दुनिया को तबाह किया है, उस आघात से जल्द ही उबर पाना कभी संभव न होगा।
इस व्यापक नरसंहार ने कवियों की संवेदना को भी बेहद आहत किया है। लगभग 263पृष्ठों में फैल हुए इस काव्य संचयन में कोरोना समय में कवियों की आहत हुई संवेदना को ही नहीं ,जीवन पर उनके अगाध विश्वास को भी साफ साफ देखा जा सकता है। निराशा और हताशा के बाद भी जीवन पर विश्वास ही शायद इन कविताओं की सबसे बड़ी शक्ति है।
इस संचयन में अरुण होता द्वारा लिखित भूमिका महामारी में जिजीविषा बनाए रखने वाली कविताएं ” भी पठनीय और उल्लेखनीय है।
'तिमिर में ज्योति' मंगलेश डबराल की स्मृति को समर्पित काव्य संचयन है।

                                                                                                                                
                                                                                                                                   बाकी बचे कुछ लोग



'बाकी बचे कुछ लोग' इधर के उल्लेखनीय कवि अनिल करमेलेे का सद्य प्रकाशित काव्य संग्रह है। अपने पहले काव्य संग्रह " ईश्वर के नाम पर ”से चर्चित कवि अनिल करमेले समकालीनता के दबाव से भरसक बच निकल कर अपने लिए नई अंतर्वस्तुओं का संधान करने वाले ,यथार्थ के अनचीन्हे सुरंगों और तंग गलियों में विचरण का जोखिम उठाने वाले हिंदी के कुछेक कवियों में से हैं।
उनकी कविताएँअक्सर इस चुप्पी भरे समय में तीखे सवाल पूछने का साहस रखने वाली और हमारी ठस्स पड़ी चेतना को कुरेदने वाली हमारे समय की अत्यंत महत्वपूर्ण कविताएं हैं।
इस संग्रह में अनिल करमेले की लगभग 63 कविताएं संकलित हैं। इस संग्रह में संग्रहित एक कविता है ”देवताओं को सोने दो” ।इस कविता में कवि कहते हैं :
" जब बहुत जरूरत थी
मनुष्यों को देवताओं की
वे निद्रा में थे
अपनी आरामगाहों
नुमाइंदे अपने साम्राज्य के
विस्तार के लिए
वोटिंग मशीनो तक
गए को खींच लाये थे
वे बता रहे थे
हमारे सोने की चिड़िया रह चुके
देश में
अब बहुत अच्छा समय
आ गया है”
अनिल करमेले का यह नया काव्य संग्रह अपनी उल्लेखनीय कविताओं के लिए ध्यान खींचने वाला एक महत्वपूर्ण काव्य संग्रह है।इस काव्य संग्रह का हिंदी साहित्य जगत में स्वागत किया जाना चाहिए।


मैंने अपनी माँ को जन्म दिया है

'मैंने अपनी माँ को जन्म दिया है' युवा कवयित्री रश्मि भारद्वाज का दूसरा काव्य संग्रह है जिसमें उनकी 56 कविताएं संग्रहित हैं।
उनका प्रथम काव्य संग्रह ”एक अतिरिक्त अ” भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार 2016 में चयनित और प्रकाशित काव्य संग्रह है।
रश्मि अपनी अलग भाव संवेदना और शिल्प के चलते तेजी से हिंदी काव्य जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाती हुई नजर आ रहीं हैं। इधर अनेक पत्र पत्रिकाओं में भी उनकी कविताएं देखने की मिल रही हैं।
रश्मि भारद्वाज की कविताओं को लेकर इस संग्रह के ब्लर्ब पर अनामिका ने उचित ही लिखा है :
”रश्मि चौथी पीढ़ी की स्त्री कविता में विशिष्ट स्थान इसलिए भी रखती हैं कि इनमें ठहर कर सोचने का शील है और सोच समझ लेने के बाद अत्यंत निर्भीकता से उचार देने की ईमानदारी भी।”
रश्मि की इन कविताओं को पढ़ना जीवन के उन नमालूम राहों और पगडंडियों से गुजरना है जो अब तक कहीं छिपी हुई थी। संवेदना ,करुणा और प्रेम के उस संसार को जानना है ,दुर्भाग्य से जिसे हम अब तक नहीं जानते रहें हैं।
ताज्जुब हो सकता है कि इस संभावनाशील युवा कवयित्री का अनुभव संसार इतना मौलिक इतना उर्वर और इतना बहुरंगी कैसे है।
जीवन और प्रकृति, प्रेम और स्त्रीजनित करुणा से इतना लबरेज कैसे है। पर जो कुछ भी है, वह रश्मि का अपना सिरजा हुआ और मौलिक है।
रश्मि की अनेक सुंदर कविताओं में से एक" प्रेम में स्त्री ” की कुछ पंक्तियां यहां उद्धृत करना चाहूँगा :
”उस स्त्री का गर्वोन्नत शीश
नत होगा सिर्फ तुम्हारे लिए
जब उसे ज्ञात हो जायेगा
कि उसके प्रेम में
सीख चुके हो तुम
स्त्री होना”
रश्मि की कविताएं हमें आश्वस्त करती है कि उनमें निहित करुणा और प्रेम जीवन की ऊष्मा और आभा से परिपूर्ण एक सुंदर दुनिया की कामना से भरी हुई हैं।
’जो अव्यक्त है वही सबसे सुंदर है ’जैसी सुंदर पंक्ति गढ़ने वाली रश्मि के इस उल्लेखनीय और दूसरे काव्य संग्रह का हिंदी काव्य जगत में खूब स्वागत किया जाना चाहिए।

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समीक्षक- रमेश अनुपम

मधुमती अंक-61 (राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर) में छपी पुस्तक 'क्षीरसागर में नींद' की समीक्षा, आलोचक जगन्नाथ दुबे और मधुमती के संपादक ब्रजरतन जोशी का आभार

 

विष्णु जी सो रहे हैं क्षीरसागर में


आज हम जिस समय में जी रहे हैं, इसमें साहित्य या कला की दूसरी विधाओं पर विचार करते हुये ज्यादा जरूरत इस समय और समाज पर विचार करने की महसूस होती है। हमारे कलारूपों में हमारा समय और समाज किस रूप में दर्ज हो रहा है यह जानना आज ज्यादा जरूरी हो गया है। सृजनात्मक अभिव्यक्ति की किसी भी विधा का मूल्यांकन विशुद्ध कला के मूल्यों पर करने की न तो आज जरूरत है, न ही गुंजाइश। क्योंकि यह तो आप भी मानते ही होंगे कि साहित्य या कोई भी कला निर्वात में जन्म नहीं लेती,उसका आधार हमारा समय और समाज ही होता है। इसलिए जब हम साहित्य पर बात कर रहे हों तो हमें समय और समाज पर भी बात करनी चाहिए। इसे उलट कर भी कहा जा सकता है। हम जैसे ही आज का समय,हमारा समय,यह समय जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं वैसे ही हम इस समय को दूसरे समय से अलग कर रहे होते हैं। ऐसा करते हुये हमें यह भी विचार करना चाहिए कि यह जो आज का समय, हमारा समय,यह समय है, यह किस समय से और कैसे अलग है? हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि यहाँ हम जिन शब्दों का प्रयोग अपने समय के लिए कर रहे हैं उनका प्रयोग हर समय में, अपने समय के लिए किया जाता रहा है। इसलिए जब कोई कहे कि हमारा समय तो उसे कुछ ऐसे ठोस संदर्भ अपने समय के लिए देना चाहिए जिससे वह दूसरे समयों से अलग होता हुआ दिखे।  

          यहाँ जब मैं अपने समय की बात कर रहा हूँ तो मेरा बहुत स्पष्ट मानना है कि हमारा आज का समय 1990 के आसपास के बाद की बनी हुई दुनिया का समय है। अब तो कई बार लगता है कि 2014 के बाद के भारत का समय हमारा समय है।  भारत समेत दुनिया के एक बड़े हिस्से में 1990 के आसपास बहुत कुछ ऐसा घटित हो रहा था जो हमारे समय को 1990 से पहले के समय से अलग कर रहा था। भूमंडलीकरण,उदारीकरण और निजीकरण जैसे मूल्य 90 के आसपास के वर्षों में ही विकसित हुये जिनका व्यापक असर हमारे समय की सामाजिक-राजनैतिक संरचना पर पड़ा। भूमंडलीकरण के प्रभाव से पूरी दुनिया का अर्थतन्त्र और सामाजिक ताना-बाना बदल गया। बल्कि कहना यह चाहिए कि बिगड़ गया। इस बदलाव का असर व्यक्ति,परिवार,समाज और राष्ट्र-राज्य सभी स्तरों पर पड़ा। इसके साथ ही दुनिया के नक्शे पर दो बड़ी घटनाएँ और घटित हुईं। सोवियत संघ टूट गया। बाबरी मस्जिद का ढांचा ढहा दिया गया। इन दोनों घटनाओं पर बड़े स्तर पर त्वरित प्रतिक्रिया भले ही न हुई हो पर हमारे आज के समय के लिए ये किसी दूसरी घटना से ज्यादा महत्व की हैं। इन दो घटनाओं से एक तरफ तो दुनिया में समाजवादी राज्यव्यवस्था का स्वप्न-संकल्प टूट गया दूसरी तरफ भारत के सेकुलर स्टेट बने रह पाने की संभावनाओं पर शंका जाहिर होने लगी। आज हम इस देश और दुनिया के बड़े हिस्से में जिस दक्षिणपंथ का उभार देख रहे हैं असल में उसकी पटकथा 90 के दशक की इन्ही घटनाओं से लिखी जा चुकी थी। ये घटनाएँ जिन वर्षों में घटित हो रही थीं उन वर्षों में हिन्दी कविता में जो पीढ़ी प्रवेश कर रही थी उनमें एक महत्वपूर्ण नाम श्रीप्रकाश शुक्ल का है। श्रीप्रकाश शुक्ल अपनी पीढ़ी के उन विरल कवियों में हैं जिनके पास एक खास तरह की लोकसम्बद्ध चेतना है। उनकी यह चेतना ग्लोबल होते समय में अपने लोकेल की तलाश करने के क्रम में विकसित हुई है। इस विकास को भूमंडलीकृत हो रहे बाजार के समानान्तर अपनी लोक-संस्कृति,लोक परम्परा, मिथकीय चेतना और लोक-विरासत को नया अर्थ संदर्भ देने की जद्दोजहद के रूप में देखना चाहिए। इस संदर्भ से जब हम श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताओं को देखते हैं तो उनके सम्पूर्ण कवि व्यक्तित्व के विकासक्रम के कम से कम तीन चरण दिखाई देते हैं। पहला चरण उनके शुरुआती लेखन का है जिसमें उनके शुरुआती दो कविता संग्रह अपनी तरह के लोग और जहां सब शहर नहीं होता तक की कवितायें शामिल हैं। इन कविताओं में लोकजीवन के प्रति एक खास किस्म का रागात्मक लगाव दिखाई देता है। दूसरे चरण में उनके तीन कविता संग्रहों बोली बात’, ‘रेत में आकृतियाँ और ओरहन और अन्य कवितायें को शामिल करते हुये कहा जा सकता है कि यहाँ कवि लोकजीवन,लोक-संस्कृति और लोक-परंपरा के साथ तथाकथित नागर समाज का क्या रिश्ता है? इसपर फोकस्ड है। यहाँ लोक और नागर के बीच का संघर्ष कई बार शासक और शासित के बीच के संघर्ष में बदल जाता है। यह संघर्ष उनके नए कविता संग्रह क्षीरसागर में नींद में भी यदा-कदा दिखाई दे जाता है।  यहाँ लोक जनपदीय चेतना से जुड़कर अपना अर्थ-विस्तार कर लेता है। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताओं का तीसरा चरण उनके नए काव्य संग्रह क्षीरसागर में नींद से शुरू होता है।

          यह संग्रह जिस समय में प्रकाशित हुआ है वह  पोस्ट-ट्रुथ और फेक न्यूज़ क्रियेटिंग मीडिया का रचा हुआ समय है। यह एक ऐसा समय जिसमें घटनाएँ और तथ्य गढ़े हुये हैं। यहाँ ज्ञान उत्पादन के साधन शिक्षण संस्थान नहीं राजनैतिक पार्टियों के आईटी सेल हैं। जिसे पत्रकार रविश कुमार व्हाट्सप यूनिवर्सिटी कहते हैं वहीं से तथ्य और सूचनाएँ तैयार किए जाते हैं। इन पोस्ट-ट्रुथ तथ्य और सूचनाओं के समक्ष ट्रुथ तथ्य और सूचनाएँ मूल्यहीन साबित हो रही हैं। जिस जनता को जागृत करने के लिए साहित्य रचा जाता है अब उसका ज्ञानवर्धन आईटी सेल से किया जा रहा है। जनता को नए तरीके से ट्रेंड किया जा रहा है/कर दिया गया है। अब उसके लिए फ़ैक्ट और इन्फार्मेसन वही है जो व्हाट्सप पर आया है/आ रहा है। हम जिस जनता के लिए लिख रहे हैं वह गायब कर दी गयी है। जो जनता हमारे सामने खड़ी है उसे हमारी भाषा समझ में ही नहीं आ रही है। उसके लिए हम और हमारे लिए वह एलियन जैसी हो गयी है। जो जनता हमारे आसपास है उसकी चेतना पर एक मोटी पोस्ट-ट्रुथ परत जमी हुई है। इस परत को हटाये बगैर उसके लिए हमारे लेखन का कोई औचित्य नहीं है। क्षीरसागर में नींद की कवितायें इस परत को भेद सकने में कामयाब होने की संभावना तलाशने वाली कवितायें हैं। इन कविताओं का वितान इसलिए भी बड़ा है क्योंकि जब सवाल करने का मतलब देशद्रोही होना है तब ये कवितायें सवाल करती ही नहीं हैं सवाल करने को प्रेरित भी करती हैं।

          संग्रह की कविताओं के संदर्भ से बात करने से पहले आखिरी बात और वह यह कि इस संग्रह से पहले श्रीप्रकाश शुक्ल की छवि एक ऐसे कवि की थी जिसकी कविताओं में सामाजिक-राजनैतिक प्रतिबद्धता मौजूद तो है पर वह कविता में बाहरी तौर पर स्पष्ट रूप से दिखती नहीं है। यानि अपनी सामाजिक-राजनैतिक प्रतिबद्धता को लेकर वे सचेत तो हैं लेकिन मुखर नहीं हैं। इस स्तर पर आकर वे केदारनाथ सिंह के साथ खड़े दिखते हैं जिनकी कविताओं में लाउडनेस के अभाव की बात एक आरोप की तरह कही जाती रही है। इस संग्रह में श्रीप्रकाश शुक्ल की पोलिटिकल लाउडनेस बढ़ी है। शायद हमारे समय के दबाव ने इसे संभव किया है।

          क्षीरसागर में नींद संग्रह का नाम ही संग्रह की प्रतीकात्मक कथा कहने के लिए पर्याप्त है। क्षीरसागर में नींद का संदर्भ विष्णु के मिथक से जुड़ा हुआ है। भारतीय माइथालजी में विष्णु को पालनकर्ता माना गया है। अब सवाल है कि लोकतन्त्र में जनता का पालनकर्ता कौन है? उत्तर होगा चुनी हुई सरकार और उसका मुखिया। तब मैं कहूँगा कि यह कविता उसी मुखिया के बारे में है। उस मुखिया पर तंज़ कसती हुई। कविता की शुरुआती पंक्तियाँ हैं-

 

बाढ़ आए

बादल फटे

सूखा पड़े

फसल सूखे

किसान मर जाएँ

महामारी घर कर जाय

 

सरेआम एक आदमी को गोली मार दी जाए

धर्म,जाति और जमीन के नाम पर हत्या कर दी जाए

फिर भी कुछ मत बोलो

विष्णु जी सो रहे हैं

क्षीरसागर में

 

यहाँ आप याद कीजिये युवा कवि उमाशंकर चौधरी की कविता तानाशाह की नींद जिसमें वे लिखते हैं- जब पूरी दुनिया/पाप और पुण्य के बीच/न्याय और अन्याय के बीच/धूमिल पड़ती जा रही विभेदक रेखा को/ढूँढने की एक असफल कोशिश में लगी हुई थी, और/जब भारत का वह एक अदना सा आदमी/बगैर कोई समाचार सुने उसदिन भी/अपने सूखे पड़ चुके खेत पर बैठ/आसमान की ओर निहारने के लिए घर से निकाल चुका था,.... कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे अफ़सोसनाक स्थिति यही है कि यह सब इस आर्यावर्त में हो रहा है और यकीनन विष्णु जी सो रहे हैं। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता विष्णु के दैवीय रूप पर जितना बड़ा प्रश्नचिन्ह है उससे ज्यादा लोकतन्त्र की त्रासदी का बयान है। कविता में कवि जिन घटनाओं के होने की बात कह रहा है जीवन में वह उन्हे घटित होते नहीं देखना चाहता। हर प्रगतिचेता रचनाकार समतामूलक समाज का स्वप्न देखता है। इस संग्रह की कविताओं में भी यह मौजूद है। असमानता,भेदभाव,शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ इस संग्रह की कवितायें मुखर प्रतिरोध दर्ज कराती हैं। पंजाबी के बेहद तरक़्क़ीपसंद कवि अवतार सिंह पाश की एक कविता है जिसमें वे कहते हैं मुझे झूठमूठ का कुछ नहीं चाहिए,मुझे सचमुच का सबकुछ चाहिए। उसी भावभूमि की एक कविता इस संग्रह में जो कुछ हो जाता है शीर्षक से है। पाश की कविता में सत्तासीनों द्वारा झूठे आश्वासन के खिलाफ अपने हक को सचमुच में हासिल करने की दृढ़ इच्छाशक्ति है तो श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता में होने और देने को नियति का भ्रम रचकर सत्तासीन रहने वाले वर्ग के प्रति अस्वीकार का भाव है। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता ज्यादा समकालीन और जरूरी है क्योंकि इसमें धर्म के नाम पर नियतिवाद परोसने वालों की सीधी मुखालिफ़त की गयी है। जब कवि कहता है नहीं बंधी है हमारी नियति/जो कुछ हो जाता है उसके होने से/हम जो कुछ करते हैं/होता वही है। तो यहाँ हजारों वर्षों की होने की नियतिवादी व्याख्या का नकार उपस्थित होता है। यह नकार पहली बार नहीं हुआ है। जबसे नियति के स्वीकार की व्यवस्था बनाई गयी है तभी से नकार की भी उपस्थिति है। इस उपस्थिति को हर समय में नकारा गया है/नकारा जाना चाहिए। किसी के सुगंधित होने से/नहीं होती हमारी देह/सुखी व संतुष्ट/हमारी देह के सुखी व संतुष्ट होने से/जो कुछ होता है/सुगंधित होता है यह जो हमारे होने से होने का भाव है असल में यही आधुनिक और मानवीय भाव है।

          क्षीरसागर में नींद की कविताओं में हमारे समय की सामाजिक-राजनैतिक संरचना का विद्रूप पूरे यथार्थ के साथ उपस्थित हुआ है। 1990  के बाद की भारतीय समाज की जो सामाजिक संरचना निर्मित हुई है उसमें बहुत कुछ के बदल जाने की आहट इस संग्रह में मौजूद है। अमेरिकी पूंजी और बाजार के प्रकोप से जो व्यवस्था विकसित हुई है वहाँ मानवीय मूल्यों के लिए कोई स्थान शेष नहीं है। जो पूंजी के दायरे से बाहर है उसकी जगह लोकतन्त्र में भी नहीं है। इस संग्रह की अधिकतर कविताओं में इस तरह के विकसित हुये गठजोड़ से व्याकुल मानुष मौजूद है। एक ऐसा मानुष जो अपनी व्याकुलता में भी संघर्ष की चेतना को सँजोये हुये है। आंच शीर्षक कविता के मानुष की तरह जो कहता है हमें चिंगारी नहीं/आंच चाहिए/ चिंगारियाँ तो जलाने के काम आती हैं/हमारा काम तो पकाना है/ वह हांडी का चावल हो/या अपने मूल से छिटके हुये शब्द इस संग्रह की अधिकांश कविताओं में ये आंच महसूस की जा सकती है। यह आंच पक्का महाल संदर्भित उन कविताओं में महसूस की जा सकती है जिसके बारे में कवि का कहना है कि यह एक चीख है,शायद आखिरी चीख लेकिन एक कवि आखिर चीख ही तो सकता है। बनारस में पक्का महाल वह जगह है जो विश्वनाथ मंदिर और गंगा नदी के बीच का क्षेत्र है। वहाँ विकट परिस्थिति तब पैदा हुई जब सत्ता के जनविरोधी और सनकी फैसले से एक कॉरीडोर बनाने का संकल्प लिया गया। तर्क दिया गया कि ऐसा करके गंगा माँ को बाबा शिव से मिलाया जाएगा। इस फैसले से पक्का महाल के आसपास की बस्ती के हजारों लोगों को निर्वासित होना पड़ा,जिनमें एक बड़ी आबादी गरीब-दलित समुदाय की थी। मुआवजे के नाम पर वही हुआ जो इस देश में अधिकतम गरीबों के साथ होता है। जितना पीड़ादायी यह निर्वासन था उतना ही पीड़ा बनारस के स्वरूप के ध्वस्त हो जाने की भी थी। पुराने शहरों का यह स्वरूप भी तो आखिर हमारी विरासत का ही हिस्सा है! इस पूरे प्रकरण पर जब बौद्धिक वर्ग चुप्पी साधे बैठा था तो एक कवि (श्रीप्रकाश शुक्ल) चीख रहा था,एक पत्रकार (रविश कुमार) इस पूरी व्यवस्था से सवाल कर रहा था। इस चीख से निकली हुई कवितायें इस संग्रह में दर्ज हुई हैं। इन कविताओं में जो आंच मौजूद है उसकी तपिश बहुत दूर तक जाएगी। आने वाली नस्लें जब हमसे यह सवाल पूछेंगी कि जब इस देश की आत्मा पर चोट की जा रही थी तब आप कहाँ थे? उस वक्त हमारे पास क्या जवाब होगा? तब ये कवितायें आने वाली नस्लों को बताएँगी कि हम चीखने के अलावा कुछ नहीं कर सकते थे इसलिए हम चीख रहे थे। इस कवि की  चीख में हम सबकी चीखें शामिल हैं। इस चीख से संदर्भित कवितायेँ पक्का महाल के टूटने को क्रोनी कैपिटिलज़्म से जोड़कर जिस तरह का पाठ प्रस्तुत करती हैं वह हमारे सभ्यतागत विकास की सम्पूर्ण गाथा कहने में समर्थ है। एक कविता है पक्का महाल में जेसीबी। यह कविता यूं तो पक्का महाल के टूटने की अंतर्कथा व्यक्त करने वाली कविता है लेकिन उस अंतर्कथा में बाजार का चरित्र जिस रूप में सामने आया है वह विचारणीय है। कविता की पंक्तियाँ हैं-

श्रीप्रकाश शुक्ल 

चलते-चलते कुछ का यह भी कहना था कि यहाँ एक बिग बाजार होगा

जहां सब तरह की सामग्री सब प्रकार के दामों में उपलब्ध होगी

और पूजा की दिव्य सामग्री व शव पार्लर के साथ

एक भव्य पंडितालय भी होगा

जिसकी एक ढलान मंदिर की ओर होगी

तो दूसरी मणिकर्णिका की ओर


यह जो बिग बाजार का कल्चर है, इसी कल्चर को विकसित करने के नाम पर बहुत कुछ ऐसा है जिसे नष्ट किया जा रहा है। पक्का महाल से संबन्धित कविताओं के शीर्षक भी उस भयावहता को दर्ज करते हैं जिसे यहाँ की जनता ने देखा और झेला है। पक्का महाल में जेसीबी,पक्का महाल में हथौड़े, मलबे में मकान, पक्का महाल में छायाएं ऐसे ही शीर्षक हैं जिनसे उस बस्ती के तबाह होने की करुण कहानी व्यक्त होती है। इन कविताओं में कवि की पक्षधरता बहुत स्पष्ट है। वह इस पूरी विभीषिका में उस जन के साथ खड़ा है जो सरकार के निशाने पर है। एक कविता है ललिता घाट नाम से। घाट पर चलते हुये कवि संवाद कर रहा है -घाट से।

ललिता घाट पर चलते हुए आज लगा कि

वह कह रहा है कि मुझे एकबारगी तोड़ दो

और जितना जल्दी हो

जेसीबी को इधर मोड दो

मैं किसी मजबूर मजदूर के हथौड़े से

नहीं टूटना चाहता

यह जो घाट की पीड़ा है असल में यह मानवीय बोध की पीड़ा है। यह उस निर्दोष मजदूर के तरफ से बयान है जिसकी ज़िंदगी के असल मकसद रोटी तक ही महदूद होकर रह गए हैं। अपनी बनाई हुई निर्मिति को ख़ुद से ही तोड़ना कितना पीड़ादायी होता है यह एक सर्जक ही जानता है। मजदूर भी तो एक सर्जक ही है, हम सबसे बड़ा सर्जक। एक कवि उस सर्जक की पीड़ा को दर्ज करता है। ऐसी ही न जाने कितनी अनाम पीड़ायें पक्का महाल के ध्वंस में दबकर रह गईं।

          क्षीरसागर में नींद संग्रह में कई कवितायें ऐसी हैं जिनमें मनुष्य की कुछ मूलभूत  प्रवृत्तियाँ दर्ज हुई हैं। ऐसी प्रवृत्तियाँ जो नई सदी के बनते भारतीय समाज की हैं। वे नकारात्मक हैं, पर बहुत तेजी से इस समाज में जगह बना रही हैं। इस तरह की कविताओं में चापलूस, पाँव छूने के किस्से, पाँव छुवाई जैसी कवितायें हैं। चापलूसी एक ऐसी प्रवृत्ति है जो मनुष्य तब करता है जब उसे अपने किए पर भरोसा नहीं होता या अपनी क्षमता के अतिरिक्त कुछ दाय के रूप में पाना चाहता है। इसी ढंग की एक कविता कवि के पिछले काव्य संग्रह ओरहन व अन्य कवितायें में संकलित है कनफुकवे नाम से। इन दोनों कविताओं को एकसाथ पढ़ने पर हमारे समाज का एक ऐसा रूप सामने उपस्थित होता है आदतन ख़ुशामद करने वाले लोगों से बनता है।

          पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में एक नया ट्रेंड विकसित हुआ है। इस ट्रेंड ने घोषणाओं का ऐसा घटाटोप रचा है जिसमें जनता उलझकर रह गयी है। कविता का काम यूं तो तात्कालिकता में जीना नहीं होता पर ऐसा भी नहीं है कि कवितायें तात्कालिकता से प्रभावित नहीं होतीं। इस तरह की तात्कालिक घटनाओं और घोषणाओं से भी कई कवितायें निर्मित हुई हैं जो इस संग्रह में दर्ज हैं। इस तरह की दो कविताओं का उल्लेख यहाँ अपेक्षित जान पड़ता है बुरे दिनों के ख़्वाब और बदलाव। ये कवितायें बन तो रही हैं तात्कालिकता के दबाव से लेकिन इनकी रेंज तात्कालिकता के आर-पार देख सकने की है। जब बदलाव शीर्षक कविता में कवि कहता है कि -अल्लाह के बंदे हैं जो/ईश्वर के धंधे में लिप्त हैं/यादें जिनकी भोथरी हैं/वे स्मृतियों को चमका रहे हैं। तो यहाँ कवि के ऊपर तात्कालिकता का दबाव तो है पर वह हावी नहीं है। अल्लाह के बंदों का ईश्वर के धंधों में लिप्त होना कहकर कवि 1990 के बाद की भारतीय राजनीति के सांप्रदायिक चरित्र को व्यक्त कर रहा है। यादों के भोथरेपन से स्मृतियों के चमकाने का संदर्भ भारतीय समाज में दक्षिणपंथ की पूरी कहानी कह देता है।

          इस संग्रह में पिता पर तीन कवितायें हैं। श्रीप्रकाश शुक्ल ने पिता को एक मूल्य की तरह याद किया है, हमारे समाज में पिता की यथार्थ उपस्थिति के साथ। पिता देवदारु हैं,वे पहरे पर हैं पर रोते भी हैं। पिता कब रोते हैं और क्यों रोते हैं इसे कविता में यूं दर्ज किया गया है।- आजकल पिता बात-बात पर रोते हैं/रोना जैसे अपने होने को जीना है। कहीं कुछ याद आ जाता है तो रोते हैं/ कहीं कुछ भूल जाते हैं तो रोते हैं.... जब वे रोते हैं तब अपने वर्तमान में होते हैं/जब हँसते हैं तब अतीत में। पिता का इस तरह रोना और हँसना बहुत कुछ कहता है। भारतीय समाज में पिता का अस्तित्व जिन मूल्यों को अपने में सँजोये हुये है उसके टूटने की निशानी है पिता का रोना। इस टूटन को कवि की दूसरी कवितायें भी दर्ज करती हैं। पहरे पर पिता खाँसते हैं तो देवदारु पिता अक्सर उदास रहते हैं। हिन्दी कवि कुँवर नारायण के यहाँ नचिकेता पिता से मिलकर आश्वस्त होता है कि उसका संसार अभी जीवित है,श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता में पिता देवदारु की झुकी हुई शाखाओं की मानिंद ख़ुद को समेटते हुये से दिखते हैं। कविता में आया हुआ यह अंतर दो पीढ़ियों की कवि संवेदना से ज्यादा दो पीढ़ियों के समाज का अंतर है।  

          क्षीरसागर में नींद संग्रह में स्त्री जीवन से जुड़ी हुई कई कवितायें भी दर्ज हुई हैं। इनमें स्त्री की पारंपरिक छवियों से अलग संघर्षशील स्त्री की छवि भी दर्ज हुई है। इस संग्रह में एक कविता है आंदोलन शीर्षक से। यह कविता स्त्री जीवन और उसके संघर्ष की पूरी परंपरा का बोध विकसित करने वाली कविता है। कविता की पंक्तियाँ हैं

जब वे देखते थे देह के उभार को /उनके देखने के भार से वे झुक जाती थीं।

जब उन्होने दिखाने शुरू कर दिये अपने विचारों के उभार/उनकी आँखों में उतर आई हिंसा/और वे कातिल हो गए

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जिसे आप आंदोलन कहते हैं/वह कुछ और नहीं /उनकी देह के भीतर बैठे भय का विसर्जन है।

 

          इस कविता में पुरुषवर्चस्ववादी मानसिकता के खिलाफ स्त्री के प्रतिरोध की प्रतिक्रिया में पुरुष द्वारा स्त्री के मूल्यांकन का संदर्भ दर्ज हुआ है। ऐसा नहीं है कि यह संदर्भ श्रीप्रकाश शुक्ल के यहाँ पहली बार दर्ज हुआ हैं इसलिए इसपर विचार करना चाहिए। यह संदर्भ श्रीप्रकाश शुक्ल से पहले बहुत से कवियों के यहाँ दर्ज हुआ है और श्रीप्रकाश शुक्ल के बाद भी बहुत से कवियों के यहाँ दर्ज होगा। इसकी यहाँ चर्चा इसलिए जरूरी है कि यह संदर्भ जहां और जितनी बार दर्ज हो उसे वहाँ और उतनी बार रेखांकित करना जरूरी है। यह जरूरत हमतरे मानवीय बने रहने की निशानी है। 

यह संग्रह अपनी बनावट में विविध रंगी है। इस संग्रह में  21वीं सदी का भारतीय सामाजिक-राजनैतिक ताना-बाना तो दर्ज हुआ ही है जिसे हम हाशिया समझते आए हैं उसकी आवाज भी मुखरता से दर्ज हुई है। भारतीय लोकमानस में मौजूद मिथकीय चेतना से जुड़ी कई कवितायें इस संग्रह में मौजूद हैं। यह संग्रह कठोर और मुलायम के बीच बने हुये तनाव को जानने वाले कवि का संग्रह है। जो आंच की मांग करता है। जिसकी कविताओं में आंच मौजूद है।

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आलोचक : जगन्नाथ दुबे 

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय,वाराणसी 221005

मोबाइल-6389003142

समीक्ष्य संग्रह-क्षीरसागर में नींद,कवि श्रीप्रकाश शुक्ल,प्रकाशक-सेतु प्रकाशन, नई दिल्ली

       

सवा सौ साल पुरानी पत्रकारी नजीर (आउटलुक पत्रिका में छपी 'पुरखा पत्रकार का बाइस्कोप' पुस्तक की समीक्षा) आउटलुक पत्रिका और आलोचक हरिमोहन मिश्र का आभार

 "सवा सौ साल पुरानी पत्रकारी नजीर

आज का दौर देख कई बार पत्रकार होने और पत्रकारिता से तौबा कह देने का विचार प्रबल हो जाता है। क्या ऐसी ही पत्रकारिता उस देश की नियति है, जहां आधुनिक पत्रकारिता का इतिहास कम से कम सवा सौ साल से अधिक पुराना है? क्या इतने पुराने इतिहास ने हमें कुछ नहीं सिखाया? लेकिन ‘पुरखा पत्रकार का बाइस्कोप’ शिद्दत से यह एहसास जगाती है कि शुरुआती दौर से ही इस देश में ऐसे दिग्गज पत्रकार हो चुके हैं, जो न सिर्फ स्थितियों को बयान करने में निडर थे, बल्कि बारीक जानकारियों पर निगााह के साथ शैली और शिल्प की खूबसूरती और संप्रेषण कला में माहिर थे। रिपोर्ताज, समीक्षा, रिपोर्ट, संस्मरण, देश के तब के एक कोने से दूसरे कोने और संस्कृतियों के विस्तृत वर्णन का यह संकलन नगेन्द्रनाथ गुप्त का है, जो 1890 के दशक में महान राष्ट्रवादी (आज के अर्थों से उलट) सरदार दयाल सिंह मजीठिया के अखबार ‘ट्रिब्यून’ के संपादक थे। उसके बाद वे उस जमाने के मशहूर पत्र-पत्रिकाओं ‘लीडर’, ‘हिंदुस्तान’ के भी संपादक रहे और ‘मॉडर्न रिव्यू’ जैसे अनेक स्वनामधन्य प्रकाशनों से जुड़े रहे। वे 1940 में मृत्यु तक लगातार सक्रिय रहे और 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम से लेकर तब तक के दौर की बारीक और अनकही जानकारियों से चौंका जाते हैं। पुस्तक का पहला अंग्रेजी संस्करण 1947 में छपा था। उस संस्करण में संविधान सभा के पहले अध्यक्ष सच्चिदानंद सिन्हा अपनी टिप्पणी में लिखते हैं, ‘‘मेरा देश के सभी बड़े पत्रकारों से वास्ता रहा, लेकिन अंग्रेजी भाषा और विविध विषयों पर लेखन में श्री गुप्त जैसा कोई नहीं मिला।’’

लेकिन मौजूदा और पहले हिंदी संस्करण के संपादन और अंग्रेजी से अनुवाद के लिए वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द मोहन को इसलिए भी साधुवाद देना चाहिए कि ऐसी दुर्लभ किताब को उन्होंने ढूंढा और बड़े जतन से हमारे लिए उपलब्ध कराया। अनुवाद सुंदर है और उसमें लेखक की शैली का ध्यान रखा गया है। विषयों के संयोजन-संपादन में भी यह ध्यान रखा गया है कि हर कालखंड का एहसास दिला जाए। अरविन्द मोहन भूमिका में इस किताब की ओर आकृष्ठ होने का ब्यौरा कुछ इस तरह देते हैं, ‘‘इतिहास की काफी सारी चीजों का आंखों देखा ब्यौरा और वही तब के एक शीर्षस्थ पत्रकार का हमने नहीं देखा-सुना था।’’
 इसमें 1857 की क्रांति के किस्से, खासकर कुंवर सिंह और उनके भाई अमर सिंह के हैं, नवाब वाजिद अली शाह को कलकत्ता में नजरबंदी के समय देखने का विवरण और उसके बाद की तो लगभग सारी बड़ी घटनाओं का विवरण कुछ अलग अंदाज और दिलचस्प शैली में मिलता है।  रामकृष्ण परमहंस, ब्रह्म समाज के केशव चंद्र सेन, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती के भाषणों और चमत्कारिक व्यक्तित्वों तथा घटनाओं का आंखों देखा ब्योरा है। ब्रितानी किंग और प्रिंस  के दरबारों और कांग्रेस के गठन से लेकर लगातार उसके अधिवेशनों में भागीदारी और हर बारीक वर्णन ऐसे मिलता है, मानो अरविन्द मोहन के शब्दों में, ‘‘जैसे लेखक पत्रकार न होकर महाभारत का संजय हो।’’
नगेन्द्रनाथ गुप्त का जन्म तो बिहार के पुराने मोतिहारी में हुआ, जो 1934 के भूकंप में एकदम बर्बाद हो गया और अब नया शहर उसके बगल बसा है, लेकिन वे मूल निवासी बंगाल में कोलकाता के एक उपनगर नैहाटी के पास एक गांव के थे। उनके वर्णन से यह भी पता चलता है कि नैहाटी उनके देखते ही देखते कैसे बदल गया और लगभग बहुत हद तक बिहारियों की बस्ती में तब्दील हो गया। यह बताता है कि शहरीकरण कैसे स्थानीयता पर हावी हो जाता है और उसकी संस्कृति की सुंदरता और विशेषता को नष्ट कर डालता है। इसमें गंगा के बीच नाव में रामकृष्ण परमहंस की समाधि लग जाने का भी विवरण है। नगेन्द्रनाथ गुप्त उस दौर की शायद ही कोई बड़ी शख्सियत हो,जिससे न मिले हों और उनके बारे में न लिखा हो। रवींद्रनाथ ठाकुर, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, बालगंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय जो भी नाम आपकी जेहन में आएं, सबके बारे में उनकी अनोखी टिप्पणियां मिलती हैं। वे लाहौर से लेकर देश के हर कोने तक की यात्रा कर चुके थे।
यकीनन यह किताब एक थाती की तरह है, जो हमें काफी समृद्ध कर जाती है। आज के दौर में तो यह बड़ी जरूरी किताब है। कहीं-कहीं प्रूफ की त्रुटियां जरूर खटकती हैं मगर साज-सज्जा आकर्षक है। इसे आज हर किसी को पढऩा चाहिए।

(आउटलुक से साभार)
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आलोचक : हरिमोहन मिश्र
पुस्तक :  पुरखा पत्रकार का बाइस्कोप
नगेन्द्रनाथ गुप्त
संपादन व अंग्रेजी से अनुवाद: अरविन्द मोहन
सेतु प्रकाशन
मूल्य: 235 रु.
पृष्ठ:240
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सामाजिक वर्जनाओं की चारदीवारी में घिरी स्त्री के मन की पीडाओं के कारणों की पड़ताल करती कवितायेँ (पुस्तक 'मैंने अपनी माँ को जन्म दिया है' की समीक्षा) आलोचक अशोक कुमार का आभार

“सामाजिक वर्जनाओं की चारदीवारी में घिरी स्त्री के मन की पीडाओं के कारणों की पड़ताल करती कवितायेँ.” इन कविताओं से गुजरते हुए मैंने यह जाना कि स्त्री मन की पीडाओं को महसूस कर पाना संवेदनशील से संवेदनशील पुरुष के भी बस की बात नहीं है. यहाँ सहानूभूति और अनूभूति के बीच यह जो गहरी खाई है उसे हम पुरुष कभी नहीं पाट सकते। यह कवितायेँ जटिल मानवीय संबंधों (जिनसे झूझते हुए सहेजने की कवायद में स्त्री खुद को कहीं खो बैठती है) को सहजता और सरलता से व्यक्त करती हुई आपको संबंधों और संवेदनाओं के एक अबूझ संसार में ले जाती हैं।



यह कवितायेँ दो शहरों के मध्य अपने अस्तित्व को तलाश रही स्त्री के वह शिकायत पत्र हैं जो वह खुद के नाम लिखती है. जिनमे वह लिखती हैं- “मैं दो शहरों के बीच खोजती हूँ/ एक बीत गयी उम्र/ एक ने मुझे नहीं सहेजा/ दुसरे को मैंने नहीं अपनाया/ मैं दोनों की गुनाहगार रही।

एक तरफ यह कवितायेँ स्मृतियों के उदास दस्तावेज हैं तो दूसरी तरफ दुःख के संस्मरण भी। और इस सबके बीच परिस्थितयों के विरुद्ध टिके रहने के साहस की प्रमाण भी।

एक पल कवियत्री कहती हैं-

मेरी यत्न से सवारी गयी देह/ कुटिलता से उघार देती थी हर बार/ आत्मा की सभी नील-खरोंचे

और दूसरे पल कहती हैं-

हम स्मृतियों में लौटते हैं/ क्योंकि लौटने के लिए कहीं कुछ और नहीं / वह सभी जगह जहाँ हम जा सकते थे/ हमारी पहुँच से थोडा आगे बढ़ चुकी हैं

एक और कविता देखिये-

प्रेम में भय है/ या की भय से ही प्रेम/ वह अपने अन्दर के उस शैतान से डरती है/ जिसे सब कुछ चाहिए/ आँख भर नींद/ उम्र भए के सपने/ थोड़ी सी आंच/ और एक मज़बूत गर्म हथेली/ जिसे थामकर दुखों को पिघलता हुआ महसूस किया जा सके।

यहाँ  वह कविताये हैं जहाँ कवियत्री थक जाने के बाद “नींद को मरहम कहती है” यह थकान मात्र दौड़-भाग की नहीं है।

रानू मंडल के बहाने कवियत्री कहती हैं की हमें दुखो को भी याद रखना चाहिए क्योंकि

“दुखों को भूल जाना/ अपनी आत्मा की सबसे मधुर लय को खो देना है।

यह कवितायेँ केवल स्त्रीमन को टटोलती, दुखों को ही दर्ज करती नहीं बल्कि कवियत्री की सामाजिक चेतना को को भी दर्ज़ करती हुई विश्व की सबसे बड़ी चिंताओं और सवालों को मुखरता से स्वर भी देतीं हैं। दुनियाभर में वह विस्थापित जो पहचान के संकट से जूझ रहे हैं उनके लिए लिखती हैं-

एक घर/ एक परिवार/ एक देश/ एक पहचान/ कागजों से बनी इस दुनिया में जी सकने के लिए/ उन्हें दरकार है/ बस एक कागज की।

कवियत्री केवल अपने दुःख ही नहीं लिखती, वह तमाम स्त्रियों के दुखों को साझा समझते हुए “बहनापा” भी रचती हैं।

यह कवितायेँ साहस की उम्दा मिसाल हैं जहाँ कवियत्री लिख सकी है कि-

मां के लिए लिखी गयी हर कविता में/ तुम एक अघोषित खलनायक थे पिता।

और फिर पिता और माँ के उस प्रेम के लिए जिसे कभी शब्दों में नहीं गया उसके लिए लिखती है कि-

हमारे लिए प्रेम हमेशा अव्यक्त ही रहा/ लेकिन हम आज भी जानते हैं यह बात मन ही मन में/ कि जो अव्यक्त है वही सबसे सुन्दर है।

जहां समाज में आज भी स्त्री का तमाम प्रेम, आत्मा की तमाम पवित्रता उसके देह के किसी ख़ास अंग से आंकी जाती रही है वहां तमाम वर्जनाओं को तोड़ते हुए कवियत्री रच रही है-

उसे पत्थरों से पीटा गया/ जंजीरों से जकड़ा गया/ अग्नि से जलाया गया/ सरियों से विक्षित किया गया/ उपभोग के बाद/ वह घृणा की पात्र थी/ स्त्री की मृत देह पर भी/ योनी को उसके होने की सज़ा दी गयी।

स्त्री के लिए बोनसाई जैसे बिम्ब कविताओं में नवीनता लेकर आये है। बिंदी, नदी के माध्यम से कही गयी कवितायेँ प्रचलित बिम्बों के सहारे कहन का नयापन लिए हुए हैं।

इस संग्रह में एक कविता है “पति की प्रेमिका के नाम”। उसका एक अंश पढिये-

मेरे पास था/ एक प्रेम का अतीत/ एक बीत गयी उम्र/ और एक बीतती जा रही देह के साथ/ उसके प्रणय का प्रतीक/ एक और जीवन तुम्हारे पास था/ एक प्रेम का वर्तमान/ यौवन का उन्माद/ देह का समर्पण/ और मेरे लिए एक चुनौती लेकिन अपना भविष्य तो हम दोनों ने/ किसी और को सौप रखा था।

यह होता कि तुमने मेरे अतीत/ और मैने तुम्हारे वर्तमान का साझा दुःख पढ़ा होता/ काश कि हमें दुःखो ने भी बांधा होता।

इन कविताओं में हम खोते चले जाते है. यह कविताएँ गाँव के पुल को तलाश करती हुई पुरखों की उन माफियों को सुनती हैं जो वह अपनी की गयी तमाम गलतियों के लिए मांग रहे है।

यह कविताएँ ईश्वर पर पक्षपाती होने का आरोप लगाने का साहस करती है, सुख की खोज में भटकती हुई तमाम दुःख देखती हैं, पूंजीवाद और बाजारवाद के विरुद्ध न कहने का माद्दा रखती हैं और मौन को कायरता मानने से इनकार करती हैं।

कुल मिलाकर यह संग्रह पढ़ा जाना चाहिए. अगर मेरी पसंद की एक कविता इस संग्रह से चुननी हो तो वह यह होगी-

एक पुरुष ने लिखा दुख

और यह दुनिया भर के वंचितों की आवाज़ बन गया

एक स्त्री ने लिखा दुःख

यह उसका दिया एक उलाहना था


एक पुरुष लिखता है सुख

वहाँ संसार भर की उम्मीद समायी होती है

एक स्त्री ने लिखा सुख

यह उसका निजी प्रलाप था


एक पुरुष ने लिखा प्रेम

रची गई एक नयी परिभाषा

एक स्त्री ने लिखा प्रेम

लोग उसके शयनकक्ष का भूगोल तलाशने लगे


एक पुरुष ने लिखी स्त्रियाँ

ये सब उसके लिए प्रेरणाएं थीं

एक स्त्री ने लिखा पुरुष

वह सीढियाँ बनाती थी


स्त्री ने जब भी कागज़ पर उकेरे कुछ शब्द

वे वहां उसकी देह की ज्यामितियां ख़ोजते रहे

उन्हें स्त्री से कविता नहीं चाहिए थी

वे बस कुछ रंगीन बिम्बों की तलाश में थे


भक्ति काल में मीरा लिख गयीं -


राणाजी म्हाने या बदनामी लगे मीठी।

कोई निन्दो कोई बिन्दो, मैं चलूंगी चाल अपूठी...

1930 में महादेवी के शब्द थे-

विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरा न कभी अपना होना...


1990 में लिखती हैं अनामिका -

हे परमपिताओं,

परमपुरुषों–

बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो!


2018 में यह पंक्तियाँ लिखते

रश्मि भारद्वाज 
मैं आपके लिए तहेदिल से चाहती हूँ

'ग्रो अप

एन्ड मूव ऑन'


और आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए

20 ....लिख कर रिक्त स्थान छोड़ती हूँ

उम्मीद करती हूँ कि अब कोई नयी बात लिखी जाए!

(रश्मि भारद्वाज) 




आलोचक : अशोक कुमार

किताब: “मैंने अपनी मां को जन्म दिया है”

लेखक: रश्मि भारद्वाज

प्रकाशक: सेतु प्रकाशन

मूल्य: 130 रूपए 

विधा: कविता

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निम्न मध्यवर्गीय जीवन की यातना और स्वप्नभंग (हंस पत्रिका के जुलाई अंक में छपी उपन्यास 'घर बदर' की समीक्षा) आलोचक ज्योतिष जोशी और हंस के संपादक संजय सहाय का आभार





उपन्यास अगर आधुनिक जीवन का महाकाव्य बन सका तो इसीलिए की उसमें वर्तमान के संत्रास को भविष्य की आहट में पहचान सकने की क्षमता देखी गई। यह तब होता है जब उपन्यासकार अपने समय की विरूपताओं से टकराते हुए एक सचेत दृष्टि के साथ भविष्य का खाका हमारे समक्ष रखता है। इसका आशय यह कत्तई नहीं है कि केवल यथार्थ को प्रस्तुत कर देने मात्र से कोई उपन्यासकार अपने कर्तव्य में कृतकार्य हो जाता है। सच तो यह है कि जब तक वह अपने 'विषय' को स्वयं नहीं जीता और बार बार क्षत विक्षत होते हुए जब तक एक स्पष्ट बिंदु तक नहीं पहुंचता, जिसमें हम वर्तमान से भविष्य तक की एक दृश्य रेखा देख सकें, तब तक उसके किए धरे की छाप हम पर नहीं पड़ पाती। इस दृष्टि से हाल ही प्रकाशित सन्तोष दीक्षित का उपन्यास ' घर बदर' ध्यान आकर्षित करता है।


संतोष दीक्षित हिंदी के महत्वपूर्ण कथाकार हैं जिनके अनेक कहानी संग्रह प्रकाशित हैं। 2010 में प्रकाशित उनके चर्चित उपन्यास ' केलिडोस्कोप' के ठीक दस वर्ष बाद ' घर बदर' का छपना कोई संयोग नहीं है, वरन एक रचनाकार के नाते उनके गहन मंथन और आनुभूतिक यात्रा का परिणाम है। यह उपन्यास इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसमें निरन्तर बदलते परिवार और समाज की गहन पड़ताल है तथा एक पराभूत सभ्यता का विमर्श भी। एक परिवार के बहाने सामाजिक परिवर्तन के समानांतर मूल्य विपर्यय को, उसके समग्र अंतर्विरोधों को बारीकी से रखने के कारण निश्चय ही यह उपन्यास गम्भीर बहस की मांग करता है।

' घर बदर ' राम अवतार दुबे तदन्तर दुर्गाशंकर दुबे तथा उनके पुत्र कुंदन दुबे की कथा है जो कमल, किशोर और कौशल नामक उनके तीन पुत्रों तक आती है। घर से विस्थापित तीन पीढ़ियों की कथा में स्थाई घर बनवाने का सपना केंद्र में है। पर इस सपने की जद में एक पूरी सदी को लांघती बढ़ती कथा समाज के बदलते ढंग और ढांचे के साथ हिंदी पट्टी की अधोगति की कहानी भी कहती चलती है। राम अवतार दुबे द्वारा सौंपी गई कुल देवी की प्रतिमा और घर के मरजाद की पुस्तिका सम्भालते कुंदन दुबे माता विष्णुप्रिया की आज्ञा को शिरोधार्य कर जीते हैं। रागिनी, रमोली, रजनी और रानी नामक बहनों की शादी कराते हैं। शर्मिला यानी शारदा को माता की आज्ञा से व्याह कर लाते हैं। इधर उधर की नौकरी से मुक्ति ले रेलवे में मालगाड़ी के गार्ड बनकर जीवन शुरू करते हैं और इस तरह आज्ञाकारिता का भाव क्रमशः तिरोहित होता जाता है और पत्नी शारदा के घर के सपने में खो सा जाता है। घर बनाने की प्रक्रिया में तबाह हो जाते कुंदन दुबे पत्नी से सहज प्यार भी नहीं पा पाते और छोटे बेटे कौशल की नालायकी से आतंकित होकर सेवा निवृत्ति के नरक को भोगते एक दिन लम्बी बीमारी के बाद दम तोड़ देते हैं। 

जीवन भर अपने घर की जदोजहद में खप जाने वाले कुंदन मरने के बाद अपनी तस्वीर में भी जीवित नहीं रहते, उनके श्राद्ध वाली तस्वीर को अशुभ मान घरवाले उनके मित्र को  देकर उनसे मुक्त हो जाते हैं। घर बिक जाता है। बेटे हिस्सा ले उड़ जाते हैं। पत्नी उनकी पेंशन से स्कूल चलाने लगती हैं और इस तरह दुबे परिवार की सनातनी घर बदरी कायम रहती है। 

उपन्यास बदले हुए समय को बारीकी से आंकता है। छीजते मूल्य, दरकती व्यवस्था, सामाजिक छद्म और प्रपंच से भरे नाना सम्बन्धों और समाजों को एक रोचक किसागोई में ढालते श्री दीक्षित ने उपन्यास को जिस तरह बरता है और जिस तरह उसे एक परिवर्तनकामी विमर्श में बदल दिया है, वह सचमुच छूनेवाला है। आज जबकि कथा को महज विमर्श का एक जरिया बनाकर उपन्यास रच डालने की हड़बड़ी दिख रही है, जिसमें न रस है, न रहस्य, न जिज्ञासा है, न घटनात्मक तनाव के मर्म भरे मोड़ ; यह उपन्यास एक सबक की तरह आता है। एक पारिवारिक कथा के बहाने अपने समय से टकराकर मनुष्य की सही जगह की खोज और उसके स्वत्व की निशानदेही करता ' घर बदर ' निश्चय ही हमें एक बड़ी सीख देता है। भाषा, चारित्रिक संयोजन, नाना अंतर्कथाओं से केंद्रीय कथा के संगुम्फन से लेकर उपन्यास में शुरू से अंत तक जिस तनाव का परिपाक हुआ है, वह श्री दीक्षित के कथा कौशल का प्रमाण तो है ही, एक बड़े मानवीय विमर्श के साथ सामाजिक बदलाव का क्रमागत आकलन भी है। 

'घर बदर' का ताना-बाना बेहद जटिल है जिसे बहुत बारीकी से लेखक ने साधा है । उपन्यास ठीक उसी तरह नाना तरह के चरित्रों से भरा पड़ा है, जैसे हमारे समाज और परिवार की संरचना होती है। रायबरेली से विजातीय लड़की से ब्याह रचाकर भागकर इलाहाबाद आये राम अवतार दुबे हों या पिता दुर्गाशंकर दुबे, सब उसी तरह हैं जैसे कुन्दन दुबे हैं। आशंका, भय और कथित मर्यादा में अपने को सिकोड़ कर जीते जैसे राम अवतार चंदा से आतंकित दिखते हैं, वैसे ही दुर्गाशंकर, विष्णुप्रिया से और कुन्दन शर्मिला उर्फ़ शारदा से । नगरपालिका में वकील रिश्तेदार रामदुलारे दीक्षित की कृपा से पानी पिलाने की नौकरी पाकर जिस तरह दिन काटते हैं, उसी तरह दुर्गाशंकर प्राइवेट नौकरी में रहकर गुजर करते हैं। लकवाग्रस्त होने के बाद नौकरी से निकाल दिए गये दुर्गाशंकर परिवार को संकट में डाल देते हैं। तब विष्णुप्रिया की इंटर पास डिग्री काम आती है और वे अपने दूर के रिश्तेदार की मदद से एक ईसाई अस्पताल में हाउसकीपर के पद पर काम पाकर टूटे-बिखरे घर को पटरी पर लाने का यत्न करती हैं ।

यह विष्णुप्रिया दुनियादारी को बहुत बारीकी से समझती हैं। एक चतुर, अड़ियल, मौकापरस्त और दबंग औरत के रूप में वह उपन्यास के पूर्वार्द्ध तक प्रभावी रहती हैं। उनके व्यक्तित्व से जहाँ घर की चारों लड़कियाँ दबंग बन जाती हैं, वहीं कुन्दन दब्बू और आशंकित व्यक्तित्व ही पा पाते हैं जो घर का बोझ लिए कभी ट्युशन करते हैं तो कभी दाल मिल में कैशियर का काम। अंत में बेटे को सरकारी नौकरी में देखने की प्रतिज्ञा विष्णुप्रिया एक दूर के रिश्तेदार की खोज कर पूरी कर लेती हैं। फलतः कुन्दन दुबे रेलवे में गार्ड की नौकरी पा जाते हैं। माता के दबाव में ही शादी करने वाले कुन्दन इतने दब्बू रह जाते हैं कि पत्नी शारदा के चित्त से उतरकर केवल उसकी आकांक्षाओं को पूरा करने के उपकरण में बदल जाते हैं। उन्हें पत्नी का सहज प्यार-दुलार भी नसीब नहीं होता। विष्णुप्रिया जैसी अड़ियल सास और चारों ननदों की गिरफ्त में रहकर, नाना तरह की यंत्रणाएँ, ताने और उपेक्षाएँ सहकर शारदा निर्मम होती जाती है जो कुन्दन जैसे दब्बू व्यक्ति के लिए घातक होता है। एक समय तक माँ के कहे पर चलनेवाले कुन्दन अब शारदा के हुक्म के गुलाम होते हैं। शुरू में बहनों की शादी में उत्साह दिखाते कुन्दन बाद में छुट्टी न मिलने का बहाना कर आने से भी इन्कार कर देते हैं। पत्नी शारदा के घर के सपने को पूरा करने में होम होते कुन्दन मधुमेह की भयावह होती बीमारी की परवाह नहीं करते, दिन-दिन भर चाय पीकर काम करते रहते हैं। इस तरह कई दूसरी बीमारियों को पालकर वे उपरी कमाई पर भी ध्यान देने लगते हैं। एक तरफ पूजा-पाठ, कर्मकांड तथा दूसरी तरफ हराम की कमाई से प्रेम, कुन्दन के व्यक्तित्व के वे पक्ष हैं जो मध्यवर्गीय या ये कहें निम्न मध्यवर्गीय चरित्र के अन्तर्विरोधों का खुलासा करते हैं। 

यह अन्तर्विरोध विष्णुप्रिया में तो है ही, उनकी चारों बेटियों- रागिनी, रमोली, रजनी और रानी में भी है । बेटियों के पतियों- गणेश, अश्विन, प्रवीण आदि में भी यह अन्तर्विरोध कम नहीं है। उपन्यास में तीन पीढ़ियों की कथा में समाज की क्रमशः बढ़ती अकांक्षाओं और बन रहे अर्थतंत्र में उसके विन्यास को बारीकी से दिखाने की चेष्टा है। यह समाज मध्यवर्ग का दिखता है, पर है निम्न मध्यवर्गीय, जिसमें मध्यवर्गीय जीवन का मिथ्याचार, झूठ, दिखावा और अहं का घालमेल है। कथित सवर्ण और उसमें भी ब्राह्मण श्रेष्ठता का दंभ अनावश्यक रूप से इतना हावी है कि समाज से अलग-अलग रहने में ही ' कुल की मरजाद' सुरक्षित रह पाती है । यह मर्यादाबोध विष्णुप्रिया तक बहुत गहरा है जो बाद में क्षीण होता है। लगातार अकेले होते हुए कुन्दन को पूरे जीवन में किसी का साथ मिलता है, तो वे होते हैं- उपन्यास का वाचक (मित्र) और चक्रवर्ती दा; जो रेलवे में अधिकारी होने के साथ मजदूर संघ के नेता भी हैं। वे बेलौस हैं पर तार्किक हैं। कह सकते हैं कि चक्रवर्ती दा ही उपन्यासकार के आधुनिक विचारों के वाहक हैं। वे यथास्थितिवाद पर चोट करते हैं, नियतिवाद को भला-बुरा कहते हैं और वस्तुवादी समय को आड़े हाथों लेते हुए कहते हैं-
'...दुनिया ही विचित्र होती जा रहा है। हमारी सामुदायिक जीवन शैली, हमारा रहन-सहन, खान-पान, हमारी स्थानीय अस्मिता….आज सब पर भारी संकट गहरा रहा है। हर आदमी दिनोंदिन इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का इस्तेमाल कर अकेला होता जा रहा है।'

यह वक्तव्य कुन्दन दुबे द्वारा नया स्मार्टफोन फोन लेने पर चक्रवर्ती दा ने दिया था। इक्कीसवीं सदी की आमद के साथ मोबाइल और कम्प्यूटर से लकदक संस्कृति को लक्ष्य कर कथाकार ने सामाजिक विरूपता के विरोधाभासों को गहराई से देखा है। पूंजीवाद के साथ आये बाज़ारवाद और मुक्त अर्थ-व्यवस्था के इस नये दौर में आधुनिक न हो पाने की लाचारी से जूझ रहे देश में समाज की अधोगति का चित्र बेहद जीवंत है। कुन्दन दुबे जैसा पारंपरिक रूढ़ियों में जीने वाला व्यक्ति भी भले ही अपनी देह को कुपोषण के हवाले कर दें, पर कथित विकास की आँधी में बह जाने को सहज तैयार हैं।

पहले बहनों की शादी के लिए गर्क़ हुए कुन्दन दुबे, बाद में पत्नी शारदा के सपनों में खप जाते हैं और अवकाश प्राप्ति के बाद उनका जीवन नारकीय यंत्रणा में बदल जाता है। तीन पीढ़ियों की कथा में सामाजिक ताने-बाने का प्रवाह क्रमशः जिस दिशा में जाता है, उसमें हम एक सभ्यता के छीजते जाने को देख सकते हैं। कुन्दन उन असंख्य महत्वाकांक्षी और उत्पीड़ित जनों के प्रतिनिधि बन जाते हैं जिनका अपना कोई जीवन नहीं होता। पहले माँ और बहनों की चाकरी में गर्क़ हुए कुन्दन बाद में जिस तरह अपने निजी परिवार की भेंट चढ़ते हैं और एक पैसा कमाऊ यंत्र रह जाते हैं, वह हमारी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था की भयावह त्रासदी रही है। समय बदलने के साथ भी यह त्रासदी नहीं बदल पाई क्योंकि परिवार में ही शोषक नये-नये रूपों में आते गए जो कभी सोचने का अवसर तक नहीं देते। 
 कभी इधर तो कभी उधर के थपेड़ों से आहत कुन्दन अंत में अकेले होते हैं। माँ और बहनों से विदा लेकर   ( यद्यपि कि छोटी बहन रानी ससुराल छोड़ उनके घर पर ही रहती है) भी वे अब पत्नी और बच्चों के लिए शोषण का शिकार होते हैं जिसमें कौशल नामक उनका लम्पट पुत्र बहुधा उन्हें मारता-पिटता है और अभद्रता की हदें पार कर देता है। कमल विदेश जा विराजता है, किशोर कुंदन का साथ देता है,पर नौकरी उसकी भी लाचारी है। साथ रहता है कौशल;जो आज के उन अराजक युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है जो अभिभावकों से अभद्रता से प्रस्तुत होकर मनचाही जरूरतें पूरी करते हैं और कोई काम-वाम नहीं करना चाहते। 
गौर से देखें तो ' घर बदर'  लगभग चालीस-पचास वर्षों की हमारी सामाजिक- सांस्कृतिक अवनति का वृत्तांत है। इसमें स्पष्ट दिखता है कि अलग-अलग पीढ़ियों की प्राथमिकताओं के साथ उनके मूल्य भी बदलते गए हैं। यह बदलाव कुन्दन दुबे के जीवन के उत्तरार्द्ध से स्वयं उनमें भी आया है जिसमें वे अपनी सहजता, मुक्तता और सम्बन्धों के प्रति ईमानदारी भी भूल से गये हैं। बाद में यही मूल्य विपर्यय जब उनकी संततियों का स्वाभाविक आचरण बन जाता है तो कुछ बचता नहीं, बस रह जाती है 'घर बदरी', जिसके लिए यह पूरा परिवार अभिशप्त है। अपने कथित मूल्यों के लिए जीते कुन्दन अपनी ही आँखों से कौशल को बर्बाद होता देखते हैं और अपनी यातना भोगते हैं। बाद में बीमार होकर दम तोड़ देते हैं और समूची कमाई परिजनों के उड़ाने के काम आती है। 
यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि 'घर बदर' में आठवें दशक से लेकर इक्कीसवीं सदी के लगभग डेढ़ दशक के पूरे कालखंड को कथात्मक ढांचे में ढालकर प्रस्तुत करने का सफल प्रयत्न है। इस कालखंड के भीतर आनेवाला आपातकाल हो, सामाजिक परिवर्तनके नाम पर चलनेवाली राजनीति हो, राजनैतिक गठजोड़ों की प्रक्रिया का आरंभ हो, आर्थिक उदारीकरण, बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद हो या कथित राष्ट्रवाद हो- उपन्यासकार ने कथा के भीतर इनके परिणामों की भयंकरता को आँका है और एक तरह से गहन सामाजिक-आर्थिक दुष्प्रभावों और परिणतियों को दिखाया है। यह इस उपन्यास का सबसे सुदृढ़ पक्ष है जिसमें हम लेखक की दृष्टि को देख-समझ पाते हैं और जान पाते हैं कि इनका क्रूर यथार्थ किस वीभत्सता के साथ हमारे सभी मूल्यों-मानों को निगलकर देश को बर्बादी के रास्ते पर ले गया है। इन वर्षों में निम्न और मध्यवर्गीय जीवन किस तरह बदला है तथा उनमें क्या-क्या विकृतियाँ आईं हैं, इसे भी उपन्यासकार ने बहुत बारीकी से चित्रित किया है। बाद के दौर यानी आज के समय की युवा पीढ़ी को दो वर्गों में बाँटकर सच ही लेखक ने एक को 'कैरियरिस्ट' तथा दूसरे को 'एनार्किस्ट' के रूप में देखा है जिसमें पहले का प्रतिनिधि कमल और किशोर हैं तो दूसरे का प्रतिनिधि कौशल है। दोनों को ही सिर्फ अपने से मतलब है, भले ही दोनों के रूप भिन्न हैं पर वे अंततः सामाजिक अधिरचना को नष्ट कर परिवारों को अंधकूप में धकेलनेवाले हैं। इसके जिम्मेवार हम स्वयं हैं, जैसे उपन्यास में कुन्दन दुबे और शारदा हैं जिनके सपनों में पल रहे बच्चे उन्हीं के काल बन जाते हैं। इसके साथ-साथ असंवेदनशील और क्रूर व्यवस्था के द्वारा लिए गये आकस्मिक देशव्यापी निर्णयों से बढ़ती बेकारी, सामाजिक विविधता का बिखरता सिराजा और पुलिस, प्रशासन सहित अस्पतालों की मनमानी पर से पर्दा हटाते हुए उपन्यासकार ने जिस तरह कथा के भीतर आई परिस्थितियों को दिखाया है, वह आंदोलित करनेवाला है।


उपन्यास का कथानक 'घर बदरी' पर  आधारित है, पर वह प्रतीकात्मक है। वस्तुतः उपन्यास अपने पूरे विन्यास में देश के ढाँचे के बिखरने और एक बड़े सपने के ध्वस्त होने का मार्मिक आख्यान है। इस आख्यान में एक परिवार की कथा यानी कुन्दन दुबे  के कुनबे की कथा है, पर यह उस निम्नवर्गीय समाज की यातना-कथा है, जो मध्यवर्ग में दाखिल होने की कोशिश करता है और टूट कर बिखर जाता है।  कथा को एक प्रवाह में साधे रखने का वैशिष्ट्य हो या चरित्रों के संयोजन की ईमानदारी हो, मर्मस्थलों की पहचान के असल बिंदु हों या अनेक अंतर्कथाओं में बुने गये आज के समय के बड़े प्रश्न हों; उपन्यासकार ने कहन की अपनी सादा और रोचक किस्सागोई में इस तरह ढाला है कि उपन्यास हमारे वर्तमान जीवन की त्रासद कथा बन जाता है। कह सकते हैं कि 'घर बदर' निम्न मध्यवर्गीय जीवन की यातना और स्वप्नभंग का त्रासद आख्यान है। निश्चय ही पिछले चार-.पांच दशकों में घटित सामाजिक-आर्थिक तंत्र को विश्लेषित करने वाला यह उपन्यास इधर आए उपन्यासों में महत्वपूर्ण है।

'घर बदर' (उपन्यास)- संतोष दीक्षित
सेतु प्रकाशन प्रा. लि., 305 प्रियदर्शिनी अपार्टमेंट पटपड़गंज, 
दिल्ली-110092, 
मूल्य- ₹ 250

आलोचक-ज्योतिष जोशी  
ईमेल- jyotishjoshi@gmail.com
सम्पर्क-
डी -4/37, सेक्टर 15
रोहिणी, दिल्ली 110089


अशोक वाजपेयी की कविताएँ, विपुला च पृथ्‍वी.......(साभार ओम निश्चल की फेसबुक वॉल से)

  संसार में कितनी तरह की कविताएं लिखी जाती हैं। देश काल परिस् थिति को छूती और कभी कभार उसके पार जाती हुई। कभी दुख कभी सुख कभी आह्लाद कभी विष...